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मैथिली कविताः कला





धीरेन्द्र कुमार झा ‘धीरेन्द्र’

ईश्वरक ई कृपा सभमे छै मधु कला बहु कलात्मक रचल गेल सृष्टि कला ॥

चान चमकय गगनमे प्रकृति छै ओकर शैत्य किरिनक प्रसारब थिकै शशिकला ॥

भानु उगि कें उजारय तिमिरतोमकें जग प्रकाशित करब छै नियति रविकला ॥

पाइन भापो बनय पुनि बनै पाइन अछि जगकें पटबैछ ,भल जलके अनुपम कला ॥

नित बहब सृष्टि मे संचरब हरघड़ी प्राणरक्षक पवनके अपन शुभकला ॥

भार सदिखन बहब लोक गंजन सहब नित बचा सृष्टि राखब धराके कला ॥

सत्वरजतममढल माया मोहित जगत जाहि गुण जे प्रभावित से देखबय कला ॥

सबसं बडका कलाकार अखिलेश छथि कर्म अनुसार सबहक देखाबथि कला ॥

पंचभूतहिं सुनिर्मित हरिक जग सृजन कवि धीरेन्द्रो अचंभित लखय हरिकला ॥

– दिल्ली