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मैथिली कथाः न्याय निसाफ





 डा. सुरेन्द्र लाभ

बसबारि दिस चील कौवा के उडैत देखि बिश्रामपुरबालीक करेज फेर धड़धड़ाए लगलै।

अपन घरक असोरापर परल परल टुकुर टुकुर देखैत रहल । देहमे जेना एकोरत्ती जाने ने होइक । केहन अन्हर विहाडि उठलै ? ओकरा किछु बुझबामे नहि अएलै । की अहुना भ’ सकैय ? की ओकरे जीनगी संगे एना भेलैक ? ओकरे करेजाक टुकडा सँगै एहन कुरुप घटना ओकर अप्पन कहएवला जाइत बेरादर क’ देलकै? जेना सब घटना सपना होइक । 

आइ भोरे एकबैग लाठीधारीसभक समूह ओकरा घरमे घुसि गेलैक  । सब ओकर अपने देयाद– वाद रहैक । केयो भैंसुर, केयो ससुर, केयो देयोर त केयो जाउत । सव हो हो करैत ओकरा घरमे पैसल रहैक , एक्कहिटा बात बजैक –‘निकाल । निकाल विश्रामपुर बाली के ’

दुनू बेटी केँ किछु बुझबामे नहि अएलैक । आखिर ओकर माई के कीया निकालबाक बात लोक क’ रहल छैक ? दुनू डरे घरक एकटा कोन्हमे सिमटि गेल , विश्रामपुरबाली अपन नवजात बेटाकेँ करेजमे सटने ओहिना पडल रहल । करेज धडधडा रहल छलैक ‘भाथी जकाँ’ ।  सम्पूर्ण शरिर थराथरा रहल छलैक रातिए त’ बेटा जन्मल रहैक । कमजोरियो ततवे रहैक । 

ससुर परएवला बुढवा गरजलै –’गे छिनारि, बेटा जलमाबेके एतबे शौख रहौक त अपना जातिसे वियाह क’ लिते  ।’

‘अपना साईंके त जवानीए मे चीवा गेलै त कहै छहो वियाह करे , मार एकरा ।’ जोरसँ लाठी धरतीपर बजारलकै देयादी भैसुर । 

एतबा सुनिते लठैतहसब  विश्रामपुरवालीके देहेपर लाठी बजारए लगलै ।

फेर बुढवा गरजलै – ‘रे बच्चाके छिन । ‘

सबगोटेमिलि बच्चाके छिनिक’  बाहर जाय लागल । विश्रामपुरवाली चोट सँ छटपटा रहल छलैक । तथापि बुढबाक पएर जोरसँ पकडि चिचियाए लागल– 

‘नै हो बाबू हमर बच्चाके द दा , हमर परान हए ई । ’

बुढबाक पएर पकडने पकडने ओ असोरापर चलि आएल छल –घिसियाइत तिरियाइत  ।

अकस्मात बुढवा बच्चाके नीचाँ पटकैत बजलै –

                    ‘त ले तोहर पराने खतम क दै छियौ । ’

धडामसँ लेहुुआएल पेहुआएल नवजात शिशु नीचाँ खसलै आ तत्पश्चात कहिने कतेको लाठी प्रहार ओकर देह पर भेलैक । कंश सँ कठोर भ’ गेल रहैक दर देयाद । निर्ममताक पराकाष्ठा ओसब पार क’ गेलै । परान कतहु कोनो कोन्हमे वाँकी ने रहि जाइक – ताहि आशंकासँ बेर बेर ओहि शिशुकेँ लाठी सँ थकुचल गेलैक । ओकर परान कखन उडि गेलैक ककरो बुझबामे नहि अएलैक । विश्रामपुरवाली कखन बेहोश भ’ गेल छलि– सेहो नहि केयो बुझि सकलै । ककरो फुर्सति कहाँ रहैक । कहिने कोन संस्कार , कोन परम्परा, कोन प्रतिष्ठा, आ कोन मानवता क’ नशा मे सव चूर छल । नवजात शिशुक हत्याकवाद ओसव लाशकेँ वँसवारिमे फेकिदेने रहैक । 

सँउसे गाममे अनघोल उठिगेल रहैक । लठैत सव अपन जातिक नाक बचएबाक उपलक्ष्यमे गामक चौकपर डटल छल निर्लज्जभ’ । विश्रामपुरवालीक जेठकी सौतिन भोरे सँ धनकटनीमे पछबरीया चौरी गेल रहैक । ओत्तहि ओकरा सम्पूर्ण बृतान्त पता लगलैक । ओ रणचन्डी भ’ गाम घुरल   । फाँड वान्हल, आँखिलाल टुह टुह आ हाथमे हँसुआ । 

‘के हमर सौतिन केँ मारत ? विश्रामपुरवाली हमर सौतिन नै वहिन हए ? ओकर वेटा के मार’ वला के ? हम सबके गरदैन रेटि देवै । सवके जहल पठादेवै ।’  गर्जैत आ हनहनाइत चौकपर पहुँचल  ।

सव लठैत ठार भ’ गेल । फेर चिकडए लागल सौतिन – ‘ रे रछसबासब ? जाइत के ठिकदार सब ? तोँ सब हमर बेटा के मारेवला ? ककरा घरमे की होइछौ – से हम नै जनै छियौ ? सव पोल खोइल दियौ? तोँसब वर सतबरता छेँ –एक एकटा के छिन्है छियौ । ’

ओकरा जेना भूत लागि गेल होइक । बडीकाल धरि अहिना बकैत रहलै । कनेक स्थीर भेलै त’ बुढवा गरजलै –‘गे सुन , वड बजले  । जो कोन थाना चौकिदार लग जाइ छे जो । लेकिन एगो बात सुनि ले । ई जातिके सवाल है । कानूनो नै कुच्छो करतौ । समाजके कानून सवसे बडका कानून होइहै । अई छिनारिके गाँव स निकाल नै त  दुनू बेटियो के वियाह नै होतौ  । ई समाजके फैसला है  । ’

ओ चारुभर तकलक ।  समाजके फैसलापर सव मुडी डोला रहल छल  । ओ चुपचाप घर पहुँचल । विश्रामपुरवाली असोरापर परल वँसवारि दिस टुकुर टुकुर ताकि रहल छलैक । कोरा सुन्न छलैक । दुनू वेटी घरक एकटा कोन्ह मे दुवकल छलैक । 

भभकौवा कलसँ पानि आनि दुनू वेटीकेँ पियौलक आ करेजमे सटलक । भयाक्रान्त दुनूक जानमे किछु जान अएलैक । फेर विश्रामपुरवालीलग आएल आ ओकर देहपर हाथ राखि बाजए लागल – ‘गे हमरा कोइख से बच्चा नै जलमल तैसे हमही नै अपन घरवला सँ तोरा वियाह करबैलियौ । भगवान दु गो वेटी देलकौ । बेटी भेलै तैसेकी  ? हमरा निम्मन लागल  । अपने कोइखसे जलमल जैसन लागल । लेकिन अपना सुनके भागे खराप रहौ । घरवलाके विमारी भेलै आ फटसे चलि गेलौ संसार से  । दू बरिष भेलै । कतेक चैन से रहे । लेकिन ओइ मूहझौँसा हेमलरएना से संगत की भेलौ तोरा कि आई एहन दिन देखए परल  । ’

विश्रामपुरवालीक अन्तरमन मे संसार घुमि रहल छलैक । ठोरपर फिफडी परिरहल छलैक । शरिरक पोर पोर पर दर्द छलैक । एकत’ रातिए नवजात शिशुक ओ जन्म देने छलैक । महिला बच्चाके जन्मेटानहि दैत छैक,  स्वंयके पुनर्जन्मो होइत छैक । प्रसव पीडासँ उबरवो नहि कायल छल विश्रामपुरवली कि आई ई बज्रपात भ’ गेलैक । 

तथापि वहुत हिम्मत क’ क’ ओ बाजलि –‘दिदी हम त गल्ती कएलियौ । ओइ मुहझौँसा के  मिठ वोलीमे चलि अएलियौ । एकदिन दारु पियाके हमरा कहलक जे बलू तोरा दूगो वेटीए हौ विना वेटाके जिनगी केना कटतउ । हमरा देख सातगो बेटेहए  । जलतर मलतर सेहो जनै छी  । जे सम्परक कएलक ओकरा बेटे भेलै । बस अही बोली मे हम फँसि गेलियौ । लेकिन दिदी अई गल्तीके   इहे न्याय है ? इहे निसाफ है ?’ दिदी जातिक निर्णय सुनौलकै – ‘देख विश्रामपुरवाली हमरा कुच्छो नै बुझल हौ, कथी न्याय है आ कथी अन्याय । उ सुन कहकउअ जे तोँ गाँव से निकलि जो नै त  बेटी सुनके वियाहो नै होअ देतौ । ’

विश्रामपुरवाली फेर बाजल ’सुनै छियै देशमे परजातन्त्र अएलै, माहावादी अएलै । इहे है ? एकरे कहे है ? 

सौतिन बजलै ‘ई सव छोर । तोँ गाँव छोडि दे बेटी सवके खतिर ।  हम कमाखटाके बेटीके वियाह क’ देवौ  । ’

विश्रामपुरवाली चुप नै भ’ रहल छल – ‘सुनै छलियौ आव दलित के, महिलाके सव इज्जत करतै ।

इहे इज्जत है ? मरदपर कोनो कानून नै है ? गे हम बड गल्ती कैली त हमरा जान से मारि दितै । ओइ अवोध के कोन गल्ती रहै ?’ सौतिन कहलकै ‘गे हम त ओइ भट्टीवला हेमलरएना के टिकी नोचि लितियै , लेकिन काल्हिए रातिमे हम देखने रहियै …….’

कथी ?

–‘जेसव अइजगन आविक’ राछसी नाच कएलकउ सवके उ हेमलरएना राइत भरि माउस खुअएलकै आ दारु पिएलकै । सरधुवाके डर रहै जे छौडा वडका भ’ के अंश मंगतै । ओकराकी कहवही, अपने जाइत सुन धोखा देलकौ गे बहिन ।’ हेमनारायण आ जातिक पोल खुजिते विश्रामपुरवाली एक लोइया थुक फेकलक ओकरासभक नामपर आ बाजल ‘दिदी आब तोही कह ’

‘ देख तोँ अपन वाप मतारी लग चलि जो । बेटीके वियाह के सवाल हौ । ’

विश्रामपुरवाली लडखडाइत उठल ‘हम जाइछी दिदी ओइ नेता सूनके खोजे जे अपनाके गरिवके नेता कहै है । हम जाइछियौ, दलितके ठिकेदार सूनके खोजे । हम जाइछियौ, शहरमे रहए वला ओइ अधिकार वादी नेतासवके खोजे जकरा गाँवके जलकारिए नै है जे एत्त कि–कि होइहै । हम जाइछियौ न्याय खोजे ।’ विश्रामपुरवाली वडवडा रहल छल । 

 ओकर सौतिन दुनू बेटीकेँ करेजमे सटौलकै । जाइत जाइत फेर विश्रामपुरवाली कहलकै –‘देख दिदी जोइनढाहासव गाडवो नै कएलकै, केना चील कौआ उडै है ?

सौतिनके नजरि वँसवारि दिस गेलै – चील कौवा उडि रहल छलैक । कुकुरसवकेँ भुकवाक आवाज आवि रहल छलैक । कतहु सँ नढेयाक आवाज सेहो कान मे पडलै–‘ कोना सव मिलिके रुइया जेका बौआके नोचैत होतै ।’ सोचि शरिर झनझना गेलै आ रोआसव काँट जकाँ टाढ भ’ गेलै ।