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मैथिली कथाः अन्तिम पत्र





हम नहि बुझैत छी, अपनेकेँ आ हमराबीच मर्यादाक कोनो छाँह अछि । एहिद्वारे पुछैत छी अपनेसँ, ‘ई नाटक आएल कतएसँ ? ओहे अनपढ़ गबार देहातीक सँग अपनेक सम्बन्धेकेँ तऽ ई परिणाम अछि…. ओ महिलाकेँ भोगैत समयधरि अपनेकेँ विचार नहि आएल, ओ अनपढ़ गबार देहाती अछि ।’

 

सुजीत कुमार झा

नमस्कार ।
कोनो सम्बोधन एहि द्वारे नहि दऽ रहल छी, कारण अपनेक लेल हमरालग कोनो सम्बोधने नहि अछि । जखन अपन चारुदिस नजरि दोड़वैत छी, पबैत छी ओ सभ, हमरा लग अछि आ ओरसभक लेल हमरा लग उचित सम्बोधन अछि मुदा अपनेक लेल …. ?
अपनेक लेल हमरा लग किछु नहि अछि, नहि भावना आ नहि सम्बोधन । ओना यदि सम्बन्धक परिभाषा मानसँ देखल जाए तऽ अपनेकेँ आ हमरा बीचमे सेहो एकटा सूत्र जुड़ल अछि मुदा हम ओ सूत्रके नहि मानैत छी, एहि द्वारे ई पत्र लिख रहल छी ।
एतए एहि घरसँ जखन हमर बिदा होएबाक समय आबि गेल अछि, तखन स्मृतिक अध्यायसभकँे खोलैत पुरान पन्नाकँे टटौलैत पत्र अपनेकँे लिख रहल छी ।
विश्वास करी हम एना कहिओ नहि करए चाहैत छलहुँ, यदि चाहितहुँ तऽ एहिसँ पहिनहुँ कहिओ लिख देने रहितहुँ । आई यदि पत्र लिख रहल छी, तऽ ओकर पाछु एकटा बड़का कारण अछि । आ ई कारण अपनेसँ जुड़ल अछि आ हमरासँ सेहो ।
ई पत्र सम्भवतः अपने आ हमराबीचक पहिल सम्वाद अछि आ भगवानसँ हमर प्रार्थना अछि जे इहे अन्तिम हुए, कारण एहिद्वारे तऽ ई पत्र लिख रहल छी ।
पत्र शुरु करएसँ पहिने बहुत भूमिका एहिद्वारे बान्हि रहल छी, अपनेकेँ एना नहि बुझाए, ई एकटा लड़कीद्वारा भावुकतामे लिखल गेल पत्र अछि । ई पत्र एकटा सुदृढ़ मनस्थितिमे लिख रहल छी । एकटा बात पुनः दोहरा रहल छी जे लिख एहिद्वारे रहल छी, कारण एहिकेँ अतिरिक्त कोनो उपाए नहि अछि ।
हम सेहो नहि बुझैत छी, ओहिसमय यदि हम सोचि पवितहुँ तऽ कि सोचितहुँ जखन, हम मात्र किछु दिनक छलहुँ । सायद १० दिन पहिने हमर जन्म भेल छल । दाई कहैत अछि, अपने शहरसँ आएल छलहुँ आ बरण्डापर बैसल छलहुँ । जखन दाई ओहि १० दिनक हमरा अपनेक कोरामे राखि देने छल आ किछु बिहुँसैति कहने छल, ‘ले बौवा देखि ले अपन बेटीकेँ… ।’
आगाकेँ घटना बतवैत दाई किछु गम्भीर भऽ गेल मुदा बतौने अवश्य छल । सम्भवतः इहए बात अछि, हमरा एतेक मजगुत बनौलक । हम सोचैत छी, दाई सेहो सायद एहिद्वारे बेर–बेर ई घटना सुनौलक कारण ओहो हमरा एहने बनावए चाहैत छल । १० दिनक हम अपनेकँे कोरामे सुतले छलहुँ, अपने घृणासँ उठा कऽ, ई कहैत गोबरसँ निपल माटिपर पटैकि देने रही, ‘हटो ई नाटक, एक तऽ अनपढ़ गबार, देहाती हमरा बान्हि देलाएँ आ उपरसँ एहिसभ चक्करमे पड़ल रही ।’
दाई बतौने छल, तखन अहाँ सायद मात्र अपन सामान लेबाक लेल ओतए आएल छलहुँ । कारण तहिआ गेलाक बाद फेरसँ नहि एलहुँ । हम कहिओ नहि बिसरि पेलहुँ एहि बातकँे, अपने हमरा घृणासँ जमीनपर पटकि कऽ एकटा नाम देलहुँ ‘नाटक’ ।
हम नहि बुझैत छी, अपनेकेँ आ हमराबीच मर्यादाक कोनो छाँह अछि । एहिद्वारे पुछैत छी अपनेसँ, ‘ई नाटक आएल कतएसँ ? ओहे अनपढ़ गबार देहातीक सँग अपनेक सम्बन्धेकेँ तऽ ई परिणाम अछि…. ओ महिलाकेँ भोगैत समयधरि अपनेकेँ विचार नहि आएल, ओ अनपढ़ गबार देहाती अछि ।’
हमर माँ भलेही ओ तिरस्कारकेँ सहि लेलक मुदा हमरा मोनमे स्वंयकेँ देल गेल अपनेक नाम नाटकरुपी अपमानकेँ कहिओ सहजतासँ नहि लेलहुँ ।
अपने एकटा बड़का लेखक बनए चाहैत छलहँु आ बनिओ गेलहुँ । आई अपनेके नाम अछि, मान अछि, सम्मान अछि, सभकिछु अछि आ एहिसभ बीचमे हम आ हमर ओ कृषकाय माँ कतहुँ नहि अबैत अछि कारण ओतए तऽ किओ आओर अछि, ओ जेकरा अपने सीढ़ीकेँ जकाँ प्रयोग कएने छी । सीढ़ी एहिद्वारे कारण ओ अपनेक प्रकाशककेँ बेटी छल । जेकर प्रकाशनसँ एकटा नुकाएल लेखककेँ अन्हारसँ निकालि कऽ सफलताक प्रकाशमे लाबि सकैत छल ।
हमर माँ चाहैत तऽ ओकरा रहैत दोसर विवाह कएलापर अपनेकँे अदालतमे सेहो तानि सकैत छल, मुदा ओ अपने जकाँ नहि अछि, …हँ यदि ओकर स्थानपर हम होइतहुँ तऽ एना अवश्य करितहुँ ।
हमरा स्मरण अबैत अछि, जखन हम छोट छलहुँ । बहुतबेर ओहि एक पुरुषकँे कमी अनुभव भेल, जेकरा हम दोसरकेँ घरमे पिताक रुपमे देखैत छलहुँ । ओ पुरुष जखन कोनो छोट बच्चाकेँ रुइसँ भड़ल गुडि़या लऽ कऽ दैत छल, हम कानि उठैत छलहुँ । जखन कोनो बच्चाकेँ पिताकेँ आँगुर पकरने जाइत देखैत छलहुँ तऽ माँसँ, दाईसँ पुछैत छलहुँ, ‘ई पुरुष बाँकीकेँ सभ घरमे अछि मुदा हमरा घरमे किए नहि ?’
ओ दुनू महिलाकेँ आँखि भरि जाइत छल आ आँखिसँ आगि निकलए लगैत छल, हमर एहि प्रश्नसँ । ओना ई बातसभ तखनकेँ अछि जखन हम छोट छलहुँ, अबुझ छलहुँ । ओहिसमय हमरा बुझले नहि छल, जाहि पुरुषकँे लऽ हम एतेक परेशान छी, ओहे पुरुष हमरा नाटक नाम दऽ कऽ चलि गेल छथि ।
जखन ठीकसँ बुझए लायक भेलहुँ तखन पहिलबेर दाई बैसा कऽ सभकिछु कहलक आ सभकिछु साफ–साफ बता देलक । हमरा स्मरण अबैत अछि, ओहिदिन हम स्कुल नहि गेलहुँ आ दिनधरि घरमे बैसिकऽ कनैत रहलहुँ । मुदा दोसरे दिन जखन भोर भेल तऽ हम सभकिछु बिसरि गेल छलहुँ, ओ विगतकेँ जे हमर छल । हमरा मात्र ई शब्द ‘नाटक’ स्मरण अछि ।
ओहिदिनक बाद हमरा फेर ओ पुरुषकँे अभाव कहिओ नहि अपन जीवनमे भेल । जे दोसरकेँ घरमे पिता बनि कऽ नजरि अबैत छलाह, ओहिदिनक बाद हमर एकटा नव जन्म भेल आ एकटा मजगुत दृढ़ निश्चयी, लड़कीक जन्म ।
दाई आ माँ दुनू चाहैत छल, हम खूब पढ़ी आ हमहुँ इहे कएलहुँ । नेपालीमे मास्टर डिग्री लेवएकँे पाछु हमर आकांक्षा इहे छल, हम ओ नाटक नाम देवएबलाकँे ई बता सकी, ‘आब हमहुँ ओहे छी जे अहाँ छलहुँ ।’
क्याम्पसक क्रममे कतेकोबेर एना भेल, अपनेक नाम कहुना नहि कहुना अबैत रहल । फेर जखन अपने, अपन आत्मकथात्मक उपन्यास लिखलहुँ तखन अपनेकँे आ हमराबीचक एकटा सत्य सभकेँ पत्ता चलि गेल छल । जखन हम नेपालीमे एमए कऽ रहल छलहुँ तखने ओ उपन्यासपर एकटा संगोष्ठीक आयोजना कएल गेल छल । हमरो ओहिमे अपन विचार रखबाक अवसर भेटल । हम अपन बातक आरम्भ एहितरहे कएने छलहुँ, ‘ई हमर दूर्भाग्य अछि, हमहुँ एहि उपन्यासमे छी । एना एहिद्वारे कारण ई लेखक हमर माँ केँ पति रहल छथि । मुदा एकटा बात हम स्पष्ट कऽ देबए चाहैत छी, हमर माँकेँ पति होवएकँे अर्थ ई कथमपि नहि अछि, ओ हमरो पिता छथि । पिता एकटा पदवी होइत अछि, हम कोनो कायर वा भगौराकेँ नहि दऽ सकैत छी …. ।’
एतेक कहि कऽ जखन हम श्वास लेबाक लेल रुकलहुँ तऽ पूरा हल तालीसँ गुञ्जि गेल । सत्य कही तऽ बड़का पुरस्कार हमरा जीवनमे दोसर नहि भेटल । ओ ताली हमरा आओर मजग्ुत कऽ देलक आ ओहि व्यक्तिसँ हमर पहिल जवाव छल जे हमरा नाटक नाम देने रहथि ।
एमए कएलाक बाद पीएचडी कएलहुँ आ तेकरबाद हमर नाम भऽ गेल डाक्टर चित्रा मिना मिश्र । मिनाकँे स्वयं हम अपन नामक बीचमे स्थान देलहुँ । कारण ओ हमर माँके नाम अछि, हमर नामक बीचमे कोनो भगौराक नामे नहि आबि सकैत अछि, ई हमर दोसर जवाव छल ।
ई पत्र जाहि प्रयोजनसँ लिख रहल छी, आब ओहिपर अबैत छी, अपनेकेँ तऽ पत्ता भऽ गेल हएत, हमर विवाह भऽ रहल अछि । पत्ता एहिद्वारे चलि गेल हएत कारण हम बुझैत छी, माँ आ दाई हमरासँ नुका कऽ खबरि कएने अछि । हम इहो बुझैत छी, ओ दुनू महिलाकेँ नहि चाहितो मात्र सामाजिक मान मर्यादाक कारण एना कएने अछि । हमहँु सभ किछु बुझैत ओकरासभकेँ किछु नहि कहलहुँ, हम ओ दुनू महिलाकेँ छोडि़ कऽ आब जा रहल छी, तखन किछु कऽ कऽ दूनुक हृद्य नहि दुखावए चाहैत छी ।
परम्परा ई अछि जे कन्यादानक समय महिलाकँे पति सेहो सँग रहैत अछि । दुनू मिल कऽ अपन बेटीकेँ कन्यादान करैत छथि, सायद इहे आ मात्र इहे परम्पराक कारण ओ दुनू महिला अपनेकेँ सूचना देलक अछि ।
हम ई पत्र एहिद्वारे लिख रहल छी कारण अपनेकँे ई बता दी, ‘कोनो व्यक्ति दान ओही चीजकँे कऽ सकैत अछि, जे ओकर हुए । आ जखन अपनेकँे हमरापर कोनो अधिकार नहि अछि, तऽ दान कोना कऽ सकैत छी ?’
जाहि उमेरमे एकटा गुडि़याक लेल तरसति छलहुँ, तखन अपने हमरा नहि दऽ सकलहुँ । आब जखन ओ दुनू महिला मिल कऽ एकटा गुड्डा हमरा लेल खोजलक अछि तखन हम नहि चाहैत छी, संसारक आगु आबि कऽ ई सावित करबाक प्रयास करी, अहीँ हमरा लेल गुड्डा लाबि कऽ देलहुँ अछि ।
समाज पुरुषप्रधान अछि आ निश्चित रुपसँ जखन अपने, रहब तऽ अपनेहीकेँ पूरे श्रेय भेटत आ दुनू महिलाक पूरा तपस्या व्यर्थ भऽ जाएत । हम नहि चाहैत छी, अहाँ ओहि गुड्डाकेँ हाथमे हमर हाथ सोपी, पिताक सम्बोधन नहि काल्हि अपनेकँे दऽ सकैत छलहुँ आ नहि आई दऽ सकब, हमर जीवन एहि सम्बोधनसँ विहिन अछि । रहल अपनेक बात तऽ अपनेकँे सँग भगवान न्याय कएलक अछि । अपने हमरा नाटक कहि कऽ जमीनपर फेकि कऽ चलि गेलहुँ । शायद इहे कारण अपने फेर निःसन्तान रहलहुँ । निःसन्तान एहिद्वारे कारण हम स्वयंकेँ अपनेक सन्तान नहि मानैत छी । आ ओ दोसर महिलासँ अपनेकेँ किछु नहि भेटल । नहि बेटा आ नहि बेटी ।
हम स्वंयकेँ पिता सम्बोधनसँ स्वयंविहिन कएलहुँ । मुदा अपनेकेँ बच्चाक सम्बोधनसँ तऽ स्वयं भगवानविहिन कऽ देलक अछि । हम बुझैत छी, ई सम्बोधनविहिन होएबाक कारण अपने अवश्य चाहब विवाहमे आवएकेँ ।
एहिद्वारे अपनेसँ कहि रहल छी, ‘अपने हमर विवाहमे नहि आबी । हम अपन विवाहमे कोनो नाटक ठाढ़कऽ, ओ दुनू महान महिलाकँे दुःख नहि पहुँचावए चाहैत छी… जे हमरा एतएधरि लाबि कऽ ठाढ़ कएलक आ आई क्याम्पसमे अपने आ अपने जेहन लेखककेँ अपन विद्यार्थीक रुपमे पढ़वैत छी ।’
पुनः अपनेसँ कहए चाहैत छी, ‘अपने विवाहमे नहि आबी । हम बुझैत छी अपने एतेक बेशर्म नहि छी, एतेक किछु लिखलाक बादो चलि आएव । पत्रमे लिखल कोनो बातक लेल क्षमा मागएकेँ औपचारिकता एहिद्वारे नहि करब कारण हम किछु गलत नहि लिखने छी । यदि अपनेकेँ कोनो बात खराब लागल, एकरा लेल अपने स्वयं जिम्मेवार छी…आशा अछि अपने नहिए आएब ।’