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मैथिली कविताः आ फेर हम हाइर जाइछी





♦  मोहन महतो कोइरी

मनके बात
मनेमे रह दियौ महोदय
बस अतेक बुझु कि पवित्र प्रेमक पियासल छी ।

भसकै है ।
हमर भाग्यसंगक सम्बन्ध
सुरुज आ चान जकाँ हेतै ।
जे सदैव एक–दोसर के विपक्ष मे रहै छै ।

मुदा, तैयो
सदिखन
हरेक भिन्सर
एक नव सकारात्मक उर्जाकसंग
एक नव जीवन के सुरुवात करैछी ।

हरेक दिन
अपन पवित्र प्रेमक प्राप्तिक लेल
हरेक संघर्षक केवारीके ढक–ढकवैत
हरेक साँझ जकाँ उदास भऽ जाइछी ।

तकर बाद भेट होइछै ।
एक अन्हरिया राइत संग
जे सदैव हमरा
अपनत्व महसुस करबैत रहैछै ।
हमर सहयात्री बैन कऽ

दिन बितैछै ।
चमचक करैत चान्दनी राइत
अनेकौं सपना लऽ कऽ
चैल अबैछै हमरा दुसएलेल

ओ अनेकौँ सपनासभ देखबैछै ।
हमर मन जितैछै ।
आ चक्नाचुर कदैछै ।
आ फेर हम हाइर जाइछी ।