

♦ सुरेन्द्र लाभ
पुस मासक राति । सम्पूर्ण गामक लोक अपन अपन घर मे दुबकल छल ।किछु लोक सिरक तरमे आरामसँ सुतल छल ।जकरा सिरक उपलब्ध नै रहै से अखनो घुर तापि रहल छल । जकरा नै सिरक रहै आ’ नै जरना रहै सेसब जाढे थरथरा रहल छल।
अकस्मात् पछबरिया टोलक कोनो घरसँ लहास उठलै ।क्षणेमे सँउसे टोल अग्नि ज्वालाक चपेटमे चलि अएलै।सिरक तरमे घुसिआएल युवासब अपन अपन मोबाइल लए दौगल । ओकरासब बिचक सम्बाद एना चलि रहल छल :-
भाई गज्जब के दृश्य छै !
धधरा देखहो धधरा !
रील बनो रील !
वाह एतेक सुन्दर दृश्य ?
भाइ रील भाईरल बनि जएतो ।
जल्दी जल्दी बनो नै त’ कहीँ मिझा नै जाई !
तों सब ओम्हर ओम्हर जा’ हम एम्हरसँ लै छियो ।
युवासब चारुभरि घुमि घुमि कए फोटो ल’ रहल छल । एकटा बुढ्वा चिचिआएल- ‘रे बाल्टिनमे पानि ल’ के दौगबे कि मोबाइल लके ?’ मुदा केयो ओकर आवाज सुनलकै नहि।
घुर तपैत लोक सोच में पडि गेल – ‘ ई घुर मिझाकए अगिलग्गी सँ अबैत ताओसँ फायदा लेल जाय कि अहिना घुर तपैत रहि जाए ।’ कोनो निर्णय नहि ल’ सकल । पूर्ववत घुर तपैत रहि गेल ।
जाढसँ थरथराइत लोकसब झट्टसँ आबि ताओ के तापए लागल ।बहुत दिनके बाद ओकरा कतहुसँ गरमाहट भेटि रहल छलैक ।परम सन्तुष्ट भाव सँ ओसब सोचि रहल छल – ‘ आई जान बांचि गेल , काल्हि देखल जएतैक।’
केयो शहर में दमकल के फोन क’ देलकै । दमकल के कर्मचारी टेलिफोन करएवला के मोने मोन गारि पढैत निर्णय लेलक – ‘ आब एतेक राति में के जएतैक ठन्ढा पानि छुब’ ? जे हएतै से काल्हि देखल जएतैक।’ भोरे ओहि गाममे बडका बडका नेता पहुँचल ,जत्था के जत्था मीडिया पहुँचल, प्रशासन के काफिला पहुँचल आ’ जोर जोरसँ सायरण बजबैत दमकल पहुँचल मुदा गाम रातिए छाउर भ’ गेल रहैक ।
