

♦ रोशन जनकपुरी
१-
गान्धीमार्ग
मन नइँ मानलकै । ओ एकटा जोगीजी स पुछिए देलकै – “महाराज ! वैष्णव जन तो तेने कहिए, पीर पराई जाने रे , एकर अर्थ जनै छियै ने ? गान्धीजी के ई गीत बड्ड नीक लगैन ।”
आकि बबाल मइच गेलै । ओकरा बुझयलै, सब ओकरे दिस दौड़ रहल अइछ , त्रिशूल, फरसा, गदा, लाठी, मुङरी, सब । ओ लंक लाइग क’ भागल । बदहवास ओ दौड़ैत रहल । ई ओ शहर नइँ छल, जतह ओ आयल छल । अपनासन लाग’बला सब अनजान, तैँ शहरो अनजान छल ओकरालेल । ओ सोँचैत रहल आ भगैत रहल माथपर पैर धयने। वैष्णव जन …, अल्ला ईश्वर तेरो नाम… के भजन अनघोल मचबैत रहल , आ भीड़ सेहो ओकरा पाछू दौड़ैत रहल । भीड़मे सेहो किछु भाइग रहल छल आ किछु खेहाइर रहल छल । शहरमे भजन छल, कि स्तुति , कि अजान, बाँकी सब सुनसान । कोम्हर जाय ओ ? गान्धी सब चौकपर ठाढ़ छलाह लाठी नेने, मुदा मुरुत बनल । एक गोटे भेटलै ओकरा । ओ पुछलकै “-ई कोन पथ अइछ ?”
“गान्धीपथ ।”- जबाब भेटलै ।
“ई पथ शहर स बहराइत अइछ कि नइँ ? ” _ ओ दोसर प्रश्न कयलक ।
“पता नइँ !” – ओ पिद्दीसन लाग’बला आदमी गल्लीमे घुसिया गेल ।
ओ उनैट क’ तकलक । लाठीबला गान्धीबबा ओहिना मुरुत बनले छलाह । ओ जोर स साँस लेलक आ भागल । सुनसान शहरमे, ओ दौड़ैत रहल, भगैत रहल । मुदा ई गान्धीपथ छल जे खतमे नइँ भ’ रहल छल ……..।
२-
इश्वरभक्त
ओ पहिने कहलकै – “हे ईश्वर ! दिक्कत अइछ , एकटा गाड़ी दिता ।”
फेर ओकरा बुझयलै जे ईश्वर एना, डाइरेक्ट त नइँ दैछै । ईश्वर त प्रेरित करैछै ।
ओ एकटा नीक गाड़ी चोरी कयलक आ हँसैत बाजल – “सब तोरे कृपा छौ, सब तोरे माया छौ हे ईश्वर ! हमरा माफ करिहा ।”
