

♦ कर्ण संजय
ओ एकटा काल थिक
समय लिखि रहल छैक पटकथा
काल आओर मनुषक अन्र्तसम्बन्धके
एकटा समिmया रंगमञ्चपर
तैयार भ’ रहल छैक नाटक
जकर,सूत्रधारक भूमिकामे
ठाढ कएल गेल छी
हम स्वयं
अदृश्य हाथक निर्देशनमे
स्वःस्फूर्त अभिनयसँ परिभाषित जीवनक चित्रमे सँ
भरि बाकुट रंग,आकार,शब्द बटोरि क’
इतिहास लिखि रहल छैक, भविष्यक जोड–घटाओके योगफल ।
मृदगके तालपर
प्रवेश गान गबैत
नृत्य करैत गणिका सभके
प्रतीक्षा छैक नायकके
जेकर आगमनके बाद
तालीसँ गडगडा उठलैए सभागार
दूर नेपथ्यसँ
राजाके आगमनक
पूर्वहि भेल छैक आकाशवाणी
स्वांग रचि रहल बिपटासभ
प्रहसनके मादे
कठपुतलीके नाच जेना
नेतृत्वक’ रहल छैक नया–क्रान्तिके
जुलुसमे सामिल किछु समकालिन नपुंसकसभ
आन्दोलनके नामपर क’ रहल छैक आत्महत्या ।
विष बोकैरैत अहि युगमे
रङ्ग आप्रकाशके संयोजनक दृश्यजकाँ
कखनो ईजोत तँ कखनो अन्हारमे
क्षणिक जीवन जीबैत मृत्यु–पात्र सभके चितापर
फेरसँ
जन्मिक’ ठाढ भेल छैक रङ्गमञ्च
नितान्त
फरक रङ्ग फरक दृश्य आ फरक भूमिकामे ।।
विराटनगर, मोरङ्ग
