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प्रसंग विद्यापति – नीर जत’ क्षीर बनि जाय





 भीमनाथ झा
‘कवित्वं दुर्लभं लोके’ उक्ति प्रसिद्ध अछि, तथापि कोनो समयमे कविक कमी नहि देखल गेल अछि । एखन तँ सहजहि कविता पूर्वक प्रायः सभ अनुशासनसँ मुक्त भ’ गेल अछि आ नहि बेसी तँ पढ़ल–लिखल सयमे पाँच–सात गोटेक सहचरी अवश्य बनि जाइत अछि, भनहि थोड़बो दिन लेल । मुदा जहियो ई उन्मुक्त नहि छल, काव्यशास्त्रक लक्ष्मणरेखामे घेरायल छल, तहियो एकरा अपनयबा लेल कम लोक नहि बेहाल होइत छल । ग्रामकवि आ नगरकविक माला सदा भकरार रहल अछि, जे रंग–बिरंगक फूलसँ युक्त होइत आबि रहल अछि । फूलक माला तँ फूलेक माला थिक । एहिमे चटक–मटक आ गमक तँ होइत अछि, मुदा ओ एकाध दिनमे मौला सेहो जाइत अछि, फूल सकुचि जाइत छैक आ पत्ती झड़ि जाइत छैक, सुवास बिला जाइत छैक आ ओ कंकाल बनि जाइत छैक, फेर क्यो ओकरा पहिरैछ नहि आ ने घरमे रखबे जोग बुझैछ । ग्रामकवि आ नगरकविक नियति यैह होइछ । किन्तु, जे राष्ट्रकवि होइछ, ओहो फूल तँ होइछ, गमक तँ बँटैछ, मुदा मौलाइछ नहि, समयक संगहि ओकर डगडगी आर बढ़ले जाइछ, चटक रंग आर चढ़ले जाइछ, सुवास आर पसरले जाइछ । ओहन महाकवि वास्तवमे विरल होइछ । ताही कोटिक प्रतिभा लेल कहल गेल अछि– कवित्वं दुर्लभं लोके ।
प्राणीमात्र स्वार्थी होइछ– मनुष्य सेहो, भनहि ओ परमार्थी होयबाक कतबो डंका पीटओ। सूक्ष्मतासँ सोचबैक तँ परमार्थोमे स्वार्थेक तत्त्व निहित भेटत । दान, धर्म, सेवा सभक पाछाँ प्रतिदान वा प्रतिष्ठा–यशस्विताक कामना, स्वार्थभावना । मनुष्यकेँ जे अपन बेगरता नहि शान्त करतैक, ओकर कोनो प्रकारक भूख नहि मेटौतैक, एहन सभ वस्तुक ओ त्याग कयने जायत, भनहि आन तरहेँ ओ कतबो महत्त्वपूर्ण किएक ने रहओ । तेँ कालकेँ क्रूर कहल गेलैक अछि । एकर चाङुरमे सभकेँ पड़नहि आ अपन अस्तित्वकेँ विलीन कयनहि । किन्तु, किछु वस्तु एहनो होइछ जे कालक चाङुरमे पड़ियोक’ विलीन नहि होइछ । ओकरा समकालीन समाज कालक चाङुरसँ बलात् घीचि लैछ । से, ओकरा प्रति दयार्द्र भ’क’ नहि, ओकर उपकार करबा लेल नहि, अपितु अपन बेगरताक कारणे । से, ओहि वस्तुक वा व्यक्तिक यावत काल धरि समाज अपना लेल बेगरताक अनुभव करैत रहत, तावत काल धरि ओकरा कालक चाङुरसँ घीचैत रहत । तेँ हमर विचारेँ, महाकाव्य वैह थिक जे महाकालसँ युद्ध करैत अछि आ सभ युगक लोक ओकरा कालक चाङुरसँ बलात् घीचि लैत अछि– अपना लेल । एतावता महाकाल जकरा उदरस्थ नहि क’ सकय वैह भेल महाकाव्य । एहि सिद्धान्तक अनुसारेँ मैथिलीमे विद्यापतिए छथि जनिका महाकवि कहब, हुनक मैथिली पदावलिए थिक जे महाकाव्यक गुणवत्ता आ सत्ताक अधिकारी अछि ।
चौदहम शताब्दीक विद्यापति शृंगारी कवि छलाह कि भक्तकवि, ताहूमे शैव छलाह कि शाक्त आ कि पंचदेवोपासक, ताहिसँ एकैसम शताब्दीक लोककेँ कोन मतलब छैक, की लेन–देन छैक रु जे छलाह से छलाह, बहुतो एहन छलाह जे अयलाह–गेलाह । मुदा, आइयो हमरा लोकनि जे विद्यापतिक स्मरण करैत छियनि, हुनका पढ़ैत छियनि, से तेँ जे हुनकामे हम अपनाकेँ देखैत छी, अपन जीवनकेँ देखैत छी, अपन समाजकेँ देखैत छी, अपन इच्छा–बेगरताकेँ पबैत छी, अपन कामनाकेँ तकैत छी । से, जँ विद्यापति केवल भक्त रहितथि, जे हुनको समयमे अनगिनत लोक छल होयताह, वा खाली शृंगारी रहितथि, जकर तहियो कोनो कमी नहि रहल होयत, तँ आने लोक जकाँ ईहो कालक चाङुरमे पड़ि विलीन भ’ गेल रहितथि । मुदा, जेँ ई समाजकवि छलाह, जनाकांक्षाक कवि छलाह, जनजीवनक कवि छलाह, जीवनक शाश्वत मूल्यक कवि छलाह, तेँ आइयो वर्तमान छथि, आ एहिमे सन्देह नहि जे काल्हियो परोक्ष नहि होयताह।
विद्यापतिक गीत ने केवल शृंगार आ भक्तिए धरि अपनाकेँ सीमित रखलक, अपितु मनुष्यक जन्मसँ ल’क’ मृत्यु धरिक प्रत्येक संस्कारकेँ, मिथिलाक सभ पाबनि–तिहारकेँ, आचार(विचारकेँ, एक शब्दमे कहल जाय तँ मिथिलाक सम्पूर्ण व्यवहारकेँ संजोगिक’ रखलक आ तकरा विशाल परिसर प्रदान कयलक । मिथिलाक सम्पूर्ण संस्कृति विद्यापति–गीतमालामे गुंफित भ’ गेल अछि । मिथिलाक व्यवहारसँ साक्षात्कार करबाक हेतु विद्यापतिक गीतसाहित्यक केबाड़ खटखटौनहि।
संस्कार आ व्यवहार जेना एक दिनमे बनैछ नहि, तहिना एक रातिमे बिगड़ैछ नहि । संस्कार समाजक शरीरक रक्त थिक जे वंशानुगत प्रवाहित होइत रहैछ । जकर कविता जन–संस्कारमे समाहित भ’ जाइछ तकर धारा युग–युग धरि बहैत रहैछ । विद्यापति एही कोटिक कवि थिकाह जे मिथिलाक संस्कार आ व्यवहारक संग एकाकार भ’ गेल छथि । गीतकेँ आनन्दक वस्तु मानल गेलैक अछि, उल्लासक परिचायक कहल गेलैक अछि, किन्तु मिथिलामे क्रन्दनो लयाश्रिते होइछ । बाल–वृद्ध–विवाहक विकृति, जे मिथिलाक बहुत दिन धरि अभिशाप छलैक, अपन विकरालताक संग विद्यापति–गीतमे साकार भ’ गेल अछि । जनजीवनमे विद्यापतिक सघन प्रवेशक एहिसँ अधिक प्रमाण की भ’ सकैछ जे आनो कविक गीत हिनके भनितामे समाहित भ’ गेल । आ जेँ से भेल तेँ ओ गीत आइयो धरि बचल आबि रहल अछि । जँ जन्मदाताक बाँहि ओ पकडऩे रहैत तँ कहिया ने प्राणान्त भ’ गेल रहितैक ओकर, मुदा विद्यापतिकेँ धर्मपिता मानि हुनके परिवारमे सन्हिया गेल, तेँ आइयो ओकर नाम लेनिहार भेटि जाइत छैक । विद्यापतिक विशुद्ध पद आ हुनक भनितापर चलल आन कविगणक पदकेँ बेकछायब जटिल अनुसन्धानसापेक्ष थिक, जकर विवेचन एत’ अभीष्ट नहि । हम बुझैत छी, जे पद समाजमान्य भ’ चुकल अछि, आब तकर खोधबेधो उचित नहि । किन्तु, ई प्रक्रिया एहि तथ्यक पुष्ट प्रमाण तँ थीके जे विद्यापतिक गीत समुद्र थिक जाहिमे बाहरोसँ पानि आबिक’ मिलि गेल अछि । किन्तु, काव्य–सागर तँ खार सागर नहि भ’ सकैछ, ओ क्षीरसागरे रहैछ जाहिमे पानियो मिलि गेलापर ओहो दूधे बनि जाइछ ।