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मैथिली कविताः नै जानि किए ?





सुतल निन्दसँ हमरा नै जानि किए उठबैत छल
पड़ल देख हमरा नै जानि किए नोर बहबैत छल ।।

भिर लागल एहि कोणसँ ओहि कोण तक
नै जानि किए हम्मर देहके झमाइर बजबैत छल ।।

लगमे हम्मर तुलसी राखि धुप सेहो गमकाबैत छल
सुतलेमे हमरा नै जानि किए सभ भिजबैत छल ।।

धिरे धिरे पलङसँ हमरा फर्कीपर घुसकाबैत छल
हित अहित छुबए लेल हमरा नै जानि किए रुकबैत छल ।।

कन्हापर उठा कऽ हमरा, राम नाम सत्यके नारा लगबैत छल
चारु ओरसँ हमरा नै जानि किए आगिसँ झरकबैत छल ।।

हम हकैम रहल छलौँ जखन हमरासँ सभ मुह नुकबैत छल
हम काँपि रहल छलौँ नै जानि किए हमरा अपने सब बिसरबैत छल ।।