

♦ रोशन जनकपुरी
“आदमी त सोझ, इमान्दार आ कर्तव्यनिष्ठ छै सर १ आई तक कोनो आरोप नइँ लागल छलै । पता नइँ केना फँइस गेलै बेचारा १”
“तब रु”
“सर, अपने निगाह क’ देबै त बइच जेतै । सर, अपने जे कहबै से बेबस्था भ’ जेतै ।”— ओ अपन सिनियर हाकिमके जबाब देलक ।
“माने की रु”—हाकिम बाजल ।
“सर, अपनेके कहैत डर होइय । ओना हमहुँ एहन लफड़ामे कहाँ परैछी । ओ त बेचारा ओइ खरदारके बालबच्चाके दुर्दशा देखलियै त, रहल नइँ गेल । सर, अपने एक नजैर द’ देबै त ओकर कल्याण भ’ जेतै ।”
“की कर’ परतै से ने कहू पान्डे जी १”— हाकिम अर्थपूर्ण ढंग स मुस्कियाइत बाजल ।
“सर, की कर’ परतै, ओकर मामला रफा दफा करा दियउ । अखन त तत्काल ई किछु उपहार राखल जाओ, बादमे जे जेना हेतै से कयल जेतै १”— पान्डे एकटा ब्रिफकेस हाकिम दिस बढ़ौलक आ बाजल— “ओना हमरा ई सब नीक नइँ लगैय, लेकिन।।।।।।।”
हाकिम मुस्कियायल । ड्राइभरके बजौलक आ ब्रिफकेस गाड़ीमे रखबाक निर्देश दैत बाजल —“ठीक छै, हम देखबै ।”
हाकिम सोफा पर पसैर गेल, मुस्कियाइत । ओ टेबुलपर राखल गिलास स ह्विस्कीके सिप लेलक, आ फेर बाजल —“एकटा बात पान्डेजी १ अहाँ त औफिसमे सब स इमान्दार आ कर्तव्यनिष्ठ कर्मचारी मानल जाइछी । अहाँ ओहि भ्रष्ट खरदारके बात कोना पतिया गेलहुँ रु”
पान्डे मुस्कियायल —“हँ सर १ से बात त छै, मुदा हमहुँ ओहिना पतिया गेलहुँ, जेना अहाँ हमरा पतिया गेलहुँ ।”
हाकिम हँसल । जोर जोर स भभा क’ हँसल, जेना कोनो जबर्दस्त चुटकुला होई ।
