

♦ कर्ण सन्जय, विराटनगर
आइ फेरसँ कानमे तूर-तेल ध’ क’ सुति रहल छै कोलकात्ता
मर’सँ पहिले मरि गेल छै लोक
शायद
मरल लोकक बीचमे
ओ चिचियाइत रहलै जोर जोर सँ
कनैत रहलै
हुकरैत रहलै
तकैत रहलै बकर बकर
गिद्धजकाँ नोचैत रहलै देह
नढियाजकाँ गिधनैत रहलै
आँखिसँ चुबैत रहलै खूँन
योनिसँ वहैत रहलै वीर्य
पराजित होइत रहलै प्रतिरोध
खण्डित होइत रहलै शील
ओ करैत रहलै बलात्कार
देहक माटि सँ बलात्कार
देहक पानि सँ बलात्कार
देहक अग्नि,वायु, आकाश सँ बलात्कार ।
गिद्धसभसँ भरल आकाशमे
दिना-दृष्टि बिका रहल छैक मनुख आ मनुखक काँच माउस
ओकर कोँढ-करेज, किडनी,फेफडासभ
आई-काल्हि
मनुखक भेषमे घरे-घर परिकल छैक भेडियासभ
मोमिता नै छैक पहिले आ अन्तिम शिकार
संवेदना मरैत समाजके मूँह दुसि रहल छैक
सेमीनार हाँल मे फेकल निर्वस्त्र बेटिक लाश
समस्त सभ्यताके अतृप्त भोगक लाश ।
पोष्टमार्टम रिपोर्टक प्रतिक्षामे मुर्दाघरक चौखैट पर स्वयं ठाढ छैक मृत्यु
चश्मा पोछि क’ देखियौ
सुतल छै पुलिस आ सुतल छै दरोगासाहेव
निन्दमे चलै छैक सरकार आ सरकारक सरकारी अस्पताल ।
उतारि लिय आकाशमे टाँगल सूर्यके
मिझा दियौ सबटा डिबिया आ गोसाउनी घरक दीपके
बुता दियौ सडक-बत्ती आ लैम्पपोष्टसभके
बिछ लिय एक एकटा भुकभुकाति तारासभके
आइ अन्हारक विजयोत्सव छैक
मूँहमे कारी-चून लगा क’ हारल नटुआजकाँ नाचि रहल छैक शहर
भरल रङ्गमञ्च पर ठाढ समय, बिसैर गेल छैक जीवनक संवाद
बेटिक भार ढोति स्त्रीदेह मे फूला गेल छैक पलाश
आ पलाशक आगिमे सराबोर भेल बडमहल वृक्षसभ
गढि लेने छैक आगिएसन लाल-लाल पोछल पोछल देह
झहरैत फूलसन देह
हरियर पातसन देह
वर्षाक बूँदसन देह
चाननक सुगन्धसन देह
ढोलक थापसन देह
मृत्युक धापसन देह ।
आबै जाओ
अहि मृत्युु के मौन अवधि मे
सुनगति चिताके छाउर सं
लगा लिय कलंकके टीका अपन अपन बिच मस्तक पर
जतय लोक लगबैत अछी चाननक ठोप ।
(सन्दर्भ कलकता रेपकाण्ड)
