

♦ पूनम झा ‘मैथिली’
हम की छी
कत’ छी
जाइत छी की अबैत छी
नीक वा अधलाह
कियाे दैताे ने अछि सलाह
जेना छी तेना छी
अगुआइ छी की’पछुआएल छी
पट्टि बान्हल घाेडा जकां
ने अगल ताकु ने बगल
मालिकक चाबूक पर चलल
जा धरि सकब वा जीवन पर्यन्त
हाेइत कलहंत
विभेदक ने अंत
अदाैं सँ परताडित
दाैपदी जकां श्रापित
सीता काेनाे कम संतापित
धरती सँ एलीह आ समयलीह
भलहिं राम के पुरुषाेत्तम बनयलीह
घमन्ड आ अहंकार के परास्त हेतु
परीक्षा सेहाे देलीह
स्त्री परीक्षा……..कहिया धरि
पुरुष परीक्षाक दस्ताबेज
कहिया रचाअेात के रचत
तराजूक पलरा
समानान्तर कहिया हयत ?
समय चक्र सँ
यु ग बदलत
कलियुग बदलत
धरती सँ सब दिन
की सीते जनमत ….
रुप बदलू स्वरुप बदलू
घर घर रावणक अंत
दुर्गा के अवतार करु
हम सब करब उत्थान
नव पिढीक निर्माण
जाहिमें प्रकृति समरुप
सुन्दर दु गाेट रुप
एकटा पुरुष
एक नारी
एक दाेसर पर केयाे ने भारी ।।
