

♦ कर्ण सञ्जय
कनिक आधासँ बेसी कनिक आधासँ कम
मरल छैक मिथिला
मरल छैक एकटा युग–जीबैत सभ्यता
अपन अपन सत्ता आ स्वार्थक मादे
छातीपर चढि
शोणित मे कलम बोरि क’ लिखल गेल छै कारी दस्तावेज
जेकर
रेखा रेखा मे विभाजित भेल छैक मनुख
मनुख मनुख मे विभाजित भेल छैक सीमा
सीमा सीमा मे विभाजित भेल छैक देश
पीजुयाएल घआजकाँ टभकैत
छाती मे भालाजकाँ भोकैत
सुगौली सन्धि (४ मार्च १८१६) के चिता पर राखल छैक लाश
हमर लाश, अहाँके लाश, मैथिलके लाश
अखण्ड मिथिलाके लाश ।
आब मनुख नहि मरैै छैक
मरै छैक मनुखक देह मे जीबैत देश
मरै छैक खण्ड खण्ड मे जीबैत भूगोल
मरै छैक सीमा मे सीमित छटपटाति लोक
मरै छैक भरि देह जीबैत स्वतन्त्र विचार ।
मिथिला के सारापर जन्मल किछु अनेरुआ तुलसी गाछ सभ
सब दिन साँमm मे दीप जारि
एक एकटा जाति के नाम पर
करैत रहै छै मन्त्र–पाठ आ महामत्युजय यज्ञ
मैथिली के कोखिसँ
भाषा के नाम पर जन्मल किछु दु–मूँहा साँपसभ
छुछे बोकरैत रहै छै विष ।
बेंगसन फुलि क’ मोटायल तानाशाह के राज मे
गिरगिट सभ मनोनित भेल छैक सभासद
मन्त्री के भारी ढोति मोटका मोटका मूस सभ
अपन जाँघ के देश बुझि
कोतरि रहल छैक
सीमा सँ ल’ क’ सिंहदरबार तक
वन सँ ल’ क’ बालुवाटार तक
मरघट सँ ल’ क’ अँठिकटार तक ।
चिल्हकाउरि जकाँ
करेज मे भूगोल सटने समय
इतिहासक देह मे जमल धूरा–गर्दाके झारैत
क्रान्ति के नामपर
अपने हाथे
टाँकि रहल छैक
पूर्वज के कोटक टुटल बटन सभ ।
विराटनगर
