

♦ पूनम झा “मैथिली”
कचरल सन जीनगी
थकुचल छै मन
पसिझल घवाह गत्र
सत्ते खाेरनाठ सन ।
नुआं में चिप्पी
बिन आंगी बदन
कुहरैत हुकरैत
सुन्नहट जीवन ।
सिनेहक डाला
ने दुभि धान
विध बेहवार विना
छुछ्छे चुमान ।
परिहासे गुदस
जिनगी के धन
परमादे पियासल
कुहेसल अगन ।
नाम घरफुकनी
तइयाे गुमान
पिरितक रीत ढाेइत
हाेइछै विहान ।
