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मैथिली कथा – खेल





 विभूति आनन्द
वैभव कें एक दिन गाम मोन पड़ि अयलै । ओ नाॅस्टैजिक होबऽ लागल । फेर नेनपन आ किशोरपन मोन पड़ि अयलै । आ से सभ मोन पड़ैत देरी पहिने कुश्ती, चिक्का, फेर कबडी, आ अंत मे फुटबॉल मोन पड़ि गेलै ।
तहिया वैभव सोचैत रहय, जॅं इएह सभ खेलैत-धुपैत जीवनक नैया पार लागि जाय तॅं कतेक दीब होइत ! जीवन सर्व-तंत्र-स्वतंत्र भऽ जायत । एकदम बिंदास…
फेर वैभव आगू अपने सॅं अपने संग विमर्श कयलक । चिक्का ओतेक फास्ट नहि छै । ताहि लेल सभ सॅं नीक तॅं कबडी । एहि खेल मे आप-सॅं-आप साॅंस कें काबू करबाक हुनर आबि जाइत छै । आ जोश तॅं, मत पूछू !…
वैभव कें पोखरि मे नहाय वला ‘ढेहबा-ढेहबी’ कहियो-कखनो मर्दाना नहि लगलै । तें खेलबो कहाँ कयलक ! कुश्ती ओना खेललक मुदा ओहन शरीर नहि छै । आकि मोन पड़ि गेलै ! हय रे हय, असल मे खेल अछि तॅं फुटबॉल ! स्फूर्तिदायक…
बड़ी टाक फिल्ड । जेना पूरा धरती हो । जॅं सेंटर फारवर्ड छी तॅं बाॅल लेने एहि पार सॅं ओहि पार धरि धाॅंगि सकैत छी। ई सभसॅं नीक खेलाड़ीक श्रेणी होइत छै ।
वैभव जहिया एहि खेलक प्रथम दर्शक बनल रहय, इएह बनबाक कामना कैलक । मुदा से नहि भऽ सकलै । कपार मे गोलकी लिखा गेलै । खैर, तकरो अपन अलगे मजा रहै ।
मुदा ओ मजा तहिये घुसरि गेलै, जखन एकटा गोल कें बचबयबाक चक्कर मे दोसर टीमक खेलाड़ी सॅं धक्का लागि गेलै । से ओ गोल तॅं नहिये बचा सकल, फिल्ड सॅं बाहर फेका गेल ! नाहकमे चोटो लागि गेलै । नङड़ाइत घर पहुँचल तॅं माय ऊपर सॅं छड़पिटा देलकै–’मरि जो, जीबैत किए अयलें ! फिल्डे पर किए ने मरि गेलें ! पढ़ब-लिखब छोड़ि हरदम ओही जरलाहा गेनक पाछू बताह भेल रहैए अभगला, टटीबा…’
फेर तॅं वैभव नानी ने मरिहौं, ओहि दिस तकबो करत ! से ओ चोट आ पिटाइ ओकर नेनपन छोड़ा देलकै । पढ़बा दिस लगन लागि गेलै। ई खेल-तेल की पेट भरि देत हमर ! आ लगलै जेना बुझनुक भऽ गेल…
बरनी बहुत बाद मे, हाइ स्कूल मे गेला पर कहियो काल खेलक घंटी मे लूडो टा खेलि लेल करय । ओ एनमेन पचीसीये सन तॅं होइ । तहिया गाम-घर मे खूबे होइ पचीसी । इएह मौसम मे तॅं होइ । हॅं, ताश सेहो तहिये शुरू भेल रहै। सेहो तेहन नहि, एक्का-दुक्का !
मुदा ई अतीतोल्लास धरि अधिक काल नहि रहलै । सोफा पर बैसल वैभव हेरायल रहय । पत्नी झोरा आ पाइ हाथमे थम्हबैत कहलथिन– ‘यो जाउ, आ झट दऽ चिकेन लेने आउ ! फेर तऽ भरि दसमी सागे-पात…’
– ‘हमरा तऽ आब बेसी वएह सभ रुचैए!’ उठैत वैभव बजलै ।
– ‘से अनुभव करै छी…’ पत्नी बजैत किचेनमे चल गेलथिन ।
– ‘से कोना ?’ वैभव कने थम्हैत आ किछु सोचैत पुछलकनि ।
पत्नी अंदरेसॅं उत्तर देलथिन– ‘अहूँ मुदा बात के बड़ मेहियाबै छी, जल्दी सऽ जाउ ने महादेव !…’
वैभव कें क्रिकेट सेहो नहि सोहयलै । कहियो नहि । टेस्ट तॅं सहजहि, ट्वेंटी-ट्वेंटी सेहो । समयक बरबादी छै । रौद मे घंटा-घंटा एकटंगा देने रहू ! ताहि उपर सॅं लोत्थे भारी बैट । आ फेर माथपर एतेकटा कनटोप! तखन विज्ञापनक एहि युगमे जैह नहि होइत छै सैह की कम !
नेनामे जहिया ई खेल एकरा ध्यान मे आयल रहै, चीनक संग युद्ध चलैत रहै । ‘बोमडिला’ नामक कोनो जगह पर । तें गामक नेना सभ एकरा ‘बोमडिला’ सएह कहै ! वैभवक तार्किकता मुदा कमाल के रहै, कहै– ‘मत्तोरी के, ई तऽ ‘टाल-गुल्ली’ के नकल छियौ रौ !’
बादमे जखन कालेज मे आबि गेल, तखनो रुचि नहि जगलै । ओना क्रिकेटक क्रेज बढ़ैत जाइत रहै । एकरा लेल तैयो धनसन। सुस्त खेल बुझा पड़ै । दोसर एकर शुरुआत जेंकि अंग्रेज द्वारा भेल रहै, आ से बात क्यो नेनपने मे दिमाग मे धऽ देने रहै, मोन सॅं नहि हटि पबै । एकर बाबा स्वतंत्रता सेनानी रहल छलथिन !
ओना जखन अपनो डेरा मे टीवी आबि गेलै, आ घरक लोक कें लुधकल देखय, वैभव कोठरी सॅं बहरा जाय । हॅं, भारत-पाकिस्तान टेस्ट मैच मे मुदा क्रिकेटक प्रति अनिच्छा डोलि जाइ । आ सभहक संग टीवी सोझा अड्डा जमा दिअय ।
असल मे ई आकर्षण क्रिकेटक प्रति नहि, अपितु दुश्मन देशक संग युद्ध, आ ताहि मे जीत दर्ज करबाक जुनून रहै। तें टेस्ट मैच खत्म, वैभवक जुनून खत्म । बादमे तॅं जेना-जेना ई शुद्ध कऽकऽ व्यवसायिक रूप धरैत गेलै, वैभवक विरक्ति सीमान्त कऽ गेलै !
आब तॅं खैर आनंदक अनेकानेक साधन हाथ मे आबि गेल छै । खास कऽ एहि पिछड़ल क्षेत्र लेल ई फेसबुक छै ने ! जे-जेहन रुचि, ओ सभ टा परसिकऽ देबाक लेल अहर्निश तैयार रहैत छै ।
वैभवकें ताहू सभमे कोनो रुचि नहि । ई एकगोट अलगे तरहक जीव रहलै। एकर मानब रहलै जे ई तन्त्र नब सॅं लऽकऽ पुरान, सभ कें बरबाद कऽ रहलै । तें एहि द्वारासॅं परसल जा रहल ‘सचार’क परिष्कार करब वैश्विक चिंता मे शामिल कएल जयबाक चाहिऐ…
एतेक रास किन्तु-परन्तुक बाद मुदा ई तॅं मानल बात छलै जे खेल सॅं वैभव कें आत्मीय लगाव छलै ! अखबार अबै तॅं सर्वप्रथम खेलेक पृष्ठ पर मे नजरि जाइ । नजरि की, सर्वाधिक समय ओही मे जाइ । तकर बादे आन कोनो पृष्ठ पर !
मुदा झंझटि ई छलै जे ओ कोन खेल नीक, कोन बेजाय, से टा आइ धरि तय नहि कऽ सकलै । ओकरा सभ टा खेल मे किछु-ने-किछु फ्यो निकलिये आबै । आ सएह नकारात्मकता जीवनक छओ-सात दशक बितलाक बादो ओकरा सोच कें बदलि नहि सकलै ।
वैभव एकदिन ओहिना इयरफोन लगौने मगन, मेहदी हसनक गजल सूनि रहल छलै । ओ गजल सूनि सेहो रहल छलै, आ ऑंगुर सॅं स्क्रीन कें आगू-पाछू सेहो कयने जाइत रहै । कखनो-कखनो कऽ रुकि कऽ कोनो-कोनो पोस्ट कें पढ़ि सेहो लैत छलै ।
एहि क्रम मे ओ एकाएक रुकलै ! स्क्रीन पर लघुकथा तरहक किछु आयल रहै । तहिया फेसबुकपर एहन-एहन साहित्य-प्रसंग खूबे आबि रहल छलै । लघुकथा शतरंज संदर्भित रहै । ताहि प्रसंग ओकर एतबे टा जनतब छलै जे विश्वनाथन आनंद शतरंजक बड़ पैघ खेलाड़ी भेल छै । भरिसक अंतरराष्ट्रीय स्तरक ! मुदा ई खेल आम नहि, सीमित मोनक बीच प्रचलित छै । बस एतबे । बेसी जनबाक रुचियो नहि भेलै । कहियो नहि ।
मुदा ई लघुकथा तॅं वैभवक मोन कें जेना घुमा देलकै ! कथा मे एक टा इंटरव्यूक प्रसंग छलै । जेना एकटा एक्सपर्ट पुछलकै– ‘अहाॅं के कथी सऽ अधिक लगाव अछि ?’
सीमा नामक लड़कीक उत्तर रहै– ‘शतरंज !’
– ‘वाह ! शतरंज काफी मनलग्गू खेल छै । चलू, एकरे बारे मे बात करै छी । अहाॅं के शतरंजक कोन मोहरा सभ सऽ अधिक पसिन अछि ? अथवा प्रभावित छी ?’
– ‘वज़ीर !’
– ‘किए ? हमरा तऽ घोड़ाक चालि सभ सऽ अलग बुझाइए !’
सीमा गंभीर भऽ गेलि– ‘सही सर, घोड़ाक चालि मनलग्गू होइ छै, पर वज़ीर मे ओ सभ गुण होइ छै, जे बाॅंकी मोहरा मे अलग-अलग रूप सऽ रहैत छै । ओ कखनो मोहरा जकाॅं एक डेग बढ़ि कऽ राजा के बचबै छै, तऽ कखनो तिरछा चलि कऽ तंग सेहो करैत छै, तऽ कखनो ढाल बनि राजाक रक्षा सेहो करैत छै !’
– ‘वाह, बहुत नीक ! मुदा राजा के बारे मे अहांक की आइडिया अछि ?’
– ‘सर हम राजा के अइ खेलक सभ सऽ दुर्बल चेहरा मानै छिऐ । ओ अपना के बचयबा लेल मात्र एके टा डेग उठा सकैए, जखन कि वज़ीर ओकरा सभ दिशा सऽ रक्षा कऽ सकै छै !’
– ‘तऽ अहाॅं अपना के कोन मोहरा सनक मानै छी ?’
– ‘राजा !’
– ‘मुदा अहाॅं तऽ राजा के कमजोर कहै छिऐ, जे हमेशा वज़ीर के मदति के प्रतीक्षा मे रहैए ! फेर अहाॅं किएक अपना के राजा मानैत छी ?’
सीमा बिहुॅंसैत बजलै– ‘जी, हम राजा छी आ वज़ीर हमर पति रहथि। ओ हमर सतत रक्षा करथि, मुदा आब ओ हमर संग नै छथि…’
– ‘तऽ अहाॅं ई नोकरी किए करऽ चाहै छी ?’ एक्सपर्ट पुछलकै।
सीमाक स्वर गह्वरित भऽ गेलै, आ ओ बजलै– ‘किएकि कहबे कयलौं, हमर वज़ीर आब हमरा संग नै छथि ! आब हमरा स्वयं वज़ीर भऽ कऽ अपन बच्चा, आ अपन जीवनक भार उठयबाक अछि !…’
… आ लघुकथा पढ़ैत-पढ़ैत वैभवक चेहरा पर गंभीरता पसरि गेलै आ ई शतरंजक मोहरा सभक मादे विचारऽ लागल । एक-एक कऽ । सभ मोहराक स्वभाव-भाव । राजा, रानी(वजीर), घोड़ा, हाथी, प्यादा, ऊंट, सभहक…
वैभव शतरंजक मादे कहियो पढ़ने रहय । प्राय: कोनो पत्रिका वा अखबार मे ! मुदा प्रेम नहि जागि सकल रहै । उन्टे एकरहु मे किछु फ्यो निकालि अपना कें दूर कऽ लेने रहय– ‘ई काहिलक खेल थिक !’ मुदा उक्त लघुकथा एकर सोचकें बदलि देलकै ! ई तॅं तेज दिमागवलाक खेल छिऐ ! सरिपहुॅं ।
वैभव तुरंत गुगल पर शतरंज पर लिखल किताब सभहक सर्च करऽ लागल । मुदा नेट दुर्बल रहने गुगल तॅं नहि खुजि सकलै, मुदा…
… मुदा वैभव कें ताही स्थिति मे दू टा लड़की मोन पड़ि अयलै । दुनू सहोदर । जेठ शिल्पी, छोट रिक्की । भागलपुर विश्वविद्यालयक प्रतिनिधित्व करै दुनू बहीनी । से ग्रेजुएशन कयलाक बादो, शतरंजेक कारणें एमए मे नाम सेहो लिखौने रहै । आ ताही आधार पर कालेज, जिला, प्रमंडल होइत स्टेट तथा नेशनल धरि खेलाय लागल रहै !
से दुनू एकरा अपन कैरियर बनैबाक सोचिते रहै कि पिताजीक ट्रान्सफर भऽ गेलनि । फेर दुनू हुनका संग अपन गाम-घर दिसक शहर मे आबि गेलै । आ इएह आयब ‘पकला जौ पर पाथर’ सिद्ध भेलै ! उम्रो लगभग भैये गेल रहै, आगू-पाछू दुनूक विवाह भऽ गेलै ! शिल्पीकें सीए आ रिक्की कें इंजीनियर पति भेटलै । से, ‘करम गति टारत नाहि टरे’, शतरंजक परम्परित चालि मे दूनू अपने पराजित भऽ गेलि !
रिक्की अपन आइआइटियन पतिक संग कनाडा मे रहऽ लगलै । आ खाली समयमे गोल्डक व्यवसाय करैत टाइमपास करै। शिल्पी शिक्षण क्षेत्रमे आबि शुद्ध कऽ हाउसवाइफ बनि गेलै । एकटा बच्चा छै । तकरे खेलबैत समय कटैत रहलै ।
ओना शुरू-शुरू मे शिल्पी पति संग खाली बेर मे शतरंज लऽ कऽ बैसि गेल करै । पति कें सेहो रुचि रहै । ओहो शौकिया, शुरू मे खेलल करै । यदाकदा । मुदा बाद मे दुनूक रुचि खत्म भऽ गेलै ।
असल मे प्रायः तकरो कारण भेलै । शिल्पी नैशनल खेलायलि रहै, मुदा पति मात्र शौकिया । स्वभाविक रहै, पति पराजित भऽ जाइ ! शुरू मे तॅं नहि, मुदा बाद मे शिल्पी जेंकि ओकर पत्नी भऽ चुकलि रहै, जीतब ठीक नहि लागै । आ संबंध आगू चलि कऽ प्रभावित नहि होबऽ लागै, शतरंज खेलायबे बंद कऽ देलकै !
कहल जाइत छै जे एकबेर जॅं प्रेम भऽ जाइत छै, ओ अटूट रहि जाइत छै, बहुत बाद मे शिल्पी अपन शतरंज-प्रेम अपन अबोध पुत्र मे रोपऽ चाहलकै, मुदा…
…तखने गेटकें क्यो ‘नोक’ कैलकै । वैभवक ध्यान भंग भऽ गेलै । ओ उठि गेट खोललकै । मित्र सुशांत जी रहथिन– ‘आउ आउ ! एह बीच-बीच मे कतऽ गुम भऽ जाइ छी…’
– ‘नै नै सर, एहन सन किछु नै छै । लेकिन अहाँक आरोप सही अछि सर…’
– ‘अच्छा कोनो बात नै, ओहिना कहलौं ! हॅं हॅं, ओतहि बैसू ने महराज…’ आ बजैत कान सॅं इयरफोन निकालैत अपनो सोफा पर बैसि रहलै ।
वैभव पुछलकै– ‘बहुत ह्रस्त बुझाइ छी सुशांत जी ?’
– ‘नै सर एहन कोनो बात नै छै, मुदा एकटा एहन निर्णय लऽ लेलिऐ-ए, जाइ सऽ घर मे पत्नी सहित पूरा परिवार हमरा पर कुपित भऽ उठल अछि…’
– ‘मतलब !’
– ‘सर जनिते छी जे हम जीवन मे किछु नै कऽ सकलिऐ ! सभ टा क्वालिफिकेशन रहितो…, मुदा हम निराश नै छी सर ! आब तऽ हम अपन जीवन के एक नया मोड़ दऽ रहल छिऐ…’
– ‘सएह तऽ पूछि रहल छी !’
– ‘बेटा के खेलाड़ी बनयबाक…’
– ‘कथी !’
– ‘खेलाड़ी बनयबाक निर्णय कऽ लेने छिऐ !’
– ‘कथीक यो ?’
– ‘शतरंजक खेलाड़ी सर !’
– ‘ॲंय !’ वैभव चौंकि उठलै, आ सोफा पर सम्हरि कऽ बैसि रहलै ।
– ‘हॅं सर !’
– ‘की कहलिऐ ! फेर सऽ कहियौ तऽ ! ओही मे ओकर कैरियर बनयबाक सोचलिऐ-ए ?’ वैभव जेना फेर सॅं जानऽ चाहलकै । एकरा लेल जेना ई एक अजगुते बात रहै ।
ओ मुदा कन्फर्म कयलथिन– ‘जी सर, चौंकलिऐ किए ! हम ई निर्णय नै लितिऐ तऽ बेटा हमर डिप्रेशन मे चलि जाइत ! ओकरा बच्चे सऽ शतरंज दिस झुकाव रहै…’
– ‘अच्छा !’
– ‘आ हमरो तऽ थोड़ा-बहुत रुचि रहबे करय…’
– ‘जेना ?’ वैभवक रुचि से जागि गेलै।
फेर तॅं सुशांत जीक स्मृति जीवंत भऽ उठल रहनि– ‘असल मे सर, हम मैट्रिक परीक्षा देलाक बाद अपन बाबा लग बैस कऽ शतरंज खेलायब शुरू कयने रही, मुदा कहियो अइ फिल्ड मे कैरियर बनयबा के नै सोचलौं । मुदा हमरे गौऑं दिल्ली सऽ खेलाइत आइ ग्रैंडमास्टर छथि !’
– ‘अच्छा ! अरे वाह !’
– ‘हॅं सर, अहाॅं कहियो हमर गाम जा कऽ 75-80 वर्षक बूढ़-बुजुर्ग तक के तन्मय भऽ शतरंज खेलैत देखि सकै छियनि ! ई खेल पछिला एक शताब्दी सऽ खेलल जा रहल छै । सेहो अनवरत । से जे क्यो प्रत्यक्षदर्शी रहल छथि, से कहि सकै छथि जे खेल भोजन कयलाक बाद सऽ मुन्हारि साँझ तक नित्य चलै छै ! आ से खेल मनोरंजक, आ युद्ध जकाँ आक्रामक !’
– ‘अच्छा !’ वैभव कें ई सभ टा अचरज लगैत रहलै ।
– ‘हॅं सर, ओहि खेल मे एक टा घटना करीब-करीब रोजे, आ अनेक बेर घटित होइ । नागेन्द्र बाबा सुरक्षात्मक आ यदुवंशी बाबा आक्रामक खेल खेलथिन । से दूनू एक-दोसरक सभ दिनुक प्रतिद्वंद्वी ! तें एहन स्थिति अक्सरहाॅं होइक जे नागेन्द्र बाबा अपन किला के एना कऽ बान्हि दैत रहथिन जे आक्रमणकारीक गोटी मारल जानि ! जँ आगू बढ़थि तऽ बेर-बेर ‘हम नै चलब अपन चालि, तों चलह !’ मित्र यदुवंशी के कहि दैत रहथिन। आ जखन यदुवंशी बाबा किला मे प्रवेश नै कऽ सकथि, आ नागेन्द्र के चालि चलबाक लेल दबाब बनयबा मे निष्फल भऽ जाथिन तऽ पासा उलटि, आ हँसैत बजथिन– ‘लएह, नै चलबऽ तऽ अइ बेर तोंही जितलह !’
– ‘अरे वाह, की दिव्य ! एक्स-रे कहै छै खेल भावना !’
– ‘हॅं सर, तें प्रायः ओ लसेर हमरा अपन बौआ के…’
…आ वैभव कें उक्त समय कें सुनैत\ गुनैत शिल्पी मोन पड़ि अयलै । आ जे कहियो कोनो गप्पे-सप्पक क्रम मे कहने रहै जे ‘साउथ’मे प्रायः परिवार मे एहि खेलक प्रति बच्चा सभ कें प्राथमिकता संग मोटिवेट कऽ सिखाओल जाइत छै । आ जाहि लेल परिवारक कोनो-ने-कोनो सदस्य सतत बच्चाक संग लागल रहैत छै ! तें ओतऽ खेल, कैरियरक अभिन्न हिस्सा बूझल जाइत छै– प्राइमरी खेल, सेकेंडरी पढ़ाइ…
– ‘कतऽ हेरा गेलिऐ सर ?’ सुशान्त जी सहसा टोकि लेलथिन ।
– ‘नै नै बाजू ने !’ वैभव अपना कें अप्रतिभ होयबा सॅं बचबैत कहलकै ।
– ‘जनै छिऐ सर, अपना बिहार मे, खास कऽ कऽ मिथिला क्षेत्र मे खेलक प्रति कोनो झुकावे नै छै ! आ जॅं छैको तऽ खेल सेहो एकटा कैरियर भऽ सकै छै, गार्जियन सभ एहि दिशामे सोचिते नै छै। हरदम खैनी-गुटखा खायत आ एक-दोसरक अदखोइ-बदखोइ बतिआयत!’
– ‘से तऽ छै…’
– ‘तें देखियौ ने, मिथिला मे खेल के की कम प्रकार रहै ! मुदा आइ कतऽ छै !’
– ‘हूॅ़ं…’
– ‘मुदा सर, हम बेटा के अही मे कैरियर देखै छिऐ ! ओ करतै किछु पैघ जरूरे…’
– ‘अहाॅंक एहि जुनून पर चकित छी सुशांत जी !’
– ‘शुभकामना रखियौ सर, सभ शुभ-शुभ हेतै…’
– ‘की बात करै छी ! हमरा तऽ शतरंजक अहाॅं सोचे बदलि देलौं ! ई हुड़दंग नै, गंभीर आ तेज दिमागक खेल लगै अछि…’
– ‘नो डाउट सर ! सभ चालि पर निर्भर करै छै । अर्थात् अहाॅंक सोच केहन अछि…’
– ‘हमर एक परिचित अछि। शिल्पी । अही शहर मे अछि । ओ सेहो कहियो शतरंजक खेलाड़ी भेल करै छलि…’
– ‘ॲंय की कहलिऐ सर ?’ सुशांत जी जेना खुशी सॅं कूदि उठल रहथिन– ‘सर हुनकर जॅं कोनो संपर्क नम्बर हो, तऽ दितौं ! हम अपन बौआ के हुनका सऽ भेंट करबितिऐ !’
– ‘जरूर ! ई तऽ हमरा लेल पुण्य सनक काज हैत…’
आ भावुक सुशांत दुनू हाथ जोड़ैत ठाढ़ भऽ गेल रहथिन । फेर तॅं वैभव सेहो । फेर कनीकाल ओहिना निःशब्दता पसरल रहलै । मुदा अंततः वैभवे बजलै– ‘ह्वाट्सऐपपर मोबाइल नंबर भेज देलौं सुशांत !’
– ‘प्रणाम सर !’
– ‘प्रणाम प्रणाम !’
– ‘ई साॅंझभरली बनि-ठनि कऽ कतऽ चललिऐ सर ?’
– ‘वैह डीपीएस कैंपस मे एकटा शतरंज प्रतियोगिता भऽ रहल छै ! मुदा अहाॅं ?’
– ‘सर, बौआ के ओत्तहि पहुॅंचा कऽ खाना खाय लेल घर जा रहल छी ! ओहो पार्टिसीपेंट छै…’
आ दुनू कें एके संग जेना ठोर बिहुॅंसि उठलै ।