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मैथिली बालकथा – सुन्दर बिलाडि





सुजीत कुमार झा
एक बृद्ध दम्पति रहथि । एक गोटेके नाम कामेश्वर आ दोसरके फूलवती छलन्हि । धियापुता नहि भेल रहन्हि हुनकासभके, समय काटएके समस्या छल । ओ घरके बहुत साफसुत्थर रखैत छलथि । दलानके छोडि़कऽ घरक चारुकात फूलक क्यारी लगौने छलथि । दिनभरि फूलसभके कोरियाबएमे लागल रहैत छलथि । एतेक करबाक पाछाँ अकेलापनसँ मुक्ति पाबएके इच्छा छलन्हि । कामेश्वरके ओतेक समस्या नहि होइन्ह मुदा फूलवती असगरुवापनसँ बहुत चिन्तित रहैत छलथि । एकदिन ओहिना फूलके दुनू गोटे कोरिया रहल छलथि कि फूलवती कहैत छथि, ‘हमरा लग अपन एकटा बिलाडि़Þ रहति….।’
‘बिलाडि़Þ ?’ पति जिज्ञासासंग हुनकादिस तकलन्हि ।
‘हँ, एकटा सुन्दरसन छोट बिलाडि़Þ रहति ।’
अनपेक्षित बात सुनि कामेश्वर फेर पुछलन्हि, ‘कि करब बिलाडि़ लऽ कऽ ?’
‘हम ओकरासंग खेलाएव, समय विताएव, ओकरा श्रृगांरपटार करब ।’
एकाकी दूर करबाक लेल भऽ सकैत अछि बिलाडि़ नीक साधन होइक से सोचैत कामेश्वर फेर बजलाह, ‘हम अहाँक लेल अवश्य बिलाडि़Þ खोजिकऽ आनब…..।’
पतिक मुँहसँ ई बात सूनि फूलवती बहुत प्रसन्न भेलथि । ओहीदिन घण्टो पतिसंग फूल कोरियावएमे लागल रहलथि । कामेश्वर सेहो पत्नीक प्रसन्नतादेखि उत्साहित छलथि ।
एकदिन भोरे स्नान पूजापाठ कएलन्हि आ जे किछु बनल छल से ग्रहण करैत कामेश्वर बिलाडि़Þक खोजिमे निकलि गेलथि । ओ रौदसँ झपाएल पहाड़ पार कएलन्हि । ओ ठण्ढ़ा पहाड़क छाँहमे सेहो गेलथि । ओतए किछु नहि भेटल । ओ लगातार चलैत रहलाह । अन्तमे ओ एकटा एहन स्थानपर पहुंचलाह जे बिलाडि़सँ लदल छल ।
एम्हर बिलाडि़, ओम्हर बिलाडि़ ,जतए देखु, ओतए बिलाडि़ । चीं चीं, पों पों, म्याउ म्याउ दर्जनो सयो बिलाडि़ ।
‘वाह !’ खुशीसँ ओ चिचिएलाह ।
‘आब हम सभसँ सुन्दर बिलाडि़केँ चुनि कऽ घर लऽ जाएब !’
फेर ओ एकटा बिलाडि़ चुनलन्हि । ओकर रंग उज्जर छल । मुदा जहिना जाए लगलाह तऽ हुनका एकटा कारी उज्जर बिलाडि़पर नजरि पड़लन्हि । ओहो पहिलके बिलाडि़ जकाँ बहुत सुन्दर छल । ओ बिलाडि़के संगे लऽ लेलाह ।
फेर हुनका एकटा रौवाँबला, कथ्थी रंगक बिलाडि़पर नजरि पड़लन्हि । ओहो रंग रूपमे दोसरसँ कोनो कम नहि छल । तएँ ओकरो संग लऽ लेलन्हि ।
फेर हुनका कोनामे पड़ल बिलाडि़Þपर नजरि पड़लन्हि । ओ सुन्दर बिलाडि़Þके छोडि़ कऽ गेनाई हुनका निक नहि लागल । ओ ओकरो अपना संगमे लऽ लेलन्हि ।
ताबैतमे हुनका बूढ़ बिलाडि़क बच्चापर नजरि गेलन्हि । जे कारी आ बहुत सुन्दर छल । एहिके छोडि़ कऽ गेनाई लाजक बात हएत, कामेश्वर सोचलाह । ओ ओकरो संगमे लऽ लेलन्हि ।
फेर हुनका दोसर बिलाडि़पर नजरि पड़ल जेकर पीठपर चीतुवाके बच्चा जेहन पीयर आ कारी रंगक धार छल । ‘एकरा तऽ लइये कऽ जाए पड़लैक,’ हुनका मुँहसँ निकलि गेलन्हि । ओ, ओहो बिलाडि़के संग लऽ लेलन्हि ।
किछु एहन भेल जे हरेकबेर जखन कामेश्वर नजरि उठबैत छलाह, तऽ हुनका एकटा आओर सुन्दरसन बिलाडि़पर नजरि पडि़ए जाइत छलन्हि । ओ ओहुँ बिलाडि़के संगमे राखि लैति छलथि ।
एकर परिणाम ई भेल जे अन्तमे हुनका दर्जनो बिलाडि़के संग लऽ जाए पड़लन्हि । बिलाडि़ जे चाहैत छलाह से भेटि गेल छलन्हि, Þआब ओ घर घूरए लगलाह ।
दर्जनो बिलाडि़के संग घर जा रहल छलाह । ई दृश्य हुनका आश्चर्यसन लगलन्हि एकरबादो कनियाँके प्रसन्न बनेबाक लेल सभ बिलाडि़के संगमे लऽ लेलन्हि ।
बाटमे ओ एकटा इनार लगमे पहुँचलाह । ‘म्याऊ म्याऊ…. हमरा प्यास लागल,’ दर्जनो बिलाडि़ एकहि संग चिचियाएल ।
‘चिन्ताक कोनो बात नहि अछि, एहिठाम बहुत पानि अछि,’ ओ बजलाह ।
हरेक बिलाडि़ एक एक घोंट पानि पिलक, इनार खलियावला नहि छल ।
‘म्याऊं म्याऊं ! हमरा भूख लागल अछि,’ ओ बिलाडि़सभ बाजल ।
‘एहि चौरीमे बहुत घास अछि,’ कामेश्वर बिलाडिसभके घास देखबैत बजलाह ।
हरेक बिलाडि़ घासक एक एकटा झार खएलक आ सभ फेरसँ, हुनकासंग लागि आबि गेल ।
किछुदेरक बाद फूलबती बिलाडि़क संग अपन पतिके अबैत देखलन्हि । ओ चिचिएलीह, ‘ई अहाँ कि कएलहुँ ? हम तऽ मात्रे एकहिटा बिलाडि़ मँगने छलहुँ ।’
कामेश्वर बजलाह, ‘हमरा आबए तऽ दिअ…।’
‘मुदा हमरा तऽ बिलाडि़क बरियाती नजरि आबि रहल अछि ।’
एम्हर बिलाडि़, ओम्हर बिलाडि़ । जतए देखु, ओतए बिलाडि़ । चीं चीं, पों पों, चिल्ला पिल्ली । दर्जनो बिलाडि़ ।
‘हम एतेक बिलाडि़के कोना भोजन खुवाएब ?’ फूलवती पुछलन्हि ‘ई तऽ हमर पूरा घरे खाए जाएत ।’
‘हम तऽ एहि विषयमे सोचनहो नहि छलहुँ, कामेश्वर बजलाह ।
‘आब हम कि करु ?’ फूलवती किछुदेर सोचैत रहलीह । फेर ओ कहलन्हि, ‘हमरा बुझल अछि, हम बिलाडि़ये सभके निर्णय लेबए लेल कहब जे ओहिमेसँ के अपनासभ लगमे रहए चाहत ।’
‘ठीक अछि,’ ओ दुनू गोटे बिलाडि़सभके बजा कऽ पूछलन्हि, ‘तोरासभमे सभसँ सुन्दर के छएँ ?’
‘हम छी, हम छी, ‘नहि, हम सभसँ सुन्दर छी, हम छी !’
‘नहि हम छी,’ सभ बिलाडि़ एकहिसंग चिचियाएल ।
प्रत्येक बिलाडि़ अपनाके सभसँ सुन्दर बुझैत छल । फेर सभ बिलाडि़ एक दोसरसँ लड़ए लागल । बिलाडि़सभ एक दोसरके नोचए खरोचए लागल । ओसभ एतेक जोड़सँ हल्ला मचौलक जे बेचारा ओ दम्पति झट्टसँ दौड़ैति घरमे घूसि गेलथि । हुनका सभके बिलाडि़क झगड़ासँ डर भऽ गेल ।
मुदा किछु कालक बाद बाहरसँ आवाज एनाई बन्द भऽ गेल छल । ओसभ खिड़कीसँ बाहर तकलन्हि । हुनकासभके एकहुँटा बिलाडि़ नजरि नहि अबि रहल छल ।
‘हमरा लगैत अछि जे सभ बिलाडि़ एक दोसरके खा गेल,’ फूलवती बजलीह ।
‘ई बहुत खराब बात अछि,’ कामेश्वर चिन्तित होइत बजलाह ।
‘कनी एम्हर देखू,’ फूलवती बड़का बड़का घासक दिस इशारा करैत कहलन्हि । ओहिठाम छोटकी बिलाडि़ घबराएल बैसल छल । ओ ओहिठाम जा कऽ ओकरा कोरामे उठा लेलन्हि । ओ एकदम दुब्बर पातर छल ।
‘बेचारी, बिलाडि़क बच्चा,’ फूलवती बजलीह ।
‘ई कोना भेल दर्जनो बिलाडि़ तोरा नहि खेलकौ ?’कामेश्वरक जिज्ञासा रहन्हि ।
‘हम तऽ घरेलु बिलाडि़ छी,’ बिलाडि़क बच्चा बाजल ।
ओ दुनू गोटेके आँखि अन्य बिलाडि़के खोजिए रहल छल । ओसभ चारुदिस ताकिए रहल रहथि । तखने ओ विलाडि़क बच्चा बाजल, ‘जखन अहाँ पुछलहुँ सभसँ सुन्दर बिलाडि़ के छएँ, तखन हम चुप्प छलहुँ । ओहीसँ कोनो बिलाडि़ हमरा किछु नहि कएलक….ओ सभ अपनामे झगड़ा करैत भागि गेल ।’
ओ ओहि बिलाडि़क बच्चाके घरक भीतर लऽ गेलीह । ओहिठाम फूलवती ओकरा गरम पानिसँ नहौलन्हि । कंघीसँ केश मिलौलन्हि । प्रत्येक दिन बिलाडि़के दूध पिबए लेल दैति छलीह । जल्दीए ओ मोटगर सुन्दरसन बिलाडि़ बनि गेल ।
‘आखिर हमरासभके सुन्दर बिलाडि़ भेटिए गेल,’ फूलवती बिलाडि़सँ खेलैत बजलीह ।
‘ई संसारक सभसँ सुन्दर बिलाडि़ अछि,’ कामेश्वरके सेहो रहल नहि गेलन्हि ।
हुनका बुझल अछि जे दर्जनो बिलाडि़ ओ देखला मुदा हुनको एहि बिलाडि़ जेहन सुन्दर बिलाडि़ नहि भेटल । एहि बिलाडि़सँ कनियाँके एकाकीपन दूर भऽ रहल अछि, ओ बढ़ीया जँका बुझि रहल छथि ।