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मैथिली कविता – चौबनिया मुस्कि मुस्कियाकऽ





♦ राजेश महतो
चौबनिया मुस्कि मुस्कियाकऽ
दिलके चिर देलियै अहाँ
अइ करेजाकेँ करेजा बनी
बड पीड़ देलियै अहाँ

हम ठीक छली ओहने
नुन रोटीए खाइबला
रङ रङ्के परिकार
छप्पन ब्यन्जन
दुधक खिर देलियै अहाँ
चौबनिया मुस्कि मुस्कियाकऽ
दिलकेँ चिर देलियै अहाँ

हम औनाइत छलहुँ
अफसियाइत छलहुँ
दर–दर भट्कलहुँ
नै रोजगारी कोनो
नै खेतबारी कोनो
टहकैत छ्ल माथा
भरल टिस सँ
अहाँक कोमल हाथक स्पर्श
सँ थिर देलियै अहाँ ।
चौबनिया मुस्कि मुस्कियाकऽ
दिलके चिर देलियै अहाँ

छलहुँ डुबऽ लागल हम
सराबक प्यलामे
तरह–तरह केर नशा
विकृति मधुशालामे
उराठँ भगेल छल जिनगी
जेना सुख्खा मरुभूमि लेबनानके
मिलते अहा जेना हरियर
कञ्जन काश्मीर देलियै अहाँ ।
रघुनाथपुर, धनुषा