

♦ राकेश कुमार झा ‘रसिक’
नरके वसमे करवाकहेतु श्रृंगार करितहु ।
प्रेमक आकुलता ह्दयमे छुपौने रहितहु ।
मंद मृदु मुस्कान सदिखन छिटतहु ।
पत्नीवनिक सुख दुखमे साथ रहितहु ।
हर रुपमे प्यारी लैगतहु ।
काशहमनारि रहितहु ।।
बहिनवनिक सदिखन स्नेह बैटतहु ।
दया आममताक मुरत रहितहु ।
जोश भरल लिवास पहिरक गर्वसं चैलतहु ।
अपनदमपर नवल इतिहास वनैवतहु ।
हर रुपमे प्यारी लैगतहु ।
काशहमनारि रहितहु ।।
साहस त्यागक अवतारी वनितहु ।
हर पदक हम अधिकारी वनितहु ।
नवयुगक निर्माण करितहु ।
घरमे सभक दुलारी रहितहु ।
हर रुपमे प्यारी लैगतहु ।
काश हम नारि रहितहु ।।
२
काश हम नारी रहितहँु
नर सं सुवहचायवनैवतहु ।
हम वैसिकचायपिवतहु ।
नर सं रसोइमे पकवानवनैवतहु ।
नरपर सदिखन हुकुम चलैवतहु ।
नर पर हम भारी रहितहु ।
काश हम नारि रहितहु ।।
लहगां आ सारी पहिरतहु ।
अनेक रंगक सारी पहिरतहु ।
नर केकमाइ पर मौज करितहु ।
सखि सहेली संग भोज करितहु ।
नर पर हमभारी रहितहु ।
काशहमनारि रहितहु ।।
सावुन सेम्पुसं टवमे नहितहु ।
ब्युटी पार्लरमे खुबजइतहु ।
चेहरा पर मेकअप करितहु ।
हम स्वंय एक दर्पण रहितहु ।
नर पर हमभारी रहितहु ।
काश हम नारि रहितहु ।।
बडका बडका नाखुन रखितहु ।
समय परलापर नाखुनसं डरैवतहु ।
नरसं खुव झगडा करितहु ।
नर हमर छायाँ रहितथि ।
नर पर हमभारी रहितहु ।
काश हम नारि रहितहु ।।
