

♦ सुजीत कुमार झा
‘आइ काल्हि अपनेके टुर बहुत लागि रहल अछि, कि बात अछि श्रीमान ?’ मुक्ता शिवनन्दनसँ मजाक कऽ रहल छलीह ।
‘की करु, नोकरीक प्रश्न जे अछि, नहि तऽ अहाँकेँ छोडि़कऽ जाएके मन हमर बिल्कुल नहि करैत रहैत अछि,’ शिवनन्दन सेहो हँसीक उत्तर हँसिएमे देलन्हि ।
‘पहिने त एना नहि होइत छल, फेर एतेक बेसी टूर किए भऽ रहल अछि ?’ एहिबेर कनी गम्भीरतासँ पुछने छलीह ।
‘तँ की घरमे बैसि जाउ ?’ शिवनन्दनकेँ तामस आबि गेल ।
‘एहिमे एतेक तामस होवएकँे कि बात भेलैक ? हम त अहिना पूछि रहल छलहुँ,’ मुक्ता बजलीह ।
‘जहिना अफिस कहत ओहिना करए पड़त ।’
‘ठीक अछि, मुदा…’
‘अहाँ हमरापर शंका करैत छी…’ शिवनन्दन बजला, ‘जेना हम ककरोसँ भेटए जाइत छी… कि नहि ?’
‘हे भगवान हम त मजाक कऽ रहल छलहुँ,’ मुक्ता बजलीह ।
‘अहाँक मनमे एहन–एहन बातसभ चलि अबैत अछि, जकर कोनो मतलब नहि होइत अछि ।’
‘ठीक छैक प्रभु, माफ कऽ दिअ । हम त एहिद्वारे कहि रहल छलहुँ कहिओ घूमए चलितहुँ ।’ मुक्ता जेना अपन सफाई पेश कऽ रहल छलीह ।
‘ठीक छैक, देखैत छी..कोना समय निकलैत अछि,’ शिवनन्दन बजला । एहन बातसभ हरेक घरमे पतिपत्नि बीच चलैत रहैत अछि । दाम्पत्य जिवनमे कनी नोकझोक नहि भेल तँ मज्जे नहि आओत ।
एकदिन घरक अपन कामकाज निबटाकऽ मुक्ता घरक छत्तपर टहलि रहल छलीह, तखन डोरवेल बाजल । जखन द्वार खोललीह, त आगाँमे पड़ोसी शिखा ठाढ़ छलीह ।
‘आउ शिखा, अचानक केना अएलहुँ ?’ मुक्ता पुछलीह ।
‘आइकाल्हि बुझल अछि मुक्ता, टोलमे कि भऽ रहल छैक ।’
‘एना कि भऽ रहल छैक जे हमरा नहि बुझल अछि ?’ मुक्ता शिखा दिस गम्भीरतासँ देखए लगलीह ।
‘आइ भोरेसँ एकटा बतहिआ एहि टोलमे आएल अछि, धियापुतासभ ओकरा खौजा रहल अछि ।’
‘हमरा पता लागल छल, दूध देवएवला देखने छल ओहे दूध देवएकाल कहलक अछि ।’
ओ दुनू बात कइए रहल छलीह कि बाहर बहुत हल्ला भेल । दुनू घरसँ बाहर एलीह । मुक्ता देखलीह एकटा युवती भागि रहल छलीह । आ किछु बच्चा ओकर पाछाँ–पाछाँ दौड़ रहल छल । मुक्ता बच्चासभकँे डटलीह आ ओकरा अपनसंग घर आनि लेलीह ।
धियापुता एतेक परेशान कएने छल, भीतर अबिते ओ युवती बेहोश भऽ गेल । मुक्ता ओकर मुँहपर पानिक छिटा देलीह । होशमे एलाक बाद ओ मुक्तासँ लिपटि गेल, जेना ओकरा कोनो बात स्मरण आबि गेल हुए ।
मुक्ता ओकरा आरामसँ बैसोलीह । भेजन सेहो देलीह । ओ फटाफट ४–५ टा रोटी खा गेल, जेना बहुत दिनसँ भुखल छल ।
‘के छी अहाँ ?’ पड़ोसी शिखा ओ युवतीसँ पुछलीह, त ओ किछु नहि बाजल । कएवेर पुछलाक बाद ओ बाजल, ‘भुन्टी…भुन्टी ।’
‘मुक्ता, पता नहि ई कतएसँ आएल अछि ? आब एकरा एतएसँ बिदा करु,’ शिखा मुक्ताकेँ सल्लाह देलीह ।
‘केहन बात कऽ रहल छी शिखा ? कनिदेर आराम करए दिऔक, फेर जाए लेल कहि देबैक,’ मुक्ता बजलीह ।
‘देखू मुक्ता । हम कहि रहल छी, एहन लोकसँ दूरे रहबाक चाही,’ शिखा हुनका फेरसँ सम्झावएकँे प्रयास कएलीह ।
‘शिखा अपनेके त बुझल अछि, हमर भईया एकटा एनजिओसँ जुड़ल छथि.. ,’
मुक्ता आ शिखा एकटा संगी जकाँ सेहो छथि तए एकदोसराक परिवारक विषयमे बुझल छन्हि । ‘…हम हुनकासँ बात करब अहाँ परेशान नहि हौउ,’ मुक्ता बजलीह ।
‘ठीक छैक जेना अहाँक ईच्छा,’ कहिकऽ शिखा अपन घर चलि गेलीह ।
शिखा जखन अपन घर चलि गेलीह त मुक्ता फेरसँ ओकरा लग पहुँचलीह । ओ एकटा कोनामे दूबकलसन बैसल छल । मुक्ता ओकरा आबाज देलीह, ‘भुन्टी…’
ओ किछु नहि बाजल आ आओर सिमटिकऽ बैसि गेल ।
मुक्ता ओकरा लग गेलीह आ पुछलीह, ‘भुन्टी अहाँक नाम अछि ?’
ओ युवती धीरेसँ अपन माथ ‘हँ’ मे हिला देलक ।
मुक्ता ओकरासँ कहलीह, ‘देखू डराउ नहि, सही सही बताउ अहाँ कतएसँ आएल छी ? हम अहाँकेँ अपन घर पहुँचा देब ।’
ओ युवती एतबे बाजल, ‘हमर कोनो घर नहि अछि ।’
मुक्ताकेँ आश्चर्य भेल ई कतहुँसँ बताही नहि लगैत अछि । अचानक ओ युवती मुक्ताकेँ पाएर पकडि़ लेलक, मुक्ताके ओकर शरीर गरमसन लागल । एना बुझाएल छल जेना ओकरा बोखार होइक ।
‘ठीके छैक, आजुक राति अहाँ एहिठाम रहि जाउ । काल्हि हम भईयावला एनजिओमे लऽ अहाँके जाएब ।’
‘दीदी, अहाँ हमरा अपने लगमे राखि लिअ । घरक सभ काज कऽ देब,’ कहिकऽ ओ फेरसँ कानए लागल ।
‘आइ तँ अहाँ एतहि रहूँ, फेर काल्हि कि होइत छैक देखैत छी,’ मुक्ता बजलीह ।
शिवनन्दन रातिमे बहुत अबेरसँ आएल छलाह । तएँ हुनका ओ युवतीक विषयमे किछु नहि बुझल छल । दोसर दिन भोरमे मुक्ता शिवनन्दनकँे ओ युवतीक विषयमे जानकारी देलीह । शिवनन्दन स्पष्ट शब्दमे कहि देला, ‘मुक्ता एकरा एखने घरसँ निकालू, पता नहि के अछि….’
‘हँ एकरा हम भईयावला एनजिओमे लऽ जाइत छी…’
‘हम रातिकेँ घर आबी तँ हमरा कोनो बखेड़ा नहि चाही,’ कहिकऽ शिवनन्दन चलि गेलाह ।
मुक्ता नीचा अएलीह, त देखलीह ओ युवतीकेँ तेज बोखार छल । रातिमे फेर शिवनन्दन मुक्तासँ पुछला, ‘की ओ युवती चलि गेलीह ?’
मुक्ता कहलीह, ‘नहि ।’
‘किए…?’ शिवनन्दन बजला ।
‘ओकरा तेज बोखार छैक, एहन अवस्था ओ कतए जएतीह ? यदि ओ मरि गेलीह तँ…’
‘हमरा नहि बुझल अछि,’ कहैत शिवनन्दन नीचा गेलथि । ओतए ओ युवती बेहोश पड़ल छलीह । पता नहि किए ओकरा देखिकऽ शिवनन्दन आश्चर्यमे पडि़ गेलाह ।
‘मुक्ता, शायद अहाँ ठीक कहैत छी, यदि एतएसँ गेलीह आ मरि गेलीह त, कि हेतैक ?’
‘फेर कि करी ?’ बड़ीकालधरि दुनूगोटेमे विचारविमर्श होइत रहल । फेर एकटा निश्कर्ष निकलल ।
‘ऐना करैत छी, जखनधरि ठीक नहि होइत अछि, एकरा अपने लग रहए दैत छियैक ।’
‘ठीक छैक,’ मुक्ता सेहो अही पक्षमे छलीह ।
आइकाल्हि करैत–करैत कए दिन भऽ गेल मुदा भुन्टी ओतएसँ नहि जा सकल । ओना मुक्ता एखनधरि एतबे जानि सकल छलीह ओ पहाड़ी लड़की अछि आ कोनो बाबूजीसँ भेटए आएल अछि । ‘अहाँकेँ एतए के अनलक अछि ?’ मुक्ता पुछलीह ।
‘हमरा गाममे कतेक लोक फेरी लगावए अबैत अछि, ओहे लोकक संग हम आबि गेलहुँ अछि ।’
‘देखू यदि अहाँ अपन गामक अतापत्ता बतादेब तँ हम अहाँकेँ ओतए पहुँचा देब,’ मुक्ता कहलीह ।
‘हम पहिलबेर अपन गामसँ बाहर निकलल छी, हमरा बुझलहुँ नहि अछि हमर गाम कतए अछि ।’
पता नहि ई सत्य बाजि रहल अछि वा झूठ, मुदा मुक्ताकेँ कखनो ओकरा बातपर भरोसा भऽ जाइत छल, तँ कखनो नहि ।
एखन भुन्टीकेँ एला किछुए दिन भेल छल कि मुक्ताके पता चलल ओ माँ बनएवाली अछि ।
मुक्ता समस्यामे पडि़ गेलीह आब कि करी । ओ भुन्टीसँ पुछलीह, ‘ई सभ कि अछि ? के छथि ई बच्चाकेँ बाबू ?’
मुदा भुन्टीक एकहिटा उत्तर होइत छल, ‘दीदी हमरा नहि बुझल अछि…शायद बताहपनक समयमे हमरासँ किओ फाइदा उठा लेलक हएत ।’
‘अहाँ स्मरण करएकेँ प्रयास करु, शायद स्मरण आबि जाए ।’
‘नहि, दीदी, जखन हमरा दौरा पड़ैत अछि, सभ बात बिसरि जाइत छी ।’
मुक्ताकेँ किछुओ समझमे नहि आबि रहल छल कि कएल जाए । ओ शिवनन्दनसँ बात कएलीह । ई सभ सुनिकऽ ओ भड़कि गेलाह, ‘हम त शुरुएसँ कहैत छी एहि झंझटिमे नहि परु । आब भोगतू ।’
‘तँ कि एकरा घरसँ निकालि दियैक ?’
‘आब कि घरसँ निकालबैक, रहए दियौक आब ।’
मुक्ता अपन पड़ोसीसँ बात कएलीह । सभ इएह सलाह देलीह घरसँ शीघ्र निकालि दी । मुदा मुक्ता भुन्टीकेँ एकबेर नहि ओतएसँ जाए कहि पएलीह ।
भुन्टीकेँ माए बनएके समय सेहो आबि गेल । मुक्ता एखनधरि बड़की बहिन जकाँ देखभाल करैत छलीह । भुन्टीकेँ एकटा सुन्दरसन बेटा भेल । ओ बच्चाकेँ देखि मुक्ताके अपन बच्चाक बालपन स्मरण आबि गेल । बहुत स्नेहसँ ओकरा लगौलीह ।
प्रसवक बाद भुन्टी फेरसँ घरक काज शुरु कऽ देलीह । सभ किछु ठीकठाक जकाँ चलि रहल छल कि अचानक एकदिन भोरमे मुक्ता देखलीह, भानसघर ओहिना पड़ल अछि । एकर मतलब एखनधरि भुन्टी अपना रुमसँ नहि निकलल अछि । किछुदेर प्रतिक्षा कएलाक बाद मुक्ता ओकर रुममे एलीह । दूतल्लाक घरमे उपर मुक्ता आ निचामे भुन्टी रहैत छल । मुक्ता ओकर रुममे एलीह, भुन्टी रुममे नहि छलीह । आ बच्चा ओछाएनपर सुतिरहल छल ।
मुक्ता बच्चाके कोरामे उठा लेलीह । बच्चा लग एकटा चिट्ठी राखल छल । चिट्ठी देखिकऽ किछु देरक लेल ओ आश्चर्यमे पडि़ गेलीह । फेर मुक्ताके रहल नहि भेलन्हि ओ ओकरा पढ़ब शुरु कएलीह ।
चिट्ठीमे लिखल छल, ‘दीदी, हम बताहि नहि छी । मुदा हमरा बताहि बनए पड़ल । कारण एना नहि करितहुँ तँ अपने हमरा घरमे रहए नहि दैतहुँ… हम बहुत गरीब छी । किछुदिन पहिने शिवनन्दन सर हमर गाम आएल छलाह । ओ हमरा एकरा सुन्दरसन जिवनक सपना देखौलन्हि । बदलामे अपने बुझिए गेल हएब हम कतेक बड़का मुल्य चुकेलहुँ…..दीदी हम सरकँे दबाब देने छलहुँ यदि हमरा अपन घरमे नहि रहए देब तँ हम सभ बात अहाँकेँ कहि देब…’
मुक्ताक चेहरापर तनाब देखाए लागल छल । फेर चिट्ठीकेँ पढ़व आगा शुरु कएलीह, ‘..सर जेहन होइथ ओ अपन घर नहि तोड़ए चाहैत छलाह । यदि हम चाहितहुँ तऽ अपनेकेँ घरमे रहि सकैत छलहुँ, मुदा हम बुझैत छी सत्यकेँ बहुत दिन नहि नुकाएल जा सकैत अछि… दीदी, अपने एतेक नीक छी कहिओकाल लगैत छल अपनेक संग हम बईमानी कऽ रहल छी, मुदा एहि बच्चाक कारणेँ चुप्प भऽ जाइत छलहुँ ..’
बच्चाक शब्द अबिते ओकरा दिस तका गेलन्हि । ओ निर्भिक भऽ सुतल छल । बच्चाक प्रसन्नचीत चेहरा हिनका आइ आकर्षित नहि कऽ रहल छल । फेर चिट्ठी दिस तकलीह, ‘…दीदी आब ई बच्चा अहाँक अछि । अपने जेना चाहब एकरा पालब… हम सरकेँ माफ कऽ देलहुँ अछि, अहुँ हुनका माफ कऽ दीऔक…’
मुक्ता चिट्ठी पढि़ कऽ मानु आकाशसँ नीचा खसि पड़लीह । एतेक बड़का धोखा, एतेक बड़का अपराध । हुनक आँखिक आगाँ सभ किछु होइत रहल आ हुनका पतो नहि चलल ।
ओ कहिओ शिवनन्दन आ भुन्टीकेँ एकसंग नहि देखने छलीह, आ नहि दुनूक बात करैत सुनने छलीह, तखन फेर कहिआ…?
मुक्ताकेँ लगलन्हि रुमक देबाल चिचिया–चिचिया कऽ कहि रहल अछि, ‘मुक्ता, बताहि ओ नहि तो रहए, जे अपन पति आ एकटा अनजान लड़कीपर भरोस कऽ लेलए । बताहि.. बताहि…. बताहि…’
