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भगवती सीता आ हुनक जन्मक कथा

सीता प्रकाट्य दिवसपर विशेष





सुजीतकुमार झा

जनकपुरधामक पहिचानक बात कएल जाए तऽ माता सीता आ राजर्षि जनकसँ अछि । त्रेता युगसँ एखनधरि इएह पहिचान जनकपुरधाम वा मिथिलाके जिऔने अछि । सीता भगवान रामक लीलाक सहचरी छथि । हुनक चरित्र प्रभुक नरलीलाक आधार अछि । जेना कोनो मजगुत महलक पूरा भार नीव उठबैत अछि आ ‘ओह’ धरि नहि करैत अछि, ओहि तरहँे सीता सेहो मौनभावसँ बीना ककरोपर लांछना लगबैत विपदा–यातनाकँे सहैत छथि । हुनक चरित्रमे सहनशीलताक अपार वल अछि । रामायणमे हुनक चरित्रक विस्तार कम अछि, मुदा ओहि भीतर गहनता अत्यधिक ।
त्रेता युगमे जखन सीताक जन्म भेल पूरे मिथिलामे प्रसन्नताक माहौल बनि गेल छल । जन्मपर केहन माहौल बनल हएत सन्त श्रीमद् रामहर्षणदासजी महाराज ‘श्री प्रेमरामायण’ मे लिखैत छथि –
मिथिला अजिर विहर भरि चाऊ । देखहु प्रेमाभक्ति प्रभाऊ ।।
घर घर बाजहिं नगर बधावा । सोहिल गान सकल दिशि छावा ।।
श्रीविदेहराजजीकेँ निरतिशय प्रेमा भक्तिक सम्प्रभाव तऽ देखू हुनक महलक मणिजडित प्रागंणमे श्रीललि किशोरीजी आनन्द विहार करैत छथि । शिशु ललीजीकेँआगमनसँ मिथिला नगरीक घर–घरमे बधाइ बजि रहल अछि एवं मैथिल महिलाक मुहँ विनिसृत सोहिल गीतक ध्वनि चारु दिशामे पसरल अछि ।
देवी सीताक जन्मक कथा बहुत रहस्यमयी अछि । यज्ञभूमि तैयार करए राजर्षि जनक हर चलाबैत काल ओही भूमिसँ सीता प्रकट भेलि कथा अछि । सीताक नाम एहिसँ जोड़ल देखल जाइत अछि । अर्थात हरक फारकेँ संस्कृतमे सीत कहल जाइत अछि ।
रामायणक पात्र, घटनाक्रम आ कथानककेँ लऽ कऽ बहुतो ग्रन्थक रचना भेल अछि । रामायणक कतेको पक्षक सम्बन्धमे एखनो शोध भऽ रहल अछि । वाल्मीकि रामायणमे जनकजी सीताजीक उत्पतिक विषयमे एहि प्रकार कहने छथि –
थमे कृषतः क्षेत्रं लांगला दुत्थिता मम ।
क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता ।।
भूतलादुत्थिता सा तु व्यवद्र्धत ममात्मजा ।
वीर्यशुल्केति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा ।।
जन्म होइते बधाइ गीत गबैत मैथिलसभ एक दोसरकेँ बधाइ दऽ रहल छथि । ओ माहौल पर सन्त श्रीमद् रामहर्षणदासजी महाराज ‘श्री प्रेमरामायण’ मे आगा लिखैत छथि –
नर अरु नारि मगन सब होहीं । नाचहि गावहिं प्रेम समोही ।।
चोवा चन्दन अतर अरगजन । दधि अबीर केशर मृग मदजा ।।
लै लै छिड़कहिं प्रेमवश, इक इक ऊपर लोग । जो आनंद मिथिलापुरहि, जन्म मैथिली योग ।।
मिथिलाक नर–नारी श्रीललिजीकेँ प्राकट्यसँ आनन्द निमग्न भऽ कऽ, प्रेममे समाएल, नृत्य करैत मंगल गीत गाबि रहल छथि । चोवा चन्दन, इत्र–अरगजा तथा विपुल मात्रामे दही– अबीर, केशर कस्तुरी आदि वस्तुकेँ लऽ लऽ कऽ प्रेममे वशीभूत सभ लोक एक दोसर उपर छिट रहल छथि मिथिलापुरमे जे अनिर्वचनीय आनन्दक घनीभूत बादल पसरल अछि ।
एहने माहौलपर मैथिलीक गीतकार अशोक दत्तक रचना आएल हएत –

आइ जनकपुर नगरिया बजै चारु दिश बधैया
हँसी–खुशी भरि गेलै राजा जनकक दुअरिया
भेलै मिथिलाके भाग उदित बहिना
सुनयना हर्षे लुटबै छथि आन, धन गहना
प्रगट भेली मिथिलेश किशोरी मिथिलाके धन–धन–भाग
कण–कणमे उल्लास भरल मिथिलामे आएल बहार
देब धरापर नयन जुड़ाबथि देखि सिया सुकुमारी
पुष्पक वर्षा करैत कहथि चीर जीबए राजदुलारी
रंग, अबीर, गुलाल उड़ैए सगर अंगना
सुनयना हर्षे लुटबै छथि…
जनकसुता निरखिकऽ सभ किओ भऽ गेल भाव विभोर
दिव्य दर्शन पाबि नयनसँ हर्षे सभके टपकए नोर
घर–घर बाजए जनम बधाइ गाबए मंगल गान
हर्षे पुलकित सभजन बाँटए मिसरी पान मखान
भ्mूमि–झूमि युवतीसभ खनकावए कंगना
सुनयना हर्षे लुटबै छथि…
अनुपम मिथिलाक धरा गर्भसँ प्रगट भेलीह वैदेही
तपोभूमि उल्लासमे डूबल जेना मचल हो होरी
बेला–चमेलीक सुगन्ध लऽ सिहकैए पवन
मयुर जकाँ नाचि रहल मिथिलाके जन–जन
मंगलगान बधैया बाजे ढोल बजना
सुनयना हर्षे लुटबै छथि…

बैशाख शुक्ल नवमी तिथिक दिन छल । आम लोक कल्पना नहि कएने छल हएत, रौदी तोड़ए गेल निसन्तान राजा पुत्री लऽ कऽ लौटता । प्रसन्नताक सम्बन्धमे ‘श्री प्रेमरामायण’ मे लिखल अछि –
सुरवासिन कर मोद महाना । शारद शेष न सकहिं बखाना ।।
जनक द्वार बहु बाजन बाजे । तोप तुपक रव दश दिशि गाजे ।।
मिथिलावासीक हृदयमे परम प्रसन्नताक कोनो सीमा नहि अछि । हिनक असीमित आनन्दक सीमांकन करएमे, श्रीसरस्वतीजी तथा सहस्त्रमुखवला शेष भगवान सेहो असमर्थ छथि । श्रीजनकजी महाराजकेँ द्वारपर अनेक प्रकारक बहुतसन बाद्य बाजि रहल अछि तथा तोप–तुपकक ध्वनि दसो–दिशासँ गूजिँ रहल अछि ।
सीताक जन्मोत्सव बैशाख शुक्ल नवमी तिथिक दिन पड़लाक बादो मिथिलाञ्चलमे एक महिना पहिनहिसँ एकर धुम शुरु भऽ जाइत अछि । एखनो भव्यताकसँग जन्मोत्सव मनाओल जाइत अछि ।
धन–धन भाग हमर घर जानकी जनम लेल सिया,
सियाजी जनम लेल हे बहिना हे,
बाँहिकेर पलना बनाएब सियाके झुलाएब हे
ठुमकि आंगन बीच घुमत बुच्ची मुस्काइत हे
बहिना हे, बुच्चीके मुस्की संग गाएब मनवाँ जुड़ाएत हे
हुलसि धियाके पढ़ाएब इसकूल पठाएब हे
बहिना हे, गार्गी मैत्रेयीसन ज्ञानी धियाके बनाएब हे
आँजुरमे चान तरेगन धियाके समाएत हे
बहिना हे, करमसँ सबा हाथ धरती ई अपने उठाएत हे
गीतकारः अशोक दत्त

घर–घरमे सोहर

घर–घरमे सोहर गाबएकेँ काज बैशाखक पहिले हप्तासँँ शुरु भऽ जाइत अछि । जनकपुरधाममे जन्मोत्सव देखए लायक रहैत अछि ।
धन–धन मातु सुनयना कि धन राजा जनक ऋषि हे
ललना रे धन्य पुनौरा धाम कि सीता प्रकट भेली रे ।
नाड़ छिलए रतनागरि लेब हम गागरि रे
ललना रे राखब तकरा जोगाए परम फल भेटत रे ।

मन्द–मन्द मुस्काथि सीता राजा जनक उत्कर्ष यौ
केहेन पुण्य हम कएल कहिआ एहेन पुत्री पाएल यौ
नेहे मातलि नाचथि सुनयना भेल चहुँदिस भेर यौ ।
चकमक चमकए राज महलिया चमकए चाँचर खेत यौ

सबगुण सीता आगरि गुनक सागर रे
ललना रे मिथिला के भाग सुभाग एहेन धन प्रकटलि रे
गीत नृत्य सम्पूर्ण कलावति कोइली कंठ बैसल रे
ललना रे सीता छथि अति दिव्य कोना कऽ सहेजब रे

मन्द–मन्द मुस्कथि सीता पुष्प छोड़ए मकरंद यौ
मत दादुर राग टेरए मोर नाचय भेर यौ ।
सुग्गा मैना चोंच नोचए नगर भेल अनघोल यौ
एहेन सीता बसथि मिथिला कतेक सुन्नर बात यौ ।

वन उपवन सब हुलसित पवन करए चितचोर रे
ललना रे एहेन सन्तति कहाँसँ प्रकटल मिथिला भेल अनमोल रे ।।

गीतकार  – कैलाश कुमार मिश्र

रातिमे घण्टो सोहर गीतसभ महिला अपन–अपन घरमे गाओल करैत छथि ।
जनकपुरधामक प्रसिद्ध धार्मिक स्थल जानकी मन्दिरमे पूरा उत्सवक माहौल बनल रहैत अछि । जनकपुरधामक जानकी मन्दिरकेँ विशेष रुपसँ सजाओल जाइत अछि । मन्दिरभरि रंगीचंगी बलबत्ति लगाओल जाइत अछि । जहिना विवाहपञ्चमीक आकर्षण रहैत अछि, ओहिसँ कम अहुँमे नहि ।
जानकी मन्दिरक महन्थ रामतपेश्वर दास वैष्णव कहैत छथि, ‘देवी सीताक जन्मोत्सवमे सहभागी होबएकँे अलगे महत्व होइछ, जाहि कारणसँ ई क्षणकेँ किओ गोटे छोड़ए नहि चाहैत अछि ।’
त्रेता युगमे जखन सीताक जन्म भेल छल जनकजी अपन कोषागार खोलिदेने रहथि । ‘श्री प्रेमरामायण’ मे लिखल अछि –
कोषभवन खुलवाय नृप, सबहिं लुठावत दान ।
धरणि परे मणि गन लसत, जनु नभ नखत लखान ।।
मिथिलेशजी महाराज राजकोषागारकेँ खोलाकऽ कोष दानमे लुटा रहल छथि द्रव्यार्थिक आशाधिक द्रव्य संचित लेलापर सेहो पृथ्वीपर छिटल असंख्य मणि–गण ऐना विलासित भऽ रहल अछि जेना आकाशमे इतस्ततः चमकएवला अनगिनती नक्षत्रगण दृष्टिपथक विषय बनैत अछि ।
जन्मोत्सवपर सेहो एहने माहौल बनैत अछि जानकी मन्दिरक महन्थ कहैत छथि, ‘हमहूँ सभ बच्चाक कपड़ा, खेलौना आ प्रसादी वितरण करैत छी मन्दिर पहुँचएवलाकेँ भोजनक व्यवस्था रहैत अछि, अन्य दातासभ सेहो कि बटैत छथि, कि नहि तकर बाते छोड़ू ।’

प्रगटी सिया सुखदैया, जनकपुरमे बाजे बधैया
मख महि कर्षत औचक प्रगट भइ, हरषे लोग लुगैया
जनकपुरमे बाजे बधैया
धनि–धनि जनक–जनकपुर–धरणी, धनि–धनि सुनयना मैया
धन्य–धन्य भाभी सिद्धि प्यारी, धनि लक्ष्मी निधि भैया
जनकपुरमे बाजे बधैया
बाबा लुटावत हाथी ओ घोड़ा, कनक–वसन मणि गैया
मैया लुटो वसन आभूषण, हीरा अशर्फी रुपैया
जनकपुरमे बाजे बधैया
स्वस्तिक पाठ पढ़त पण्डित जन, द्वारे बजत शहनैया
अंगनामे अगिलन नाचति गावथि, ताथेइ ताता थैया
जनकपुरमे बाजे बधैया
निरखि–निरखि पुर नर नारि लली–मुख, पुनि–पुनि लेत बलैया
सचरजीवो श्री जनक लाडि़ली, खेलो जनक अंगनैया
जनकपुरमे बाजे बधैया
बर अनुरुप मिलै अविनाशी, रहे शिव शंकर सहैया
अचल सुहाग भाग परिपूरण आल रहे प्रभुतैया
जनकपुरमे बाजे बधैया
गीतकार – नारायणदासजी महाराज

बहुतो गोटे कहैत छथि, ‘जानकी नवमी, विवाह पञ्चमी, राम नवमी आ झुलामे भगवान राम सीता साकेतधाम छोडि़ मिथिलामे चैलि अबैत छथि ।’ एकर प्रभाव श्रद्धालु भक्तजनसभ पर सेहो सहजे देखल जा सकैत अछि ।
मृत्यु होबएसँ पहिने संस्कृतक विद्वान एवं धार्मिक जानकार पण्डित सूर्यकान्त झा सीता जन्मोत्सवक क्षणकेँ वर्णन करैत कहने छलथि, ‘जानकी नवमीमे सभकेँ शरीरमे एक प्रकारसँ दैविक शक्ति चलि अबैत अछि ।’

उपवासक परम्परा
जानकी नवमीक दिन उपवास करएकँे परम्परा रहल अछि । उपवास कएलापर पुत्रलाभ सम्बन्धी इच्छा पूरा होइत अछि । माता सीताकेँ लक्ष्मीक अवतार कहल गेल छन्हि । माता सीताक नामसँ उपवास कएलासँ घर–घरमे सुख, समृद्धि आ धनक बृद्धि होइत अछि । विवाहित महिला अपन पतिक आयुक लेल उपवास करैत छथि । सुख–सौभाग्य सेहो प्राप्त होइत अछि । कुमारी कन्या बढि़या वर प्राप्तिक लेल सेहो सीता नवमी दिन ब्रत रखैत छथि ।
मान्यता अछि, जे व्यक्ति एहिदिन उपवास रखैत छथि एवं राम–सीताक विधि–विधानसँ पूजन करैत छथि, हुनका १६ महान दानक फल, पृथ्वी दानक फल तथा समस्त तीर्थक दर्शनक फल भेटि जाइत अछि । एहिदिन माता सीताक मंगलमय नाम ‘श्री सीतायै नमः’ आ ‘श्रीसीता–रामाय नमः’ क उच्चारण करब लाभदायी रहैत अछि । एहिदिन जानकी स्तोत्र, रामचंद्रष्टाकम्, रामचरित मानस आदिक पाठ कएलासँ मनुष्यकेँ सभ कष्ट दूर भऽ जाइत अछि ।
एहिदिन जनकपुरधामक दूधमती नदीमे लोक स्नान करैत अछि । किछु वर्षसँ जानकी मन्दिरक उत्तराधिकारी महन्थ रामरोशन दास वैष्णवक प्रयाससँ साधुसभ ओ नदीमे सामूहिक स्नान शुरु कएलन्हि अछि । दूधमती नदीक जानकी जन्मसँगक इतिहास रहल अछि ।
एहिदिन राम जानकीक शोभा यात्रा निकालल जाइत अछि । शोभा यात्रा नगरभरि घुमैत अछि । रामजानकीक डोलासँग साधुसन्तसभ सेहो रहैत छथि । कीर्तन करैत जनकपुरधाममे घुमिरहल साधुसन्तसभकँे ठाम–ठाम स्वागत कएल जाइत अछि । तहिना रामजानकीकेँ आरती सेहो होइत अछि । ओहिसँ पहिने दिनक १२ बजे जानकी मन्दिर भीतर विशेष पूजा होइत अछि ।
साँझमे गंगा सागरक गंगा आरतीक टोलीद्वारा संगीतपर विशेष आरती कएल जाइत अछि । मन्दिर प्रागंणमे होवएवला ओ आरतीमे गंगा सागर आरती टोलीक पण्डितक अतिरिक्त दर्जनसँ बेसी महिलासभ सेहो धूपदीप लऽ कऽ आरती करैत रहैत छथि । अबेर रातिधरि भजनकीर्तन होइत अछि ।
सीता जन्मक कथा
माता सीताक जन्म मिथिलाक पुनोरास्थानमे भेल छल । स्वयं जनकजी ओहिठाम हर जोतए पहुँचल छलाह । मिथिलामे अकाल परल छल, लोक त्राहिमाम–त्राहिमाम कऽ रहल छल, एहन समय ऋषिमुनिक सलाहपर ओ हरजोतए पहुँचल रहथि । ओ अवस्थाकेँ गीतरुपमे अशोक दत्त लिखैत छथि –
ज्ञानभूमि तपोभूमि मिथिला नगरमे, पड़ल छल अकाल
जप–तपक प्रजावत्सल राजा, कतेको कएलन्हि उपाय
कऽ अनुष्ठान हर जोतए चललाह, राजा जनक महान
भूमि पूजन कऽ हर जोतए चललाह, राजा महान
भूमि पूजन कऽ हर लऽ नृपति जोतए लगलन्हि परती पराँत
सुगन्धि वयारसंग प्रकाशपुञ्ज चमकल अजबे भेल चमत्कार
धरा गर्भसँ प्रकट भेलीह जानकी शुक्ल नओमी बैशाख मास
देवो निरखि कऽ फूल बरसबैत गाबए लगलन्हि मंगलगान
ज्ञानभूमि तपोभूमि मिथिला….
श्याम–कुटिल केश शिशुमृगनयनी चन्द्रमुखी देदीम्यान
नयन जुड़ाएलसभक हर्षक रहल ने ठेकान
ऋषि मुनि सिद्ध योगी तपस्वीसंग मिथिला सकल समाज
दरश पाबि जानकीके सभ गदगद करए लागल स्तुतिगान
ज्ञानभूमि तपोभूमि मिथिला….
जप तप सिद्ध भेल दिव्य दरश भेल नहि छल कनिको भान
हपसि सिरध्वज अंक लगाओल सियाके सुनयना मुख मुस्कान
आदि शक्तिक एहि पावन भूमिमे कण–कण भरल उल्लास
बुन्द–बुन्द ला तरसैत मिथिलामे भेल जलवृष्टि अमृत समान
ज्ञानभूमि तपोभूमि मिथिला….

वाल्मीकि रामायण, महाकवि कम्बक रामायण सहितक रामायणक अनुसार सीता अपूर्व सुन्दरी मात्र नहि अपितु ओ विष्णु प्रिया लक्ष्मीक अवतार छलीह जे भगवान विष्णुक नारद ऋषिसँ भेटल श्रापक फलस्वरूप त्रेता युगमे रामक सँग जन्म लेलीह, ओही श्रापक कारणँे रामक पत्नीक विरहक दारुण दुःख सहए पड़Þल तथा सीता वनमे रामसँग गेलाक बादो पतिक सँग बेसी दिन सुखसँ नहि रहि सकलीह । किछु ग्रन्थक विद्वान सीता आ रावणबीचक सम्बन्धकँे बापबेटीसँ सेहो जोडि़कऽ लिखैत अछि । एहने एकटा रामायण जकर नाम ‘अद्वेत रामायण’ अछि ।
कहल जाइत अछि ई रामायण १४ अम् शताब्दीमे लिखल गेल अछि । ई मुलतः कथानक नहि भऽ दूटा प्रमुख ऋषि वाल्मीकि आ भारद्वाज मुनी बीचक वार्तालाप रहल अछि । मुदा स्वयं वाल्मीकि अपन रामायणमे एकर चर्चा नहि कएने छथि ।
ई ‘अद्वेत रामायण’ मे सीताक जन्म मन्दोदरीक गर्भसँ भेल उल्लेख रहल अछि । मुदा अधिकारिक रामायणसभमे एहि बातक कतहुँ चर्चा नहि अछि । रामायणपर अनुसन्धान कएने मैथिली साहित्यकार रामचन्द्र झा ‘रमण’ कहैत छथि, ‘जतेक मुहँ ओतेक बात, वाल्मीकि रामायण, तुलसीकृत रामायण, एतेकधरि कि भानुभक्तक रामायण, चन्दा झाक रामायणसभमे सेहो एहन चर्चा नहि अछि कथाकेँ ट्वीस्ट करबाक लेल एहन प्रसंगसभ जोड़ल जा रहल अछि ।’
‘संसार हुनका लक्ष्मीक दोसर अवतारक रुपमे बुझैत अछि, राजर्षि जनक हर जोतैत काल ओ प्रकट्य भेलीह इएह कथा अछि,’ ओ आगाँ कहलन्हि । ‘हिन्दू धर्मक विरोधीसभ एहन बातकेँ बेसी उल्लेख करैत अछि,’ हुनक दाबी अछि । ‘मिथिलाक लोक एहन बातकँे कम्तीमे सुनिओ नहि सकैत अछि,’ हुनक कथन अछि । रामायणक सभसँ बड़का कथाबाचक मुरारी बापू सेहो एहन प्रसंगसभमे नहि परए सभकेँ सलाह दैत छथि ।
‘श्रीप्रेम रामायण’मे ई प्रसंगपर लिखल अछि जतए जनकजी हर चलारहल छलाह ओहिठाम देवतासभ सिंहासनपर बैसाकऽ शिशु रुपमे सीताकेँ अनने रहन्हि ।
कहाँ कहाँ कहि रोदन कीना । भूमि सिंहासन भयो विलीना ।।
नृपति उठाय ललिहिं भरि मोदू । दीन्ह सुनयनहिं के प्रिय गोदू ।।
कहाँ–कहाँ कहिकऽ सद्यःजात शिशुक सदृश ओ रोदन करए लगलीह इम्हर भूमि देवी सहित ओ दिव्य सिंहासन सेहो अदृश्य भऽ गेल । श्री मिथिलेशजी महाराज निरतिशय प्रसन्नतासँ भरिकऽ ललीकेँ ललकिकऽ उठा लेलन्हि आ अपन प्रिया श्रीसुनयनाजीकेँ प्रियकर कोरामे दऽ देलन्हि ।
दम्पति सिय धन पाइ के, शोभित सहित समाज ।
करि प्रवेश अन्तः पुरहि, गनेउ निजहिं कृत काज ।।
सौभाग्यशाली दम्पति श्रीजनकजी महाराज आ श्रीसुनयना अम्बा श्रीसियाजी रुपी महाअद्भूत, मौलिक धनकँे प्राप्त कऽ अपन समाजक सहित परम सुशोभित भेलाह । शिशु रुपमे श्रीसियाजीक कोरामे लऽ दम्पति जखन अपन अन्तःपुरमे प्रवेश कएलन्हि स्वयंकेँ अतिशय कृत–कृत्य बुझलन्हि ।
परम प्रेम मय पुलक शरीरा । दम्पति मगन सनेहा सुनीरा ।।
आदि शक्ति जग जननि कहाई । सोइ बनी नृप पुत्रि सुहाई ।।
जे आदि शक्ति जगज्जननी कहाइत छथि उएह सर्वेश्वरी श्रीसीताजी आइ श्री मिथिलेशजी महाराजक परम मञ्जुल पुत्री बनल छथि । जाहि कारणेँ आनन्दमग्न दम्पतिक शरीर प्रेमातिशयतासँ पुलकित भऽ रहल अछि, नेत्र स्नेहाधिक्यसँ सुन्दर अश्रुपूरित भऽ रहल अछि ।
रामायणपर अनुसन्धान कएने मैथिली साहित्यकार रमण कहैत छथि, ‘जनक दर्शनक फल सीताजी पुत्रीक रुपमे जनकजीकेँ भेटलन्हि ।’
सीतामाता शक्तिकेँ बतावएक ककरो आवश्यकता नहि अछि । सीता स्वयंवरक समय शिव धनुषकँे केहन–केहन शक्तिशालीसभ नहि उठा सकल छल ओकरा ओ बामा हाथसँ उठालैत छलीह । कहल जाइत अछि पिता जनकजीक पूजाक औरियानि ओ स्वयं करैत छलीह । जखन पूजा घर निपए जाइत छलीह बामहाथसँ शिवक धनुष उठबैत छलीह आ दहिना हाथसँ नीचा निप लैत छलीह । इएह देखिकऽ शिव धनुष उठावएवला व्यक्तिसँग मात्र पुत्री सीताक विवाह करब जनकजी प्रण लेने रहथि । संस्कृतिविद् एवं मैथिली साहित्यकार चन्द्रमोहन झा ‘पड़वा’ जानकी स्तोत्रमे लिखैत छथि–
‘धरतीसँ अवतरित भेलहुँ, मिथिला गौरव लेल ।
समय जखन जेहने देखल, रुपो तेहने भेल ।।
शिवक देल धनुषकें, उठा सकल नहि वीर ।
वमे हाथे उठा लेलहुँ, भेला जनक अधीर ।।
दशरथ सुत श्रीरामजी, बुझलन्हि अपनेके गुण ।
आबि मिथिला तोडि़ धनुष, शक्ति बढ़ौलन्हि दून ।।’
एकटा दोसर प्रसंगमे रावण जखन हुनका छलसँ हरण कएलक तऽ सीताजी अपन निडरता आ वीरताक परिचय दैत कहलन्हि, ‘मूर्ख बाघिनक बच्चाकेँ बिलाडि़ बुझएक गल्ती नहि कर, अपन प्राणक रक्षा कर, भागि जो नहि तऽ प्रभु अबैत हएता ! हुनक वाणसँ तो नहि बैचि पाएबए ।’
जनक सुता जग जननि जानकी
अतिशय प्रिय करुना निधान की
ताके जुग पद कमल मनावउं
जासु कृपा निरमल मति पावउं..
सीता, जानकी, वैदेही, भूमिसुता आदि कतेको नामसँ हुनका जानल जाइत अछि । हुनक दूटा पुत्र छल – लव आ कुश ।
वेदवतीक प्रसंग
माता सीतासँ वेदवतीक प्रसंग सेहो चर्चित अछि । एक समयमे वेदवती तपस्यामे लीन छलीह । वेदवतीक विषयमे कहल जाइत अछि ओ भगवान विष्णुकेँ अपन पतिक रुपमे मानैत छलीह । ओ देखएमे अत्यन्त सुन्दर छलीह । जाहिठाम ओ तपस्या कऽ रहल छलीह, ओही बाटसँ होइत लंका नरेश रावण जा रहल छलथि । रावण वेदवतीकेँ देखि कामोत्तेजित भऽ गेला । तएँ ओ वेदवतीसँग दुव्र्यवहार करबाक प्रयास कएलथि । जाहि कारण वेदवती हवणकुण्डमे कुदि आत्महत्या कऽ लेलीह । मुदा आत्महत्या करएसँ पूर्व ओ रावणकेँ श्राप देलीह, ‘हमही अहाँक मृत्युक कारण बनब ।’
सीता सम्बन्धमे आओर किछु

उपनिषद्मे वर्णित अछि जे सीता उपनिषद् अर्थववेदक एक भाग छथि । एहिद्वारे हुनका अर्थववेदीय उपनिषद् सेहो कहल जाइत अछि । एहि उपनिषद्क अनुसार देवगण तथा प्रजापतिक मध्य भेल प्रश्नोत्तरमे ‘सीता’ केँ शाश्वत शक्तिक आधार मानल गेल अछि । एहिमे सीताक प्रकृतिक स्वरूप बताओल गेल अछि । हुनका प्रकृतिमे परिलक्षित होइत देखल गेल अछि ।
सीताजीकेँ प्रकृतिक स्वरुप कहल गेल अछि । एतए ‘सीता’ शब्दक अर्थ अक्षरब्रह्मक शक्तिकेँ रुपमे भेल अछि । ई नाम साक्षात ‘योगमाया’ क अछि ।
सीता एकटा नदीक नाम सेहो अछि । भागवतक अनुसार ओ भद्राश्व वर्षक गंगा छथि ।
सीता तु ब्रह्मसदनात् केशवाचलादि गिरशिखरेभ्योऽधोऽधःप्रस्त्रवन्ती गन्धमादनमूर्द्धसु पतित्वाऽन्तरेण भद्राश्वं वर्ष प्राच्यां दिशि क्षारसमुद्रं अभिप्रविशति ।
‘शब्दमाला’ मे सीताक सम्बन्धमे निम्नांकित कथन रहल अछि  –

गंगायान्तु भद्रसोमा महाभद्राथ पाटला ।
तस्याः स्रोतसि सीता च वड्क्षुर्भद्रा च कीर्तिता ।।
तद्भेदेऽलकनन्दापि शारिणी त्वल्पनिम्नगा ।।

श्रीसीताजीक आदर्शसँ प्रभावित भैया लक्ष्मण कहैत छथि  –

‘नारी के जिस भव्य भाव का, स्वाभिमान भाषी हूँ मैं ।
उसे नरों में भी पाने का, उत्सुक अभिलाषी हूँ मैं ।।’

रामकाव्य परम्पराक अन्तर्गत ‘श्रीसीता’ संसारक नारी भावनाक चरमोत्कृष्ट निदर्शन छथि, जतए नाना पुराण निगमागममे व्यक्त नारी आदर्श सप्राण एवं जीवन्त भऽ उठैत अछि । नारी पात्रमे ‘श्रीसीता’ सर्वाधिक, विनयशीला, लज्जाशीला, संयमशीला, सहिष्णु आ पतिव्रतक दीप्तिसँ देदीप्यमान नारी छथि । पूरे रामकाव्य ओे तप, त्याग एवं बलिदानक मंगल कुमकुमसँ जगमगा उठल अछि । लंकामे माता सीताकेँ पहिचानलाक बाद हुनक व्यक्तित्वक प्रशंसा करैत हनुमान जी कहलन्हि, ‘दुष्करं कृतवान् रामो हीनो यदनया प्रभुः धारयत्यात्मनो देहं न शोकेनावसीदति ।
यदि नामः समुद्रान्तां मेदिनीं परिवर्तयेत् अस्थाः कृते जगच्चापि युक्त मित्येव मे मतिः।।’
अर्थात् एहन सीताक बीना जीबित रहिकऽ राम सहीमे बहुत दुष्कर कार्य कएने छथि । हुनका लेल यदि समुद्र पर्यन्त पृथ्वीकेँ पलटि देल जाए तऽ सेहो हमर समझमे उचित हएत, त्रैलौक्यक राज्य सीताजीक एक कलाक बराबर सेहो नहि अछि ।
पत्नी व पति भारतीय उपमहाद्वीपक संस्कृतिमे एकदोसरक पूरक अछि । आदर्श पत्नीक चरित्र हमरासभकेँ जगदम्बा जानकीक चरित्रमे तहिआधरि दृष्टि गोचर होइत अछि, जखन श्रीराम द्वारा वनमे सँगमे नहि चलएकेँ प्रेरणा कएलाक बाद अपन अन्तिम निर्णय एहि शब्दमे कहि दैत छथि  –

प्राणनाथ तुम्ह बिनु जग माहीं । मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं ।
जिय बिन देह नदी बिनु बारी । तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी ।।

विषादग्रस्त भेलाक बादो पत्नी अथवा पतिकेँ अपन जीवन साथीक ध्यान राखब संस्कृतिक आदर्श रहल अछि । सीताकेँ अशोकवाटिकामे राखिकऽ रावण साम, दाम, दण्ड, भेद आदि उपायसँ पथ–विचलित करबाक प्रयास कएलन्हि, मुदा सीताजी अपन पारिवारिक आदर्शक परिचय दैत मात्र श्रीरामक ध्यान कएलन्हि । यथा–

तृन धरि ओट कहति वैदेही, सुमिरि अवधपति परम सनेही ।
सुनु दस मुख खद्योत प्रकासा, कबहुँ कि नलिनी करइ विकासा।।

वनगमनक अवसर पर सीताजी जखन उर्मिलाक प्रति सम्वेदना प्रकट करैत छथि, ओहि समय माता सुमित्राक मार्मिक उद्गारमे सीताजीक चरित्रक झाँकी भेटैत अछि –

पति–परायणा, पतित भावना,भक्ति भावना मृदु तुम हो,
स्नेहमयी, वात्सल्यमयी, श्रीराम–कामना मृदु तुम हो ।।

सीताजी एकटा आदर्श पत्नी छथि, जिनकामे पति–परायणता, त्याग, सेवा, शील आ सौजन्य छन्हि, तऽ दोसर दिस ओ युग–जीवनक मर्यादाक अनुरूप श्रमसाध्य जीवन–यापनमे गौरवक अनुभव करएवाली नारी छथि, यथा–

औरों के हाथों यहाँ नहीं चलती हूँ । अपने पैरों पर खड़ी आप चलती हूँ ।।

लोकापवादक कारण सीताजी निर्वासित होइत छथि, मुदा ओ अपन उदार हृदय वा सहिष्णु चरित्रक परित्याग नहि करैत छथि आ नहि पतिक दोष दैत छथि, अपितु एकरा लोकोत्तर त्याग कहिकऽ शिरोधार्य करैत छथि ओ अपन श्रेष्ठता सिद्ध करैत छथि  –

यदि कलंकिता हुई कीर्ति तो मुँह कैसे दिखलाऊँगी ।
जीवनधर पर उत्सर्गित हो जीवन धन्य बनाऊँगी ।
है लोकोत्तर त्याग अपना लोकाराधन है न्यारा ।
कैसे संभव है कि वह न हो शिरोधार्य्य मेरे द्वारा ।।

सती शिरोमणि सीताजीक गुणक जे कथा अछि, उएह एहि जलक निर्मल आ अनुपम गुण अछि ।
सती सिरोमनि सिय गुनगाथा । सोइ गुन अमल अनुपम पाथा ।।

तुलसी सीताकेँ बहुत बड़का महिमा दैत छथि । ओ कहैत छथि, ‘रामकथाक जे गंगा बहैति अछि ओकर निर्मलता सीताक अनुपम गुणक कारण अछि । सीता सतिसभमे शिरोमणि छथि ।’ नदी कतबो पवित्र किए नहि हुए, यदि ओहिमे निर्मलता नहि हएत तऽ ओकर नजदिक बहुत कम लोक पहुँचत । जे जयबो करता, ओ गन्दापन देखि नहेता नहि, आ जे नहेता ओ निर्मल नहि भऽ पएता । पानिए जेहन गुण चरित्रमे सेहो होइत अछि । ओ निर्मल अछि तऽ ओ दोसरोकेँ निर्मल करैत अछि ।
सीताक चरित्र बहुत निर्मल अछि । महिलामे सतीकँे भाव आएब श्रेष्ठ चरित्रक द्योतक अछि । जखन मन, कर्म आ वचनसँ कोनो महिला एक भऽ कऽ पतिक सेवा करैत छथि तऽ ओहिमेसँ सतीत्वक तेज उत्पन्न होइत अछि । सीता ऐहने चरित्रक तेजसँ सदा प्रकाशित रहैत छथि । चरित्रक प्रकाश सभसँ प्रखर इजोत दैत अछि । एकरा पाबि जीवनक सभ अन्हार, सभ कलुष मेटा वा धोआ जाइत अछि । बढि़या चरित्र स्वयंकेँ निर्मल नहि करैत अछि, ओ ऐहन सभ लोकक निर्मल बनवैत अछि जे ओकर सम्पर्कमे अबैत अछि । ओ एक प्रकारक पारसमणि होइत अछि ।
रामकथाकँे सीता अपन चरित्रसँ निर्मल बनवैत छथि । एहिद्वारे युग–युगसँ रामक पावन कथा हमरसभक हृदय निर्मल करैत अछि, मानवताक कलुणकँे धोबि रहल छथि ।
धैर्य, संयम आ विवेकक प्रतिमूर्ति सीताजीक आदर्श कथा संसारभरि प्रसिद्ध रहल अछि । पुराणक सन्दर्भके देखलाकबाद सहजे कहल जा सकैत अछि –हुनका बराबरक आदर्श नारी संसारमे दोसर नहि देखल गेल अछि ।
एहिप्रकारे समस्त ग्रन्थमे सीताजीक चरित्रक उज्जवलतम पक्ष प्रस्तुत अछि । ओ श्रीरामकथाक केन्द्रमे रहिकऽ केन्द्रीय पात्र बनल छथि ।

पुनि पुनि होत विवाह पुस्तकसँ