

♦ सुजीत कुमार झा
साँझमे अपन घरक छतपर किछु ढेपा जमा कऽ राखि लेने छलहुँ । किरण निकलएसँ पहिने काल्हि जहिना हमर घरपर फुल तोड़ए आओत हम आक्रमण करब ।
‘साला फूल चोर… प्रत्येक दिन हमर कम्पाउण्डसँ फूल तोडि़ कऽ लऽ जाइत अछि,’ हम मनेमन फुसफुसेलहुँ । पूजामे फूल चढ़ावएकेँ एतवए सख अछि तँ अपने घरपर किए नहि फूल लगवैत अछि । दोसराक मेहनतपर फुटानी करएवलाकेँ सजाए तँ स्वयं देब मन आक्रोशसँ भरि गेल छल ।
ओ हमर घरसँ बहुत दूर नहि रहैत अछि । मुदा ओकरासँ हमरा कहिओ परिचय नहि भेल छल, हम तँ ओकरा देखनहुँ नहि छलहुँ । अड़ोसिया–पड़ोसियासँ पता चलल अछि जे ओ भोरमे घूमएकेँ नामपर फूल चोरबैत अछि । ओकरा लग एकटा लक्सी सेहो छैक, जाहिसँ दूर रहल फूलकेँ लिवा कऽ तोड़एमे ओकरा सहज होइत अछि ।
काल्हि तँ ओ हद् कऽ देलक । हमर घरपर लागल सुन्दर–सुन्दर गुलाब तोडि़ लेलक । लक्सीसँ फूलक डाढि़ खिचलाक करणेँ गमला खसि पड़ल आ फूल संगहि एकटा गमला टुटि गेल छल ।
एहि बातक जखन चर्चा हम अपन पड़ोसीसँ कएलहुँ तँ पता चलल के एहन काज एकटा युवक करैत अछि । हमर मित्रक कनियाँ तँ ओकर नाम पता दैत कहलीह, ‘हम तँ एकदिन ओकरा सैण्डिलसँ पिटए दौड़ल छलहुँ मुदा ओ तँ लंक लागि कऽ भागि गेल ।’
हम छतपर नुकाकऽ ओकरा आवएकेँ प्रतीक्षामे छलहुँ । मनेमन सोचि रहल छलहुँ, आइ आबए दी हिसाब बराबर अवश्य कऽ लेब । ई कोन तरिका अछि दोसराकेँ घरसँ फूल चोरा कऽ भगवानक पूजा करब ! कनिएमनिए पैसामे माली फूल घर पहुँचा सकैत अछि । मुदा आइकाल्हि फ्रिमे मज्जा लेवएकेँ लोककेँ आदत जे भऽ गेल अछि ! कनिदेर एहने सोचैत रहलहुँ ।
करीब एक डेढ घण्टा हम छतपर टहलैत रहलहुँ । ओकरा आवएकेँ प्रतीक्षा करैत रहलहुँ ।
‘कखनधरि एहिना छतपर घूमैत रहब, चाह बनि गेल अछि,’ घरसँ कनियाँक आवाज आएल । हम अपन योजनाकेँ असफल होइत देखि वेमनसँ छतपरसँ उतरि गेलहुँ ।
ओ आएल किए नहि ? अवितए तँ अवश्य मज्जा चखवितहुँ ! ई सोचितए–सोचितए कखन चाह समाप्त भऽ गेल पते नहि चलल । चाह पिलाक बाद कनियाँ दिस तकैत बजलहुँ, ‘चाहमे आइ मज्जा नहि आएल, घूमिकऽ कनि अबैत छी तँ कड़ा आदी देल कड़क चाह बनाएव ।’
घरसँ निकलि सीधा ओकरे घर दिस बढि़ गेलहुँ । वाटमे ओ मित्रक कनियाँ पुनः भेट गेलीह । प्रणामपातीक बाद ओ पुछलीह, ‘आइ फूल तँ सहीसलामत हएत न !’
लागल जे ओ निगरानी करैत हमरा देखि लेने छलीह । हम कनि बिहुँसैत बजलहुँ, ‘आइ ओ फूल तोड़ए अबैत तँ अवश्य मारि खाइत… साला फूलोकेँ चोरी !’
मित्रक कनियाँ कनि गम्भीर होइत बजलीह, ‘भाइजी आब ओ नहि आयत ।’
‘किए ?’ हमर मुँहसँ निकलि गेल ।
‘भाइजी ! भोरेभोर फूलक संग ओ भगवान लग पहुँच गेल ।’
मित्रक कनियाँक मुँहसँ जहिना ई शब्द निकलल । मन एकदम दूःखित भऽ गेल । किछुए हुए मृत्यु एकटा साश्वत सत्य अछि, जकर आगाँ सभ झूठ अछि, मृत्यु पूरा द्वेश राग सभ मेटा दैत अछि । हरेक व्यक्ति मृत आत्माक शान्तिक कामना करए लगैत अछि ।
