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मैथिली कविताः नारिये काल नाचत फेर





♦ शिवानी मिश्र

नारीसँ बनल नर तऽ पुरुषोत्तमके अभिमान किया ?
जँ नारिये पालन हार तऽ ओकर बस्स अपमान किया ?

राज्य त्याग लनि सङे राम तऽ
अग्नि सेज मे सिते किया ?
जँ दाउमे माथ झुकल पाण्डव के तऽ
अग्नि सुतिक सम्मानमे ठेस“
एहन रिते किया ?

कतबो रास रचे पुरुष तैयो ओ महान किया ?
कुदृष्टी पड़ै छै अनकर तैयो नारिये मे
खोटक चिन्हवान किया ?

हमही पुजा, हमही जननी तऽ हमही अभिशाप किया ?
छल ककरो अहंकार ककरो तऽ हमही बिद्रोहक भागी पाप किया ?
दैत्य झुकल देव आदि देव झुकल
धैर्य टुटिते नारीके
सम्पुर्ण श्रृष्टिमे ज्वाला फुटल ,

ममताके छाया, बहिनक दुलार,
कनियाके प्रेम सभमे, हितकार देखु
लज्जा नै कनिको ककरो हमरेसँ बिरता आ
हम नारिये असहाय केहन धिक्कार देखु

क्रोधक गाँठ खुलत फेर बिनासक
डमरू ताल बाजत फेर
एखनो बेर अछि आँखि खोलु
हमरा अभागी नै स्वाभिमानी बनए दिय ,
नै तऽ नारिये काल नचत फेर