मैथिली कथा – पान
♦ विभूति आनन्द
– ‘एना उदास किए छी ?’
– ‘न:, उदास कहां छी !’
– ‘तऽ आब झूठ बाजब सेहो सीख गेलिऐ ?’
– ‘नै तऽ !’
– ‘तऽ हम झूठ बजै छी ?’
– ‘से तऽ अहां जानी…’
– ‘एना एतेक दूरी किएक ?’
– ‘तकरो उत्तर तऽ अहीं देब ने !…’
– ‘आब हम की कहू…’
– ‘किछु कहबाक मुंह कहां रहल !’
– ‘हम के छी, से अहां जनै छी ?’
– ‘रही, मुदा आब नहि !’
– ‘एहन अपस्वार्थी तऽ नै रही !’
– ‘हम, कि अहां ?’
– ‘लगैए बहुत तामस मे छी…’
– ‘हम किए तामस करब !’
– ‘मतलब !’
– ‘तामस तऽ अप्पन लोक पर लोक करै छै…’
– ‘तऽ हम अप्पन लोक नै छी ?’
– ‘तकरो उत्तर अपनहि सऽ पूछि लिअ !’
आकि तखने शरदक भक् टुटलै । संतोषी टोकने रहै– ‘चच्चा, चाय !’
– ‘हॅं हॅं, लाह ! तुक पर अनलें !’
आ संतोषी बिनु कोनो उत्तर देने अंदर चल गेलै । ओकर आदत जकां छै ई । जरूरतेक हिसाब सं बाजत । नहि तं चुपचाप काज करैत रहत । मुदा काज समाप्त भेलाक बाद अवश्य बाजि देत– ‘तब जाइ छी चच्चा !’ आ शरद सेहो मोटा-मोटी पल उठा ताकि देतै ।
शरद चायक एक चुस्की लेलक । नीक ! भोरक पहिल चायक किछु बाते अलग छै । मुदा शब्दशः बाजल किछु नहि ।
ईहो एकर स्वभाव मे सं एक छै । बेसी काल मोनहि-मोन बात करत । आ संतुष्ट भऽ जायत । अथवा एकरा एना मानू जे जं ककरो किछु कहक छै, खास कऽ संतोषी कें, तं तकरो मोनहि-मोन कहि देत ! मुदा बाद मे जं ओ काज नहि भेलै, तखन बाजत– ‘संतोषी !…’
– ‘की !’
– ‘तोरा किछु कहब आब बेकार…’
– ‘जाह ! तऽ कुछ बोलबै तब न !’
– ‘काल्हि किछु कहने रहियौ !’
– ‘न:, कहां कुछो !’
– ‘आब तखन छोड़ । जखन कहलो बात बिसरि जाइ छें…’
– ‘चचा एगो बात बोलू !’
– ‘बाजिये दे…’
– ‘अहां बहुत बात मोने मे सोचि लै छिऐ, आ बुझै छिऐ जे बोइल देलिऐ !’
– ‘आब अइ जबरदस्ती के हमरा लग कोन जबाब नै अछि…’
– ‘हमरा बड़ मस्किल हय ! हमर बात पर बिसबासे नै होइए हय तब हम की बोलू…’
आ से आइ जखन संतोषी काम-धाम कऽ कऽ जाय लगलै तं गेट लग जा कऽ बजलै– ‘जाइ छिऐ !’
– ‘अच्छा ठीक छै, जो…’
मुदा ओ नहि गेलै । ठाढ़े रहलै । आ से एकाध मिनट बाद जखन शरद गेट बंद करऽ लेल उठलै तं संतोषी कें ठाढ़े देखलकै! आश्चर्य भेलै । टोकि देलकै– ‘की बात, गेलही नै!’
ओ कनी बिहुंसि देलकै। फेर बजलै– ‘कुछ कहे के नै न हय !’
– ‘की ! कहां किछु !’
– ‘ठीक हइ, तब जाइ छी ! संझिया फेनू न कहबै जे संतोषी, हम तऽ कहने रहियौ !’
– ‘साफ-साफ कह ने ! भूत जकां किए दस टा डारि…’
– ‘आइ अहां सभ के कोइ पबनी हय न…’
– ‘अरे हं, देखही बिसरिये गेल रहियौ ! आइ तऽ कोजगरा छै ! सुन ने, सांझ खन मखान लेने अबिहें । खीर खाइ छिऐ ने सभ साल ! पाइ छौ ?’
आ ओ ‘हं, हो जतै’ कहैत चल गेलै ।
शरद कनी काल तं एमहर-ओमहर करैत रहल, फेर जेना अतीत मे आबि गेल– एह, नेनपनक ओ दिन कतेक नीक रहय ! पिता जी खाली समय मे अनेक तरहक लौकिक-अलौकिक गप-सप सभ कहल करथि ! हुनक ज्ञान जेना हमरा अथाह लागय । इएह शरद पूर्णिमाक मादे कहथि जे आजुक राति आकाश सं अमृतक बरखा होइ छै ! प्रायः ताही सब कारणें हमरा सभकें रातुक दस सं बारह बजे तक आकाशक नीचा आंगन मे टहलऽबैत रहथि !
फेर एही संग अनेक-अनेक गूढ़ गप सभ । ज्योतिषक आधार लऽकऽ कहथि जे एहि राति चंद्रमा अपन ‘सोलहो कला’ सं परिपूर्ण रहै छथि । एही राति महापंडित रावण चन्द्रमाक किरण कें अएना द्वारा अपन नाभि पर लऽ आनथि ! आ ताही कारणें हुनका पुनर्यौवन प्राप्त भेल करनि ! एतबय नहि, अजुके राति श्रीकृष्ण महारास कएने रहथि, लक्ष्मीक जन्म भेल रहनि आइये, आ ओ धरती पर रहबा लेल आयल रहथि ! आजुक राति खीर खयबाक चाही । ई अमृत-गुण सॅं युक्त रहैत छै, आदि आदि…
सोचैत, आ अतीतमे बौआइत शरदक मोन अकबका गेलै। ईहो अजीब देश अछि ! आइ जखन ई सिद्ध भऽ गेलै जे जेना पृथ्वी ग्रह छै तहिना चंद्रमा सेहो । मुदा नहि । आब जं एहि मादे तर्कसंगत गप करू तं आस्था पर आघात करब मानि लेल जाइत छै । आ से इस्लामिक तं सहजहि, सनातनी द्वारा सेहो ।
शरद ओना एकर लौकिक पक्ष लऽ कऽ, आ क्षेत्रीय पाबनि लऽ कऽ काफी सकारात्मक रुखि रखैत अछि । एकरा मखान काफी स्वाद भरल लगैत छै। खीर सेहो आ भूजल सेहो। आ ताही कारणे कोजगरा सेहो ! कोजगरा मे ‘पचीसी’ खेलल जाइत छै ! नवविवाहित लड़का आ भाउजक बीच । ओना ई एक पक्ष भेलै, शरदक असली ध्यान रहैत छै एहि मास खेलल जाइत पचीसीपर ! कृषि कर्म सं निश्चिंत किसान सभ खाली समय मे ई खेल खेलैत अछि । आ से दलाने-दलाने पुरुष, तं अंगने-अंगने स्त्रिगण !
मुदा एकाएक शरदक ठोर सं निकलि गेलै– ‘जाह !’ फेर प्रकृतस्थ भेल । ई सभ टा खिस्सा, ई सभटा अतीतोल्लासक संसार। जीवनक यथार्थ सं दूर, बहुत दूर, कोसो दूर ! आ जे मात्र कल्पना टा, मखमली कल्पना टा ! सोचि कऽ नीक तं लगैत छै, मुदा फेर-फेर जीयल नहि जा सकैत छै । तें एहन उल्लास कष्टकारक, निरर्थक…
तें आजुक सत्य मात्र इएह जे एही शरद पूर्णिमाक लाथ सं शरद मखानक खीर खयलक । से मोन मे बसल छलै तें, आकि जाहि कोनो कारण सं, स्वाद धरि अपूर्व रहै ! ओना मानी तं एहि मे संतोषीक समर्पण अधिक छलै । मुदा एहि सत्य कें प्रतिष्ठा कहां देल जाइत रहलै !
शरद कें भेलै जे अधिक रुक्ख हैब सेहो ठीक नहि। आब जे छै, जेना छै, ठीके छै । आइ लोकक अपने निजी जीवन तते ने संकटग्रस्त छै, जे ताही सं छुट्टी नहि भेटैत छै !
शरदक मोन उबिया गेलै । घड़ी देखलक । साढ़े नओ । आब दिन छोट होबऽ लागल छै । आ निन्न सेहो उदासीन बुझयलै । फेर मोन मे की-ने-की अयलै, छत पर आबि गेल ।
शरद कें उम्मीद नहि छलै । मौसम मे हल्लुक-हल्लुक सन सिहरन छलै । मने सही मे शरद ऋतुक आगमन भऽ गेलै । शहरक एहि जन-जंगल मे प्रकृतिक करोट फेरबाक बोध धरि मन सं उतरि गेलै । इएह जं गाम मे रहैत तं कोनो कपड़ा अवश्य पहीरि लेने रहैत ! नहि किछु तं देह पर गमछे धऽ लीतय !
शरद कें तथापि नीक लागि रहलै मौसम । चतुर्दिक इजोतक कृत्रिम साम्राज्यक अछैतो एहि रातुक आकाश, ओकर शुभ्रता मलिन नहि भेल छै । लगै जेना आकाश सं कल्पित अमृत बरखा भऽ रहल छै । आ ताहि नीचा ई अमृत स्नान कऽ रहल अछि ! फेर ओकरा भ्रम सन भेलै । कदाचित आकाश सं पारिजात फूलक बरखा तं ने भऽ रहल छै ! शरद भावनावश अपन शरीर कें स्पर्श कैलक। मुदा जाह ! कहां किछु ! ऊपर तकलक । ओतहु नब किछु नहि । तें ई सभटा बुद्धिक बितंडा लगलै…
तथापि शरद छत पर टहलैत रहल । एसगर । भरिसक एकरहि बतहपनी कहल जयतै । आनो-आन छत पर क्यो नहि । आब ककरो अमृतक दरकार नहि। दिन भरिक झमारल सभ सूतल हैत । फेर काल्हि लेल ऊर्जा जोगबैत । जीवनक सत्य इएह छै । शेष सभटा बुद्धिक विलास । हास-परिहास । जीवनक एकरसताक विरुद्ध मनुष्य द्वारा रचल-उचारल गेल लाथ…
शरद छतक घेरा लग आयल । आ ओतहि बैसि गेल । फेर की फुड़लै, ओहि घेरा सं ओंगठि गेल । मूड़ी स्वतः आकाश दिस उठि गेलै। पूर्णिमाक शुभ्रता आंखि कें शीतलता दैत सन लगलै । भेलै जेना राति भरि एहिना बैसल विस्तृत आकाशकें निहारैत रही । आ चंद्रमाक संग किछु-किछु बतिआइत रही! किछु-किछु किएक, प्रेम ! खांटी प्रेम रंग मे डूमि जाइ। ताही खन मोहम्मद रफीक गायल गीत स्मरण भऽ अयलै– ‘तुम सामने बैठी रहो, मैं गीत गाऊं प्यार के…’
– ‘बिगरले छिऐ !’
कोनो परिचित स्त्री-स्वर सं जेना शरदक एकाग्रता भंग भेलै– ‘के ? के छी अहां !’
– ‘बिसरि गेलौं !’
– ‘अपन परिचय तऽ दिअ !’
– ‘लगैए बहुत बिगरल छिऐ !’
– ‘ओह !’
– ‘अइ छत किए बैसल छी! ठंढा-गरम के मौसम छै। दोरस । मोन खराब भऽ जायत…’
– ‘अहां के छी ? हमरा किए डरा रहलि छी!’
– ‘मोन होइए फेर एक दाव पचीसी खेलैतौं !’
– ‘अरे ! तऽ अहां…’
– ‘… हं, अहांक आधा अंगक पटिदार !…’
आ शरदक भक् टुटि गेल छलै। फेर भेलै जे एहि मोन कें की कही ! आभार व्यक्त करी, अथवा दुलार ! आकि दुत्कार !
एही द्वंद्व मे उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेल। निन्न पड़ा गेल छलै। तखने मोन पड़लै– अरे जाह, लगाओल पान तं रहिये गेल !