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मैथिली कथा – सड़क





♦ विभूति आनन्द
डेग सॅं, नहि-नहि, डेगक थकनी सॅं रस्ता नपा गेल रहै ! आ तें भरो राति मेला मे मटरगस्ती करय, नाच-नौटंकी देखय, आ फेर एक्कहि बेर भोरहरबा मे घर घुरय । औंघायल, भकुआयल…
से जेना सुतले-सुतले चलय । आ घर लग अबिते रुकि जाय । फेर सड़क सॅं खॅंघरि नीचा घरारी पर चल आबय । सभ टा ॲंटकारल रहै जेना।
तहिया रस्तो तेहने रहै । कच्ची । ले-ऊॅंच । ताहूमे एकपयरिया । साॅंप जकाॅं गॅंइचल । टेढ़-टूढ़ । से ठीके, भोरहरबा मे साॅंपे जकाॅं बुझाइक, जखन कखनो कऽ चलैत-चलैत ऑंखि फुजि जाइ !
तहिया पीचक नामो कहाँ उचरल रहै ! बेसी लोक पैदले चलय । अक्सरहाॅं । आ सवारीक नाम पर तॅं भरो परोपट्टा मे एक्का-दुक्का साइकिल ! सेहो झरखंडी !
मुदा तहियाक लोक कें से अचरज लागै । केहनो ले-ऊॅंच रस्ता कें एतनीयों ने गुदानै साइकिल ! बाबाक मुॅंह सॅं आप सॅं आप बहरा जाइत रहनि– ‘चाबास रे बनौनिहार !’
– ‘ई की देखलिऐ भाइ, बण्डोलबा परक जे रमेश मड़र अछि ! ओ तऽ तेना ने रेस मे चलबै छै जेना उड़ा देतै !…’ बगल मे तमाकू चुनबैत बैसल सहोदर माछे बबा बजलथिन ।
– ‘हौ जीबी तऽ की-की ने देखी ! एक दिन सही वला मिसिल के सेहो मेघमे उड़ैत देखबहक…’
– ‘सेहो कोनो बेजाय नै भाइ ! ई सब बात रामायण मे आयलो छै…’
– ‘से की ?’ निरक्षर बाबा अचरज सॅं पुछलथिन ।
– ‘अहूँ भाइ, आब ठीके बहुत बात बिसरै छिऐ ! यो श्रीराम लंका सऽ कथीपर चढ़ि कऽ अयोध्या आयल रहथिन !’
– ‘अरे रे रे, ठीके मे मोन पाड़लह बुच्चन ! ‘पुष्पक’ सऽ आयल रहथिन ! ओ तऽ मेघे मे उड़ि कऽ आयल रहै !…’
…आ से अतीतकें सपनाइत अमन धब्ब दऽ वर्तमान पर खसल ! जेना अन्दर सॅं भावना कें चोट लागल होइ । किएक, से नहि बुझि पौलक । कोशिश सेहो नहि कैलक । बस, अपना कें हल्लुक अनुभव कैलक । सोझा मे सगरो जीवनक उल्लास पसरल रहै ।
ओना ई वर्तमान एकरा सदिखन अचरज मे दैत रहलै । फेर खुशी । जहिया चान पर नील आर्मस्ट्रांग गेल रहै, एकरा भीतर सॅं अचरज भरल उल्लास देने रहै, आ अपन चन्ना मामाक असली रूप बुझने रहय ।
से ई तॅं तहियाक एकटा दृष्टान्त रहै । मुदा आब तॅं जेना सभटा असंभव संभव भेल जाइत छलै ! जेना कहियो झरखण्डी साइकिल देखि अचरज भेल रहै, आइ लोकक लग स्कूटी देखि कोनो तेहन सन नहि लगैत छै ! चरिपहिया गाड़ी तक जेना भूजा-भर्री बनल सड़क पर उड़ैत देखैत रहैत अछि ।
आ देखैत-सोचैत अमन फेर जेना हेराय लागल । माय मोन पड़ि गेलै। ओ कहियो-कहियो कऽ कहल करै– ‘जुग मे भूर भेल जाइ छै !’
असलमे ओ जे जिनगी जीने छलि, ताहि सॅं संतुष्ट छलि । यदि ताहि मे कोनो अन्तर अबै तॅं ई फकड़ा ओकर ठोर पर आबि गेल करै ।
आ से जहिया क्यो आबि कहने रहै जे आदमी आब चंद्रमापर पहुँचि गेलै, ठोर पर फकड़ा आबि गेल रहै । मुदा तें ओ चौरचन कयनाइ नहि छोड़ने रहय ! कहै– ‘भाय कतउ झूठ भेलय ! आ तै पर सऽ बेटा हमर मामा बिनु लिलोह भऽ जायत !’
अमनक माथ मुदा तैयो नहि छोड़ि रहल छलै । एखने तॅं हलुकायल छलै, फेर भारी भऽ गेलै ! ओना एकरा भारी होयब नहियों कहल जा सकै छै ! परदेसी जे भऽ गेल अछि । आ तें ऑंखि मे ओही गामक चित्र खचित छै । आ से नीक लगैत छै । मुदा से कहियो काल ।
आबक गाम तॅं जेना कौतूहल उत्पन्न करैत छै । ओना कौतूहल तॅं तहिया सेहो जीबय, जहिया नेना रहय । गाम मे रहय । से ओ सभ टा मोन छै । कोना ओ धूर आ एकपैरिया डिस्ट्रिक्ट बोर्डक सड़क भऽ गेलै । फेर वएह पीडब्ल्यूडीक पक्की ! आ ई नवका तॅं हद्द छै! लोकक जिनगीये बदलि देलकै जेना । स्टेट हाईवे भऽ गेल छै ने…
ई हाइवे भेला सॅं सही मे बहुत बेसी अंतर आबि गेलैए ! परुके तॅं गाम आयल रहय । भैयाक पोताक उपनयनमे । आ से अपन घरारीयो नहि चिन्हयलै ! एसयूवी सॅं रहय । अख्यास करिते-करिते बहुत आगू बढ़ि गेल । ओ तॅं सुकुर भेलै जे आगू सड़क पर महींस आबि गेलै तॅं ई ब्रेक मारलक । मुदा तैयो ओकरा ठोकर लागि गेलै । बीचे सड़क पर खसि पड़लै ।
अमन तॅं अवाक् ! पलक झपकिते लोक सभ घेरि लेलकै । आकि तखनहि महींस फुरफुड़ा कऽ उठि सड़कक नीचा टपि गेलै । अमनक जान-मे-जान अयलै । फेर अपन परिचय देलकै । भीड़ मे सॅं क्यो चीन्हि लेलकै– ‘अरे ई तऽ सिबलग्गर गाॅं के हइ !’
– ‘जाह! तब एतना आगू कथी ला आ गेलै !’
– ‘अरे लयका सड़क के बनला के बाद आयल होतै…’
ताही मे सॅं क्यो बजलै–’बाबू, घुर जाइये पाछू मूहें । पाव भर आगू जभिये बढियेगा कि एगो चौक भेटायेगा ! बस, ऊहे हय सिबलग्गर…’
से अमन कें बहुत पीड़ा भेल रहै । जाहि भूमिपर जन्म भेलै, सैह अनचिन्हार भऽ गेलै । यदि रोजी-रोटी लेल जन्मभूमि नहि छोडऽ पड़ल रहितै तॅं एना नहि ने भेल रहितै । गाम-घर क्रमिक विकास कें अपने ऑंखि सॅं देखितय । ओह, पलायन जे दिन नहि देखबय !
अमन घरारी पर आबि कऽ कनी कालक लेल निस्पन्द भऽ गेल रहय । मुदा फेर काज-प्रयोजनक हूलि-मालि मे सभ टा मेटा गेल रहै । तीस-चालीस वर्ष पूर्वक घरारी कें खलखल हॅंसैत देखि अमन सही मे आत्मविभोर रहय ।
तखने क्यो चाय दऽ गेलै । फेर गोर लगलकै । पल उठा देखलक । रक्ष रहलै जे चीन्हि गेल– ‘भुखनी गे ?’
– ‘हॅं कका, यादे छी !’
– ‘एह, की बात करै छें !’
– ‘पर जब गामे-घर भूलि गेलिऐ, तब अइसन याद के कोन काम…’
आ एतबा कहैत ओ फेर अंगना मे ढुकि गेल । अमन कें अधलाह नहि लगलै । ओकर आरोप ठीके तॅं छलै । फेर चाय पिबैत सोचयलै जे धन्य अछि ई सभ, जे कतबो विपरीत मे गाम नहि छोड़लक ।
अमन कें फेर मोन पड़ि अयलै अपन ओ नेनपनक जीवन ! कष्टो मे कतेक आनन्द छलै ! बुढ़नद मे आयल बाढ़ि कें सेहो सब सकारात्मक रूप मे लेअय । ई सब आयल बाढ़िक पानि मे चुभकय, तॅं संध्याकाल स्त्रिगण कमलेश्वरी कें महारानी मानि कऽ सांझ दिअय, आ खुशीक गीत गाबय। कमलेश्वरी सेहो जाइत-जाइत अपन पाछू पाॅंक कें छोड़ि जाइ । पाॅंक मे की जादू रहै, जेना सोना उगिलै खेत सभ । खूब-खूब कऽ उपजा दैक।
मुदा आब तॅं ओकर रस्ते कें बन्द करबाक अभियान चलि पड़लै । फेर तॅं बाढ़ि सेहो रूसि रहलै, अनियमित भऽ गेलै । आ जकर फल भेलै जे खेत-पथार सभ उपजब छोड़ि देलकै । बाॅंझ भऽ गेलै जेना !
लगभग वएह ओ कालखंड रहल छल हैतै, गाम मे पीच बनब शुरू भऽ गेलै, कच्ची सड़क पक्की होबऽ लगलै। एकटा सपनाक पूर होबऽ सन लोक देखलक । ओ सपना सुखद रहै ।
फेर पहिने तॅं धीरे-धीरे, मुदा बाद मे बहुत तेजी सॅं शहर सॅं गाड़ी सभ आयब शुरू भऽ गेलै। अमन कें मोन पड़लै, ओही कोनो लौटती गाड़ी पर चढ़ि ओ शहर चलि आयल । गाम पर भूखल रहला सॅं नीक बुझयलै शहर मे रोजी-रोटीक तलाश करब…
पहिने शहर सेहो एहन लोकगर नहि रहै । से कलकत्ताक एकटा जूट फैक्ट्रीमे काज लागि गेलै । आब जखन काज लागि गेलै तॅं एक दा गाम जा कऽ परिवार कें लेन्नहि चल आयल। फेर आयल तॅं सदाक लेल एत्तहि के भऽ कऽ रहि गेल…
सोचैत-सोचैत अमनक मोन बेचैन भऽ गेलै । ऑंखि से डबडबा गेलै । जाहि सपनाकें लऽ कऽ गाम सॅं शहर आयल, से सपना ओकर भूखक अति कें जेना अनंत खोह मे धकेलने चलल गेलै…
से अमन कें जेना मिरगी लागि गेल होइ, ओ शहर सॅं पलायनक बात सोचऽ लागल छल । मुदा ओतऽ सॅं कतऽ जायत ! गाम जायब फेकल थूक चाटब बुझयलै । मुदा कनी काल लेल थूक चाटियो लैत अछि तॅं ओ गाम कतऽ भेटतै ! गाम मे शहर आबि कऽ एकरा कहिया ने शहर लऽ कऽ चल गेलै ।
एक बेर एहिना कोनो काजे अमन गाम आयल रहय तॅं एक दिन मोन मे भेलै जे गाम घूमल जाय । ओना ‘घूमब’ शब्द सेहो अंदर कने ठेकल रहै ! तैयो मोन तॅं मोने रहै ।
अन्दर गाम मे अंदर तक गेल । मुदा ओतऽ तॅं ओकर ओ गाम नहि छलै ! ई तॅं सभहक खढ़क घर देखने रहय । बहुत सम्पन्न जे सब छलै ओकरा चार पर खपड़ा छलै । मुदा आइ ओ सब झूठ लगैत छलै । एतय तॅं सभहक घर पक्का…
मुदा घुमैत-घुमैत जखन ओ गामक अंतिम सिमान धरि पहुँचल तॅं चकित रहि गेल ! गामक प्रायः आधा घरारी जंगलाह बनि गेल छलै, आ सभक घर मे ताला लटकैत छलै ! आ से अमनकें अपन गाम दिनो मे भयाओन लगलै !
ओ तॅं सोचने रहय जे दलान सभ पर गौऑं सभ ताश खेलैत हैतै ! अवसर पाबि एकाध हाथ खेलियो लेब । नहि तॅं पलटू चा’क मचान पर तॅं अवश्ये शतरंज चलैत हैतै ! आ पचीसी सेहो तॅं प्रायः एही मास मे खेलल जाइत छै । मुदा कत्तहु किछु नहि। जेना दिनो मे कुकुर कनैत सन…
इएह सभ सोचैत अमन घुरि रहल छल कि एक गोटेक घरारीपर किछु फुसुर-फुसुर सुनयलै । डेग मद्धिम भऽ गेलै । एक गोटे दोसर सॅं पुछलकै– ‘से आखिर की भेलै ?’
– ‘की कहियौ, निरसू ठाकुर के जे पोता रहै, टुटि गेलै !’
– ‘कोना से ?’
– ‘चरस के आदी रहै ने!’
– ‘ॲंय ! ओ तऽ पंद्रहो बर्खक नै भेल रहै !’
– ‘ताइ सऽ की होइ छै ! गाममे ई सभ आम बात छै…’
– ‘पहिने चीलम आ दारू दिया तऽ सुनै छलिऐ…’
आब अमनक धैर्य थरथरा गेल रहै । ओ डेग झाड़ैत आगू बढ़ि गेल रहय । फेर चलैत-चलैत सोचलक रहय– ई हमर गाम तॅं लगैत छै जेना ‘उड़ता पंजाब’ भेल जाइत अछि !…
इएह सभ बुनैत अमन गाम दऽ कऽ जाइत स्टेट हाइवे लग आबि गेल । मुदा सड़क पार करबा लेल कनी देर ठमकऽ पड़लै ।