

♦ सुजीत कुमार झा
दुलरी गामसँ शहर आबि गेलीह । कहल जाए तऽ हुनका आनि देल गेल । मुदा हुनका नहि शहर बढि़या लागल, नहि राम दयाल, आ नहि उच्च छहरदेबालीसँ घेराएल बिस्तीर्ण जमीन ।
शहरक बजनाई भुकनाई, तौर तरिका हुनका बुझएमे आबिए नहि रहल छल । स्वयंसँ १० बर्षक बड़का कारी लम्बा चौड़ा राम दयालके सामीप्यमे कोनो रोमाञ्च नहि भेटि रहल छलन्हि । सदिकाल कानबाक मोन करैन्हि । माय बाप जीबित रहितथि तऽ सोन जेहन दुलरीकेँ पिण्ड छोड़ाबए सन भावसँ नहि विआहल जाइत, जेना पित्ती पितिआइन विवाह कऽ देलन्हि ।
पित्ती पितिआइनकेँ डियूटी बजाबएसँ अवश्य छुट्टी भेटल मुदा ई छहर देबाली माने नख्खु जेलक सजाय छल । निर्जन–नीरब ।
एकदिस घरक मालिकक बड़काटा दूमहला घर, आ दोसर कात खपड़ाबला जतए दुलरीकेँ राम दयालसंग ७ वचन निमाहिक छैन्हि । बाँकी खाली स्थानमे लान, फूल, तरकारी, करोटन, बोनसाइन । राम दयाल पता नहि कोना रहैत छथि । बीना ककरो सँ बात कएने कहिओ मोनो नहि उबिआइ छन्हि ? पूछी तऽ बीना मतलबके बात करैत छथि, ‘हम गाछ बृक्षसँ बात करैत छी । एतए बहुत आनन्द अबैत अछि । दुलरी आउ हमरा लग बैसू, खुर्पी पकरु आ संग—संग तरकारी लगाबए लेल क्यारी तैयार करु ।’
दुलरीकेँ इन्ट्रेस्ट राम दयालमे नहि तऽ क्यारी बनाबएमे सेहो नहि । कहए लेल तऽ हावा महलसन, बड़का घरमे तीन लोक –साहेब, दीदी आ निशान्त नामक छोट बच्चा रहैत छथि मुदा तीनू प्राणी कतए नहि कतए हेराएल रहैत छथि ।
साहेब दिनभरि अपन सः मिलमे । दीदी घरक भीतर । निशान्तकेँ लऽ कऽ साँझमे अवश्य फूल सभ देखए अबैत छथि । मुदा दुलरीसँ बात करब अपन सम्मानक हिसाबसँ नहि मानैत छथि । राम दयालसँ सेहो मात्र काजक बात करैत छथि, दू चारिटा वाक्यबला मात्र, राम दयाल दीदीक घरक भीतर कहिओ नहि जाइत छथि । दुलरीकेँ गहूँम धोअ, चाउर बीछऽ वा सर्फसँ बोरल चादरि वा पर्दाकेँ खिचबाक लेल बजाओल जाइत अछि ।
कुल मिला कऽ नख्खु जेलक सजाय ।
अचानक देखैत छथि खपड़ा घर लग एकटा अनारक गाछ, लहलहा रहल अछि । विदा होइत चौमासक समय अपन अस्तित्वक घोषणा करैत अनारक देखिते दुलरीक भीतर लहरि दौडि़ गेल । अनारसँ हुनकर पुरान सम्बन्ध अछि ।
नैहरमे बीचे आंँगनमे अनारक बड़का गाछ अछि । खूब फडैÞत अछि । दाना उज्जर आ गुलाबी होइत अछि । ओना ओहन लाल नहि होइत अछि जेहन निशान्त लानमे बैसि कऽ खाइत छथि ।
मोती जकाँ दाना देखि कऽ दुलरीक मुहँमे पानि भरि जाइत छैन्हि । यदि ई गाछ लाल दानाबला खूब फल दिए तऽ नख्खु जेलमे हृदय लगाबएकेँ कारण भेटि सकैत अछि ।
दुलरी अनार गाछक जरिकेँ चारु कात कोरिया कऽ ओहिमे पानि भरि दैत छथि ।
झुमैत अंगौठी मोड़ करैत चिक्कन चमकैत पातबला गाछ गतीसँ बढि़ रहल अछि । लाल फूल लागल जे मुरझा कऽ खसि पड़ल ।
निराश भऽ कऽ ओ राम दयालसँ कहलीह, ‘अनार नहि फरत की ?’
‘गाछकेँ तऽ बड़का होबए दिऔक ।’
अनारक ताजगीसँ संगत करैत दुलरीकेँ सभ किछु बढि़या लागए लागल । जहिआसँ गर्भवती भेलीह, अनारक पातक सुगन्ध बहुत बढि़या लगैत छन्हि । गाछक लग जा लम्बा श्वाससँ सुगन्धकेँ फेफरामे भरि कऽ अनारमय भऽ जाइत छथि ।
गाछ बढि़ रहल अछि , इम्हर गर्भमे कोनो आकार लऽ रहल अछि । दुलरी सर्तकता अपना रहल छथि । शिशु सकुशल अपन गर्भ काल पूरा करए आ अनारमे खूब फल लगए । पहिल फूल जानकी जीकेँ चढ़ाएब । दोसर दीदीकेँ देबैक, मालकिन छथि । आब तऽ अपना मानए लागल छथि । हुनकासँ जे काज करबैत छथि, मेहनत नामा दैत छथि । राम दयालकेँ ठीक पहिल गतेकऽ तलब भेटि जाइत अछि । रहबाक लेल बढि़या खपड़ाक घर देने छथि । अफरादी पानि । तरकारी । हावा, प्रकाश, ठण्डा एतेक सुख आ खुल्ला वातावरण अछि कि कहिओ–कहिओ स्वयंकेँ मलिकानि होबएके अभिमान होबए लगैत छैन्हि ।
आ ई अनार ?
जेना किओ अपने हुए । बढि़या कनोजरि छोड़ने अछि । जखन कि गमलामे बहुत तकनीक लगा कऽ तैयार कएल गेल अछि बोन्साइ ?…देखि कऽ दुलरीकेँ बहुत हँसी अबैत अछि । जखन राम दयाल कहैत छथि एहि घरक रौनक बोन्साइसँ अछि । शहर आ दीदीसँ जे लोक भेटए अबैत अछि बोन्साइ अवश्य देखैत छथि, तखन दुलरी चकित भऽ जाइत छथि,‘ एहिमे कोनो रौनक नहि अछि, जे हमर अनारमे अछि ।’
राम दयाल महिलाक कौतुक पर लुटि जाइत छथि, ‘एहिमे की खराबी छैक ?’
‘एहन लगैत अछि जेहन सुखाएल रोगबला बच्चा । अहाँ एकरा देखभाल नहि करैत छियैक तखन तऽ ई गाछ नहि बढि़ रहल अछि ।’
ई कनोजरि नहि, गाछ अछि एकरा बोन्साइ कहैत छैक ।’
‘गाछ एहन छोट होइत अछि ?’ एकरा छोट बनाबएक लेल बहुत मेहनति करैत छी । दीदी कहैत छथि बहुत बढि़या बोन्साइ बनबैत छी । ई बरक गाछ देखिऔ १० वर्ष पुरान अछि । दीदी बरिसाइत पावनिमे एकरे पूजा करैत छथि ।’
‘हे भगवती एकर पूजा ? ई असली नहि लगैत अछि, जेना जादुगर अपन जादू लगा कऽ छोट बना देने हुए ।’
‘जादू नहि छोट बनएबाक बिधि होइत अछि । नेबो, आम …….सभ बोन्साइ अछि ।
‘हे भगवती…..।’
दुलरी खुलि कऽ हँसली । हँसी परिभाषित करैत छल अस्वीकार करैत– करैत राम दयालकेँ स्वीकार कऽ लेने छथि ।
‘बुझल अछि एकर मोल हजार रुपैयाँ अछि । अपन ज्ञान बढ़ाउ, शहरक नियम कानून सीखू ।’
दुलरी एहन शहरक नियम कानून नहि सिखती जतए बरक गाछ प्लास्टिकक गमलामे बढैÞत हुए । जाहिमे झुलएकेँ लेल हवाइ जरि नहि होइत अछि, फल नहि लगैत अछि, छाँह नहि भेटैत अछि । अनार फल, छाँह, हावा ठण्ड सभ देत ।
‘हमर अनारकेँ बोन्साइन नहि बना देब ।’
‘ठीक छै–ठीक छै ।’
दुलरी एकटा बच्चीकेँ जन्म देली । अनार सन लाल, गोल सुन्दर ।
दुलरीकेँ लगैत छन्हि बच्चाक शरीरमे अनारक सुगन्ध भड़ल अछि ।
प्रसूतिमे ओ अनार दिस ध्यान नहि दऽ सकलीह । स्वस्थ भेलीह तऽ देखलीह गाछकेँ कतेको दिनसँ पानि नहि भेटल अछि । लागल शान्त उदास ठाढ़ गाछ उल्हन दऽ रहल अछि । बच्चा की भेल जे हम उपेक्षित होबए लगलहुँ ।
दुलरी गाछमे दू तीन बाल्टिन पानि राखि देलीह । पूरा पानि माटि सोखि लेलक । गाछ प्यासल छल । पानि मिश्रित अनारक गमक फेफरामे पहुँचिते प्रसवसँ पीड़ाएल दुलरीक शरीरमे फुर्ती चलि आएल ।
अनारक कनोजरि खपड़ा घरसँ उच भऽ गेल । दुलरी माथ उठा कऽ कनोजरिकेँ एहि गौरबसँ देखैत छथि जेना कोनो माय अपन शरीरसँ उच्च भेल पुत्रकेँ निहारैत अछि ।
फूल लगैत अछि मुरझा कऽ खसैत अछि । दुलरीकेँ आस टुटए लगैत छैन्हि । ई फड़त । जखन फड़ल, दुलरीकेँ विश्वास नहि भेलन्हि फल गुप्त रुपसँ कोना लागि गेल । ई लीला भगवतीए जानैथि । छोटसन बल आकारकेँ हरियर रंगसन सुन्दर चमकदार फल राम दयालकेँ सूुचना देलीह । साँझमे फूल देखए दीदी अएलीह तखन ओ कहलीह, ‘दीदी अनारमे फल देलक अछि ।’
दीदी देखलन्हि दुलरीकेँ मुहँमे गजबकेँ तेज भड़ल छल ।
‘पैmरि गेल अहाँक गाछ ?’
अहाँक गाछ घोषित कएल जाएत दुलरीकेँ बढि़या लागल ।
‘आउ ने दीदी देखिओ ने ।’
दीदी गरदनिकेँ इम्हर उम्हर झुका कऽ फल देखए लगलीह ।
दुलरी सर्तक कएलन्हि, ‘दीदी आंगुर नहि देखाउ फल सडि़ जाएत ।’
‘सड़बे करत दूटा तऽ खसि पड़ल अछि ।’
दुलरी उत्साहमे माटि पर खसल फलकेँ नहि देखि सकल छलीह । ओ दुनू फलकेँ उठा लेलीह, ‘कोना खसि पड़ल दीदी ?’
‘कमजोर फल खसि पड़ैत अछि जे बचल अछि ओहो खसि पड़त, नहि खसल तैयो बड़का नहि हएत ओ स्वाद सेहो नहि हएत जे बजारमे भेटएबाला अनारमे होइत अछि । ओ बाहरसँ मंगाओल जाइत अछि । खूब लाल आ मीठ होइत अछि अपना इम्हरकेँ जलवायु अनारक लेल बढि़या नहि होइत अछि । फल छोट आ बेस्वाद होइत अछि ।’
दीदीकेँ विश्लेषण दुलरीक बौद्धिक क्षमतासँ बेसी छल ।
‘हम एतेक सेवा कएलहुँ अछि दीदी फल बढ़बे करत मीठ सेहो हएत सेवा ब्यर्थ नहि जाइत अछि ।’
दीदीकेँ दुलरीक भावनासँ प्रयोजन नहि । आश्चर्य अवश्य अछि अपन व्यस्तता आ लापरवाहीमे नहि देखि पेलीह आ अनार एना फैडि़ गेल ।
‘..अहाँक सेवा एकरा राक्षस जकाँ बना देलक अछि । दुलरी आइ काल्हि एतेक बड़का गाछ किओ नहि लगबैत अछि । फल कम दैत अछि, स्थान अधिक घेरैत अछि । छोट कलमी गाछ बढि़या होइत अछि इम्हर धात्रीक आ आमक गाछ देखू छोट अछि आ बढि़या फल दैत अछि । राम दयालसँ कहब एहि अनारकेँ काटि दिए । फुलबारीमे जंगल बना देने अछि ।’
दुलरीकेँ बहुत दुःख लागल, ‘दीदी हरियर गाछ कटलासँ पाप लगैत अछि । एकटा कोन्हमे अछि ककरो किछु नहि बिगाड़ैत अछि ।’
‘दुलरी अहाँ बताह तऽ नहि छी । ई अहाँक गाम नहि, शहर अछि, ई बुझल करु ।’
दुलरी सुरक्षा बढ़ा देलीह । दीदी नहि बुझैत छथि एहि गाछसँ हमर सम्बन्ध भऽ गेल अछि । सम्बन्ध काटि कऽ नहि फेकल जा सकैत अछि ।
भगवती एकर फल खूब बढ़ए, लाल आ हिलसगर हुए । तखन ओ दीदीकेँ सहमत कऽ लेतीह एतेक मीठ फल दऽ रहल अछि नहि कटबाउ ।
इम्हर बच्चा बढि़ रहल अछि ओम्हर फल । दुलरीकेँ दू टा रचना ।
कृतित्व । एक ओ जन्म देने छथि दोसरकेँ पोसने ।
जखन तखन दुलरी अनार लग घुमैत रहैत छथि ।
हे भगवती ! सुगा आ बगड़ा एहि लगपासमे घूमए लगैत अछि । भोरमे सुगा अबैत अछि बेरियामे बगड़ा । फल कतैरि कऽ बेकार कऽ देत । दुलरी पातर सन्ठी लऽ कऽ शत्रुकेँ भगवैत छथि । जखन आंगनमे चारि पाँचटा लड़का संग क्रिकेट खेलैत निशान्तक गेन्द अनारक डारि सँ टकराइत अछि, दुलरीक आत्मा कुहि उठैत छन्हि । बलसँ घरक खपड़ा फुटि जाइत अछि । फल तऽ कमजोर अछि ।
दूटा लड़कासंग फल उठौने आएल निशान्तकेँ दुलरी चेतावनी देब अपरिहार्य बुझलीह, ‘बाबू एतए गेन्द नहि लाउ । दू चारिटा फल अछि टुटि जाएत ।’
निशान्तक लेल बढि़या सूचना, ‘फल ? हँ ई तऽ अनार अछि ।’
निशान्त कुदि–कुदि कऽ लड़का सभसँंग देखए लगैत अछि ।
दुलरी अभिमानमे छथि । निशान्तकेँ नव चीज देखौलन्हि अछि ।
‘बाबू, एखन पाकल नहि अछि । पाकि जाएत तऽ एकटा भगवतीकेँ चढ़ाएब । एकटा अहूँकेँ देब । ’
निशान्त बाजल,‘ गाछसँ तोडि़ कऽ फल खाएमे बहुत मजा अबैत अछि दुलरी । एकबेर हम पापाक संग जंगल गेल छलहुँ ओतएसँ हम खूब अनार तोडि़ कऽ अनने छलहुँ ।’
दोसर लड़का बाजल, ‘हँ हम सभ झा अंकलके फुलबारीसँ आम चोराकऽ खाइत छी ।’
ई अलग चिन्ता ।
दुलरी नहि सोचने छलीह जे चोरी भऽ सकैत अछि । गाममे उपद्रबी लड़कीकेँ संग फुदी लालक फूलबारीसँ आम आ लताम चोरबैत छलथि । रखबारकेँ हल्ला कएला पर भागि जाइत छलीह । फेर सुरक्षित दूरी पर जा जोड़सँ चिचिआइथि, ‘दू चारि पैसाक आम लताम अछि बाबा अहाँक बैंक थोरहे लुटलहुँ अछि ।’
आइ ज्ञान भेटल । बात मूल्यकेँ नहि, अधिकार आ लगाबकेँ अछि । अनार चोरी भऽ जाएत तऽ हुनकर हृदय टुटि जाएत ।
एहि अनारक गाछेक कारण नहि पसिन पति राम दयालकेँ संग मोन मनोने छलीह ।
अनार बचले अछि कतेक ? कुल तीन, सुरक्षा करए पड़त ।
पुरान सूती साड़ीकेँ फाइर कऽ ओ फलकेँ पोटरी बना देलीह । फल नूका गेल अछि । नहि सुगा बगड़ा खएत आ नहि उदण्ड लड़का चोराएत । …….हे भगवती कतेक सुन्दर अनार अछि ।
सम्भावित लाल रंग आ मधुर रस भड़ल दानाक कल्पना कऽ दुलरी थिरकि उठैत छथि ।
निशान्त अनारकेँ देखबाक लेल बराबर आबए लागल ।
पोटरीकेँ देखि बहुत जोड़सँ हँसल, ‘दुलरी अहाँ तऽ फलकेँ गन्जी पेन्ट पहिरा देलिए अछि ।’
‘चिड़ै सभसँ बचाबए लेल । आ हँ अहाँ एखन नहि तोडि़ लेब पाकत तऽ स्वाद आओत । ’
चोरा नहि लेब, नहि कहि सकलीह ।
‘ एखन तऽ काँचे अछि नहि, काँच अनार केहने दून लगैत अछि ।’
‘कोना बुझैत छियैक ?’
‘जंगलसँ काँच अनार तोडि़ कऽ अनने छलहुँ सभ फेकए पड़ल ।’
मुदा कनी डरा देब बढि़या रहत । ‘काँच फल तोरु वा काँच गाछ काटलासँ पाप लगैत अछि । ’
‘…बुझल अछि । हमर बुकमे लिखल अछि गाछ बृक्ष सेहो श्वास लैत अछि जेना हमसभ लैत छी । अपन भोजन बनबैत अछि पानि पिबैत अछि जेना हमसभ । हावा आ पानि नहि भेटल तऽ गाछ सुखा जाइत अछि । हम अनारक ई डारि तोडि़ देब तऽ ई सुखा जाइत फेर समाप्त भऽ जाएत बुझल अछि । किए कि एकरा भोजनपानी नहि भेटत ।’
निशान्त विज्ञानकेँ एहि प्रकारे सरल रुपमे बुझौलन्हि कि दुलरी जेहन बुद्धु सेहो बुझि जाए ।
दुलरी बजलीह, ‘काँच गाछ कटलासँ पाप लगैत अछि से तऽ बुझल छल मुदा गाछ हमरा सभ जकाँ श्वास लैत अछि आ खाइ पिबैत अछि से नहि बुझल छल ।’
‘अहाँकेँ बुझल अछि काँच गाछक डारि कटलासँ गाछे नष्ट भऽ जाइत अछि तकरबादो लकड़ीकेँ काटि कऽ अहाँकेँ आंँगनमे ढेर लगाओल जाइत अछि ? पाप लागत ।’
निशान्त कन्हा उचकाकऽ हँसल, ‘दुलरी अहाँक भेजामे कोनो बढि़या बात नहि आबि सकत ओतऽ हमर बिजनेस अछि सः मिलमे पापा कतेक मेहनत करैत छथि ।’
फलकेँ हरियर रंगमे ललछहन सिन्दुरबला रंग आबए लागल । बहुत बेमौका पर काका काकीक आमन्त्रण आएल । छोटका बेटाक विवाहमे आवएकेँ अछि । फलकेँ मोह अछि मुदा नैहरिकेँ मोह अलग होइत अछि । भलहि ओतए माता पिता जीबैथि नहि होइथि । भलेहि काका काकीकेँ डियूटी बजाबए पडैÞत छल । राम दयाल तऽ दू दिनमे चलि अएलथि । ओ दू दिनसँ बेसी छुट्टी लैथि तऽ दिदीकेँ लगैत छल फूलबारीक बेइज्जति भऽ सकैत अछि ।
दुलरी एक हप्ताक बाद अएलीह । काकीक गृहस्थीमे ओ कोल्हुकेँ बरद बनल छलीह । घुमि कऽ अएलीह तऽ कुल बचल तीनू फलमे एकौटा नहि अछि । हावा बिहाडि़सँ खसल की चोरी भऽ गेल ? ठीकसँ पकबो नहि कएल छल ।
दुलरीकेँ लागल हुनकर मजगूत पकडि़सँ छुटि कऽ बच्चा पाथरपर जा कऽ टकरा गेल हुए आ ओकरा अंग भंग भऽ गेल हुए । माटिपर छितराएल छिलका, सफेद अपुष्ट दाना पुष्टि कऽ रहल छल । ओकरा अक्रामक तरीकासँ तोड़ल आ नोचल गेल अछि । फल सभसँ उपरका डारिपर छल । ओकरा तोरए लेल ओकरा झुकाओल गेल हएत । फलबाला डारिकेँ निर्ममतासँ लिबाएल गेल हएत ।
महाविनाश ! दुलरीकेँ हृदयक धड़कन तेज भऽ रहल छल । आहट पाबि कऽ खपड़ा घरमे सुस्ता रहल रामदयाल बाहर निकलला, ‘आबि गेलहुँ ?’
‘फलकेँ तोड़लक ?’
‘भीतर आउ ने ।’
‘केँ तोड़लक ? अहाँ की कऽ रहल छलहुँ ?’
‘भीतर आउ ने ? ’
‘केँ तोड़लक ?’ एतेक उच्च पर चढि़ कऽ बहरिया लोक अवश्य नहि तोड़ने हएत । बाबू तोड़लक की ?’
‘हँ । दू चारिटा लड़का सभसंग बाबू तोडि़ लेलन्हि । हम मैदान गेल छलहुँ फिर्ता अएलहुँ तऽ बाबू अनार छिल रहल छलथि ।’
दुलरीकेँ आँखिमे नोर चलि आएल । निशान्तकेँ बुझल छल डारि तोड़लासँ गाछ सुखा जाइत अछि । बुझल छल कच्चा अनारक स्वाद बढि़या नहि होइत अछि । दीदीकेँ एतेक लिहाज करैत छलीह जे बीना बजेलोपर अस्थिरेसँ जाइत छलीह । बेटी के देखैत रहब कहैत सीधे चलि गेलीह ।
राम दयाल रोकलन्हि । नहि रुकली दुलरी, नोराएल आँखिए बढि़ गेलीह । दीदी भेद बुझि गेलीह, ‘आउ दुलरी ।’
‘दीदी हमर अनार किओ तोडि़ लेलक अछि ।’
निशान्त अकबका गेल मुदा बाजल, ‘एतेक बड़का छए तैयो दुलरी तो बच्चा जकाँ कनैत छएँ ।’
‘बाबू हमर फल…..’
अपराध नुकाबए लेल अक्रामक होबए पडैÞत अछि, ‘शिट मैन । छोटसन बात अछि ।’
‘ नहि बाबू …..’
‘कतेककेँ छल….अनार ५० रुपैयाँ ? ६० रुपैयाँ ? मम्मी तोरा पैसा दऽ देतौक ।’ निशान्त पुष्टि कऽ देलन्हि फल ओहे तोड़ने छथि ।
‘हमर फल काँच छल बाबू ।’
निशान्त आओर अक्रामक भेल,‘ तोहर फल ? जमीन हमर अछि एहिद्वारे गाछो हमरे । फलो हमरे । हम फल तोरु वा फेकू पुछएबाली तो केँ छएँ ? ’
दुलरीकेँ आँखिसँ भट—भट नोर खसए लागल । दीदी निशान्तकेँ रोकलीह, ‘बाबू चुप रहूँ … दुलरी बाबू बच्चा अछि कतबो मना करैत छियैक बच्चा कहाँ मानए बला छैक ? फ्रिजमे अनार राखल छैक, आइए बजारसँ मंगेलहुँ अछि लऽ जाउ बच्चोकेँ खुआएब ।’
दीदी फ्रिजसँ तीनटा बड़का अनार निकालली । बड़का लाल अनार एकटा अनारकेँ चरकल फलक भीतरसँ लाल रस भड़ल दाना झाँकि रहल छल ।
‘नहि दीदी,’ दुलरी पाछू हँटलीह ।
‘लऽ लिअ अहाँक अनारमे कोनो स्वाद नहि छल हएत ।’
‘नहि दीदी ।’
कुरुपे सही, अपन बच्चा कोनो माय अन्य सुन्दर बच्चासँ नहि बदलैत अछि । सर्वनाशक दर्द लऽ दुलरी अपन घरमे चलि अएलीह ।
निशान्तक बात पाछू कऽ रहल छल – जमीन हमर, गाछ हमर ….हम फल तोरु वा फेकू ….।
जमीन निशान्तक अछि मुदा गाछ ? अनार ? दुलरी ई बात कतहुँ मानए लेल तैयार नहि छलीह, अनार हुनकर अतिरिक्त ककरो अछि ?
