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मैथिली कथा – सपनामे ज्ञानक खोजी





 सुजीत कुमार झा
अन्हरिया राति सुनसान जंगल । बीच पक्की सड़क पर रातुक नरवताकेँ चीरैत ट्रकक अवाज गूँजि रहल छल । ड्राइवर ओहि सुनसान सड़क पर तीव्र गतिसँ ट्रक आगाँ दौड़ा रहल छल ।
ड्राइवरक बगलमे बैसल खलासीकेँ दूरसँ ओहि सुनसान निर्वाध जंगलमे कोनो परछाँही ट्रक दिस अबैत बुझएलै । खलासी भयसँ कम्पित स्वरमे बाजल, ‘गुरुजी…………………. देखियौ आगाँसँ कियो आबि रहल अछि ।’
ड्राइवर ट्रकक प्रकाशमे दूर स्पष्ट होइत महिला आकृतीक ध्यानसँ देखए लगैत अछि ।
‘गुरुजी, एहि सुनसान जंगलमे एतेक रातिमे महिला ?’ खलासी घबराइत बाजल ।
ड्राइवर गम्भीर भऽ गेल । क्षण—क्षण समीप अबैत आकृति पर नजरि स्थिर कएलक । टांग ओकर ब्रेक दिस बढ़ल ।
‘गुरु………….. रुकू नहि, अवश्य कोनो गड़बड़ अछि ……………गति बढ़ा कऽ बढि़ जाउ ।’
ड्राइवर सोचमे पडि़ गेल । राजमार्ग …… कोसो तक कोनो घर नहि ………..चारु दिस बड़का—बड़का गाछ आ बोन—झांखुर । एम्हर तँ केओ दिनोमे नहि पयरे निकलैत अछि । एहनमे ई युवती…….. । सलवार समीजसँ करोड़ी सेहो नहि लगैत अछि । लगपासक करोड़ी सेहो रातिमे जंगली जानवरक डरसँ असगर नहि निकलैत अछि । तखन ई अछि के ? एतऽ एतेक रातिमे कोना ? कतऽ सँ आयल आ कतए जा रहल अछि ? कोन समस्यामे अछि ?
ई सभ सोचिते—सोचिते ड्राइवर ट्रकक गति कम कऽ देलक ।
ओम्हर खलासीक डर आओर बढि़ गेल छल । ओ डरसँ कापए लागल छल । आ आतंकित स्वरमे पुनः ड्राइवरसँ कहलक जे ‘नहि रुकू, भागि चलू ।’
मुदा ड्राइवर खलासीक गप्प पर ध्यान नहि दऽ ई निश्चय कएलक जे एहि युवतीक मदत करब । अतः ओ एकदम युवतीक लग आबि ट्रक रोकलक । किछु क्षण युवतीकेँ गौरसँ देखलक । युवती कम उमेरक छल । कम्पित स्वरमे युवतीसँ पुछलक, ‘तोँ के छेँ आ कतए जाए चाहैत छेँ ?’
युवती किछु सोचऽ लागल कि ओ केना आबि गेल एहि सुनसान जंगलमे… अमावश्यमे…ओकर कण्ठ अवरुद्ध भऽ गेलै । ओकरा बुझएलै अवश्य ई सपना अछि । आ कोना एतऽ आबि सकैत अछि । एते रातिमे…एहि स्थानमे …अवश्य ई सपने अछि । आ ई विचार अबिते ओकरा भीतर अदभूत रोमाञ्च भरि गेलै ।
कहिओकाल एना होइत छैक । सुतैत—सुतैत सपनाक अवस्थामे अचानक व्यक्ति एतेक जागरुक भऽ जाइत अछि जे ओकरा ज्ञान भऽ जाइत छैक । ओ जखन चाहय, आँखि खोलि दुःखद स्थितिसँ दूर जा’ सकैत अछि । आ जखन ओकरा विश्वास भऽ जाइत छैक, आँखि खोलब आ दुःखक स्थितिसँ दूर हएब ओकरा अपना हाथमे छैक, तखन ओकरा अपना शक्तिक अभास होइत छैक जे हम जे चाही कऽ सकैत छी ।
जखनकी अवस्था अ‍ेकरा अधीनमे छैक तखन ओ किए नहि मनमानी करए ? अपन इच्छाक पूर्ति करए । ककरो की विगड़तै ? ककरो पतो नहि चलतै ई सपने तऽ छैक ।
तखन किएक नहि अपन उत्सुकता शान्त कऽ लिए ? एहिसँ बढि़याँ अवसर आब कहिआ भेटत ? बाबूजी हरेक समय कहैत छथि जे हमर बुद्धि बड़ तेज अछि । हमरा चिकित्सक बनएबाक इच्छा छन्हि हुनक । एखनेसँ एकर घरमे तैयारी भऽ रहल छैक । घरमे माय नहि अछि तऽ की !
बाबूजी आ भैया तऽ छथि घरमे पुस्तकालय अछि । सिनेमा देखबाक, उपन्यास पढ़एक छूट नहि अछि । टीभी कार्यक्रम सेहो गिनल—चुनल देखबाक अवसर भेटैत अछि ।
आगाँ बढ़क अछि तऽ एकाग्रचित भऽ उद्देश्य पूर्तीक हेतु लगबाक अछि । हुनका सभकेँ अहिसँ बेसी अपेक्षा नहि अछि । ओ अपनामे मस्त किताबसँ सटल रहैत अछि ।
किछु दिनसँ एकटा शब्द बेर–बेर ओकर मस्तिष्कमे हथौड़ी जकाँ बजैर रहल अछि — ‘की होइत छैक बलात्कार ?’ किए बलात्कारक बाद लड़कीक आत्महत्या करए पडैÞत छैक, परिवारजन मुँह नुकबैत रहैत अछि । एतेक सोचि ओकर बुद्धि हारि जाइत अछि । शब्दकोष छानि मारलौं, मुदा अर्थ नहि भेटल, एहन कोन जबरदस्ती एहन कोन बल—प्रयोग ? किछु बुझबामे नहि आबि रहल छल । ई की छैक । ओकर उत्सुकताक अन्त नहि छलै । किए नहि आइ सपना पूरा कऽ लिय ? ज्ञानो भेटि जाएत आ आत्महत्या सेहो नहि करए पड़त ।
तीन वर्ष पूर्व पड़ोसक रितू आन्टी ओकरा अपना घर लऽ गेल छल आ बहुत बैज्ञानिक ढंगसँ ओ ओकरा ‘फैक्ट टच लाईफ’ के विषयमे बतौने छलै । अचानक ओकरा सभकिछु नव लागि रहल छल जेना ओ जागि गेल हो । ओकरा किछु बेसी देखाइ देबए लगल हो, किछु आवाज सुनाए लागल छल । किछु स्पष्ट बुझएमे आबय लागल छलै । मुदा बलात्कार शब्द मात्र एकटा रहस्य बनल रहल । से एकरा जानय—बुझयकेँ एहिसँ बढि़या अवसर अओर की भऽ सकैत अछि ?
ड्राइवर उत्साह बढ़बैत पूछलक, ‘कतए जाएक अछि बेटी ? आउ, बैसि जाउ । आगाँ शहरमे छोडि़ देब । एतए कोसो धरि किओ लोक नहि रहैत छैक ।
बहुत मुश्किलसँ जयन्ती किछु हिम्मत जुटा पौलक । ओ सोचए लागल किछु बाजए पड़त तऽ झूठ किए नहि …। से बाजल — ‘बाट भुतिया गेल छी लिफ्ट दऽ दीअ ?’
‘मुदा अहाँ एलौं कतय सँ ?, घर सँ भागि कऽ एलौं । बिना किछु सोचने उतर देलक ।
फेर देखलक दूनु व्यक्तिक उत्सकुकता किछु शान्त भऽ गेल छल । से आगाँ बाजल— ‘दिनभरि एहि सड़कपर चलैत रहल छलौं । जखन थाकि गेलौं तऽ एकटा गाछक जाडि़मे सूति रहलौं । एखन निन्न टुटल… बहुत डर… लागि रहल अछि ।’
‘से त ठीक अछि मुदा जएबाक कतए अछि ?’ ड्राइवर पूछलक ।
एकर उत्तर ओकरा लग नहि छल । ओ चुप्प रहल ।
‘ठिक छै चलू, बैसू । शहर तक छोडि़ देब ।’
ओ सोचए लागल कि दूनु बीचमे बैसाक’ …. बाटभरि ओ हमरासँ मजाक करत….. बलात्कार करत आ हमरा बलात्कार केना होइत छैक की होइत छैक, तकर जानकारी भेटि जाएत, मुदा से भेल नहि । दूनु सकुचि गेल आ ओकरा खिड़की लग बैसा देलक जयन्तीक डर भगावए के लेल ड्राइवर एकटा अभिभावक जकाँ ओकरा उपदेश देबए लागल । शहर पहुँचला पर पुलिस चौकी लग उतारैत ओकरा माथ पर हाथ फेरैत कहलक— ‘घर चलि जाएब…. उएह अहाँक अपन अछि…. अहाँकेँ नीक देखएवाला उएह सभ छथि….’ कहि ट्रकमे सवार भऽ चलि गेल ।
पुलिसक विषयमे जयन्ती सेहो बहुत किछु सुनने आ पढ़ने छल । ओ सोचए लागल की एखनो किछु नहि विगड़ल । एखनो एतए काम बनि सकैत अछि । मुदा दूटा पुलिसकेँ देखि ओकर करेजक धुक धुक्की बढि़ गेल, हाथ पाएर ठण्ढ़ा होबए लागल ।
‘के छेँ…. की काम छौं ?’
‘हम बाटे बिसरि गेलौं हएँ…. एतऽ बसि जाउ ?’
दूनु पुलिस एक दोसरा दिस देखए लागल ।
जयन्तीक हृदय धुक—धुक करए लागल की शायद आब ओकर उत्कण्ठाक अन्त होबए लागल अछि । ओ भयसँ काँपए लागल ।
‘की नाम छौ तोहर ?’
‘रुना’ बुद्धि एतेक सजग छलैक कि ओ अपन सही नाम धरि नहि बतौलक ।
‘बापकेँ, नाम की छौ ? कतए रहैत छें ? की सोचै छें ?’
ओ ई सोचि कऽ एक के बाद दोसर फूसि बजैत गेल कि पता ई सपना नहि होअय…… सत्य मिलत ? ओ अपन प्रियजनक लेल कतेक लज्जाक कारण बनि जाएत । नहि—नहि स्वयं मरि जाएत, मुदा अपन परिवारजन्यकेँ कोनो हालतमे बेइज्जति नहि होबए देत ।
‘लगैत अछि कोनो अपराधी अछि’, एकटा पुलिस बाजल ।
एखने बन्द कऽ दू डण्डा पड़तै तँ सत्य अपने उगिल देत ।
‘नहि—नहि’ डरे जयन्तीक कण्ठ अवरुद्ध भऽ गेलैक । किछु क्षण अपनाकेँ नियन्त्रित करैत बाजल, ‘अपराधी होइतौं तँ स्वयं एतए अबितौ ? ९ कक्षाक विद्यार्थी छी । काका वकील छथि ।’ हड़बड़ाहटमे एतेक सत्य ओकरा सँ बजा गेल छलै ।
‘लगैत अछि घरसँ भागि कऽ आएल अछि,’ दोसर पुलिस बाजल, ‘नवालिग अछि एतए बैसय देब ठीक नहि अछि । बिना बातक बतंगड़ भऽ सकैत अछि ।’
जयन्ती थकमकाइत नहुँएसँ बाजल— ‘हम घर नहि जायब..,’ कहऽ चाहि रहल छल हमरा सँग जे चाहैत छें से कऽ ले….. बलात्कार कऽ ले, मुदा नहि जानि ओकरा कोन संस्कार आबि कऽ ओकर मँुह बन्न कऽ देलक ।
‘राति कऽ हम तोरा एतए बिना महिला पुलिसके नहि राखि सकैत छियौ । या तऽ तोरा चौकी जाए पड़तौक वा फेर नजदीकक धर्मशालामे ।
बाँकी काल्हि देखबै । आगाँ की करबाक छैक’, एकटा पुलिस बाजल ।
जयन्ती चुपचाप धर्मशालामे आबि गेल । दोसर दिन कोनो तरहे जयन्ती धर्मशालासँ निकलि आएल । जयन्ती आब एक साइकिल लग ठाढ़ तीन युवकसंग गप्प कऽ रहल छल । तीनू ओकरा ललायित नजरिसँ घूरि रहल छल ।
जयन्ती सोझे प्रस्ताव रखलक, ‘हमरा अहाँ सिनेमा देखाएब?’ ओ सभ किछु सोचैत एक दोसरा दिस देखऽ लागल । ‘कि चीज छैक ?’
‘विलाडि़क भागे सीक टूटल’ दोसर हँसल ।
‘ककरा सँग देखब’ तेसर पुछलक ।
‘अहाँ तीनू के संग,’ ओकर उत्तर छलैक ।
‘आउ हमरा साइकिल पर बैसि रहु,’ ओहिमेसँ एक गोटे बाजल ।
जयन्ती कने झिझकैत संकोचसँ बाजल, ‘जी नहि हम पयरे चलब, आ ओ सभ सिनेमा हाँल दिस बढि़ गेल ।’
जखनधरि सिनेमा शुरु नइ भेल ताबतधरि शान्ति रहल । सिनेमा शुरु होइते मानू बिहारि आबि गेल । छीना झपटी शुरु भऽ गेल । ओ क्रमशः घबराहटिमे कखनो एकर तऽ कखनो ओकर हाथ हटबैत रहल । मुदा, अवस्था ओकर नियन्त्रणसँ बाहर होइत जा रहल छल । जखन एक हाथ ओकर सलवार दिस आ दोसर छाती दिस सरकए लागल तँ झटसँ ठाढ़ भऽ गेल । फेर ट्वाइलेट जएबाक अछि कहि, जल्दी सँ बाहर निकलि आएल । दूटा युवक सेहो पाछाँ लागि गेल । किछु देरक बाद बाहर निकलल आगाँ दूनु युवककेँ ठाढ़ देखलक । झटसँ फेर ट्वाइलेटमे घूसि गेल ।
आ सिनेमा समाप्त होएबाक प्रतिक्षा करए लागल । सिनेमा समाप्त होइते भीड़क लाभ उठा कोनो तरहे ओतए सँ भागि गेल । आब ओ घर घूमैत भीड़मे सँ एक छल । ओकरा पता छलै, कियो ओकरा ताकि रहल छै । भीड़मे अपनाकेँे नुकबैत अनजाने बाटमे ओ आगाँ बढैेत रहल । एखनधरि ओ एक विचित्र भयसँ काँपि रहल छल, जेना कोनो चोरी कएने हो वा कोनो बड़का अपराध ।
सपना शायद सत्य भऽ गेल छल । ओ पूर्णरुपमे सत्यकेंँ झेलि रहल छल । स्वप्नक सुरक्षा नहि जानि कतए हेरा गेल छलैं । देखलक समीप मन्दिरमे आरती भऽ रहल छै । मन्दिरमे प्रवेश कएलक ओतए भीड़ छलै । ओहिमे ओ सम्मिलित भऽ गेल । भयसँ शरीर सुन्न भेल जाइत रहैक तएँ एकटा पायामे सटि कऽ आँखि बन्न कऽ लेलक ।
कखन आरती समाप्त भेल आ लोक चलि गेल जयन्तीकेँ पतो नहि चललै । आँखि खुजलै तऽ एकटा साधुकेँ अपना दिस घूरैत देखलक । कोनो स्वचालित यन्त्र जकाँ आगाँ बढ़ल आ हुनकर चरण स्पर्श कएलक । ओकर गरा अवरुद्ध भऽ गेल छलैक । किछु बाजब ओकरा बसक बात नहि छलैक ।
‘तोहर मनकाना पूरा हेतौ…उठ धैर्यसँ काम ले ।’
जयन्ती उठि कऽ ठाढ़ भेल । ओ साधुक आँखि दिस देखलक । एकटा विचित्र ज्वाला धधकि रहल छलै ओहि साधुक आँखिमे । साधु ओकरा अपना पाछाँ अएबाक हेतु कहलक आ यन्त्रवत् हुनकर पाछु—पाछु जाए लागल । हुनक पाछु चलि मन्दिरक प्राङ्गण पार करैत ओ एकटा कोठरीमे प्रवेश कएलक । भीतर घूसिते’ द्वार अपने धड़सँ बन्द भऽ गेल । ओ बन्न द्वारकेँ देखैत थकमका कऽ ठाढ़ भऽ गेल ।
‘चलि आ…’ पलटि कऽ देखलक तँ भीतरक दोसर प्रवेश द्वार पर ठाढ़ साधु ओकरा कहि रहल छल । झिझकैत मोनसँ ओ दोसर द्वार पार कएलक तऽ ओहो धड़ाक दऽ अपने बन्न भऽ गेल । ओ डेरा कऽ, बन्न द्वार केँ देखए लागल ।
साधुक पुनः आदेशात्मक स्वर ओकरा कानसँ टकरएलै— ‘चलि आ‘ देखलक ओ आब भितर तेसर द्वार पर ठाढ़ छल । किछु क्षण ठाढ़ रहल ।
भक्तिपूर्ण विश्वाससँ पुनः ओ आगाँ बढ़ल । धड़ाक दऽ तेसरो द्वार बन्न भऽ गेल । आब साधु चारिम द्वार पर ठाढ़ ओकर प्रतीक्षा कऽ रहल छल । जयन्तीक डरसँ हृदय धड़कए लगलै, गर सुखि गेलै । पैर काँपए लगलै । ओ सिनेहसँ भरि गेल की साधुक भेषमे कतेको राक्षस घुमैत अछि, मुदा की करत… बेसीसँ बेसी ओतबे करत ने, जकर जिज्ञासासँ एतए धरि आएल छी । से अपनाकेँ मजगुत कऽ द्वार पार कऽ गेल ।
देखलक आगाँ एकटा आओर द्वार छल, जतय साधु ठाढ़ छल । केबाड़ लग सँ धूप जड़बाक सुगन्ध ओकर तनमनमे व्याप्त होबए लागल । एकटा छोटका दीप सेहो जरैत देखि रहल छल । मदहोश वातावरणमे ओकर तनमन शिथिल होइत बुझेलै ओतए ओकर बुद्धि सजग होइत जा रहल छल । ओकरा विश्वास होइत जा रहल छल जे एहि पाँचम द्वार केँ पार कएलाक बाद बाँकी सभद्वार ओकरा लेल सभदिनक लेल बन्द भऽ जाएत ।
‘आ तखन साधुक फेर ओहने आदेशात्मक स्वर सुनाए देलक । जयन्ती हुनकर बात जेना नइ सुनने हो । ओकर प्रज्ञा ओतयसँ भगवाक आदेश दैत हो एहन अनुभूति होइते घूमल आ जाही बाटे आएल छल ओम्हरे भागए लागल ।
ओ भगैत जा रहल छल अज्ञान सँ ज्ञान दिस ? शून्य दिस चेतना दिस ? जागरण दिस ? शायद ओकरा एकटा जानकारी भेट गेल छलै । नइ ई ठीक नइ अछि ।
अचेतन मनमे सेहो किछु जन्मजात संस्कार एहन होइत अछि, जकर सीमाकेँं उल्लंघन स्वप्नमे सेहो सम्भव नहि अछि । शायद ओकरा जानकारी भऽ गेल छलै जे स्वप्न अपन अनुभवक आधारभूत घटना पर केन्द्रित रहैत अछि । स्वप्न सँ अज्ञानताक नाश नहि होइत अछि, ज्ञान नहि भेटैत छैक ।