

♦ अयोध्यानाथ चौधरी
प्रियवर !
अहाँक ‘हैंगरमे टांगल कोट’ ओहिना अछि
खाली गर्दाक एकटा मोट परत
निश्चय जमि गेल छैक सर्बत्र
ओकरा उतारि क’ झाड़बाक साहस
केओ नहि क’ रहल छथि
भले ओ अनन्तकाल धरि
लटकल रहि जायत ओहिना ।
….
‘वागिश्वरी !’
अहाँकेँ जरुर पता हैत जे
अहाँक ओ पुत्र कत’ चल गेल?
जरुर अहाँसँ छुट्टी लएक’ गेल हैत
“बुद्धम् शरणम् गच्छामि “
सतत् एकेटा मुद्रा ओढने
शान्त आ गम्भीर, गम्भीर आ शान्त
ककरो दिश आँखि नहि उठाक’ ताक’बला
अद्भुत भंगिमा ।
…..
‘गुरुवर’ ! !
आब हम कविता नहि लिखब कहियो
ई हमर अन्तिम प्रयास अइ निस्सन्देह
शून्य मे, निरभ्र आकाश मे
तारा मे, चन्द्रमा मे, मंगलमे
अहाँ जत’ कतौ होइ
सुनू , हमर अन्तिम वाणी कान खोलिक’
अहाँक कमला ठुमकैत नहि बहैत छथि आब
आ’ अहाँक सेती हिचुकैत बहैत छथि ओहिना
