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मैथिली कविता – शेष सबटा भ्रम थिक





 कर्ण संजय

जीब’ के प्रतिस्पर्घा मे
औना रहल जीवन के
भूख दूरहि सँ
दए रहल छै टिटकारी ।

जीवन मे उठैत सहस्रो आगिके धधरा मे सँ
किछु चिन्गीसब बटोरि
अपन अपन स्वार्थक चुल्हि पर
अतृप्त क्षुधा के भक्ष्य खातिर
अपने हाथे डाहैत रहैत छैक
मनुषे के मनुष ।

देह के काठ बना
सबटा शोणित चुसि
सलबला रहल मोटका मोटका जोंकसभ
लोभे लपलपाति लाल लाल जीभ सँ
देवार जकाँ
चाटि लेबय चाहै छैक माउससँ ल’ क’ अस्थिमज्जा तक
ब्लैकहोल जकाँ
संपूर्ण अस्तित्व तक के
घोटि जाए चाहैय छैक
मनुषे के मनुष ।

कतेको पाराकम्प गेल छैक अहि देह मे
देखलापर
माटिक देवालजकाँ फाँक फाँक फाटल छैक छाती
माथक टेटर सब मे जनैम गेल छैक गाछ
हाथक ठेला सब मे वहैत रहै छैक गन्हायल पानि
रीढ तक मे पसरि गेल छैक कुरियैनीवला दिनाई
बिन खेनहे दिन–दिन मोटाईत अहि शरिरके अकानैत रहै छैक नव गिद्घ सभ
आँखिक नोर सँ निरन्तर भीजैत भीजैत सडि गेल छैक देहक त्वचा सभ
आब त’
रोजगारी विज्ञापनके पोस्टर ब्वाई बना साटल जाए छैक बडका बडका होर्डिग बोर्ड सब मे
शहरक देवालसभ मे ।

घबहा कुकुरजकाँ अपने देहके नोचि नोचि
मmारैत रहै छैक सडलाहा पीलुआ सभ
आनक मूँहथरि सँ ल’ क’ अँठिकटार तक
घरक छुतहरि सँ ल’ क’ डीहबार तक ।

शून्यता भरल अहि जीवन मे
भुख चटैत देहक अक्षर सब
दःुख पढैत देहक शब्द सब
मृत्युक जीबैत देहक पाँति सब
सत्य छैक
शेष सबटा भ्रम थिक ।।

विराटनगर