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मैथिली बालकथा – कौवा उडि़ए रहल अछि





सुजीत कुमार झा ।
जन्मक समय ओकर राशिक नाम ‘ब’ सँ निकलल छल, तएँ ओकर नाम बजरंग राखल गेल । नामे अनुरुप भगवान हनुमान जकाँ मस्तिष्कक बहुत तेज छल अखने नहि कहल जा सकैत अछि, तखन स्मरण शक्ति अद्भुत, खिस्सा पिहानी सुनएके सौखिन छल ।
कतबो सुनाउ, एकटा खिस्सा समाप्त भेल नहि कि दोसर खिस्साक जिज्ञासा झट्टसँ कऽ दैत छल । दाइ परेशान, बाबा परेशान । दाइक पाछाँ हरेक समय लागल रहैत अछि । रातिमे सुतएसँ पहिने शुरु भऽ जाइत अछि, खिस्सा पिहानी । दाइ एकटा खिस्सा सुनबैत छथि कि एकटा आओर सुनाबए लेल कहिते रहि जाइत अछि बजरंग । दाइ परेशान भऽ कहैत छलीह, ‘आओर कतेक सुनबे ?’
तखन बजरंगक जवाब अबैत छल, ‘बस्स दाइ, दशेटा खिस्सा सुना दे ओहिके बाद सुति रहब ।’ कहुना कऽ दाई दशटा खिस्सा पहुँचाबैत छलीह, तखनो बजरंग कहैत छल, ‘दाइ एकटा आओर…।’
आब दाइ कि करतीह ? पोताक आगाँ विवश छलीह ओ । पिताइयो कऽ समस्या समाधान होवएवला नहि छल । कहिओकाल रुसियो जाइत छलीह मुदा बजरंग कहुना कऽ खिस्सा कहवाक लेल मनाइए लैत छल ।
६५ बर्ष पार कऽ चुकल दाइकेँ स्मृतिक खजाना खाली भऽ गेल छल । बच्चामे जतेक खिस्सा सुनने आ पढ़ने छलीह सभ सुना चुकल छलीह । आब नव खिस्सा दाइ कहाँसँ लौतीह, तखन दाइ आँशु कथाकार बनि जाइत छलीह । जेना, एकटा पहाड़ छल, ओकरा बहुत जोर भूख लागल छल, घरमे खाए लेल किछु नहि छल तखन ओ नदीसँ कहलक नदी बहिन, नदी बहिन, कनी आँटा पैँच दिअ न । नदी आँटा पैँच दैत अछि, मुदा एकटा शर्त रखैत अछि ओकर भोजन सेहो पकाबए पड़त । पहाड़ भाइ भोजन तऽ बनबैत अछि मुदा बहुत कठिनसँ ।
अहिना कऽ खिस्सा पूरा भऽ जाइत छल । बजरंग फेर कहैत छल, ‘एकटा आओर….।’
दाइ फेर मशिनजकाँ शुरु भऽ जाइत छलीह । आखिर दाइ आशु कथाकार जे छलीह । ‘एकटा उल्लू छल, एक दिन ओकर बोली बन्द भऽ गेल । ओ डाक्टर लगमे जाँच कराबए गेल….डाक्टर कहलक तोहर गलामे फेरनजाइटिस भऽ गेल छौ….दबाइ खेलाक बादो जखन ओकरा लाभ नहि भेटल तऽ फेर डाक्टर लगमे पहुँचल…. डाक्टर बाजल, आब तोरा लेरनजाइटिस भऽ गेल छौ….’
बजरंग गम्भिरतापूर्वक सूनि रहल छल । दाइ एम्हर ओम्हर तकैत फेर खिस्साकँे आगाँ बढबैत छथि, ‘….उल्लू फेरसँ दबाइ खाइत अछि मुदा अहुँबेर ओकरा कोनो लाभ नहि भेटैत अछि तऽ ओ फेर डाक्टर लगमे पहुँचैत अछि आ हुनका खूब डँटैत अछि…..। डाक्टर कहैत छथि, सरी जखन ई सभ दबाइक असर नहि भेल तऽ अवश्य टांसलाईटिस भेल हएत । अहिना करैत–करैत खिस्सा समाप्त हएत कि दाइ सुति रहैत छथि ।
बजरंगकेँ मजबूरीमे सुतए पडैÞत अछि । आखिर खिस्सा कहैत दाइ थाकि जाइत छथि । एक दिन बजरंगके सलाह दैत छथि, ‘आब बाबासँ खिस्सा सून….’
एहिपर आश्चर्यसँ तकैत बजरंग कहैत अछि, ‘बबोके खिस्सा अबैत छन्हि ?’
दाइ बजरंगक जिज्ञासा शान्त करैत बजलीह, ‘हुनका एक दू नहि, हजारोमे खिस्सा अबैत छन्हि ।’
आब बाबाकेँ डयूटी शुरु भऽ जाइत अछि खिस्सा सुनाबएके । बाबा तऽ सत्तरके पार भऽ चुकल छथि मुदा हुनकर मस्तिष्क कोनो गोदाम घरसँ कम नहि अछि । एक बेरमे दशटा बारहटा खिस्साधरि सुना दैत छथि मुदा ओहिकेँ बाद बाबा सुतए लगैत छथि मुदा बजरंगके सन्तुष्ट करएके हुनको सामथ्र्य नहि रहैत अछि, ‘एकटा आओर बाबा बस्स….फेर नहि कहब,’ एहि बातक रट्ट लगबैत रहैत अछि ।
परेशान होइत बाबा बजैत छथि, ‘पोता सुनू एकटा कौवा छल, ओकरा प्यास लागल, पानिक खोजीमे ओ आकाशमे निकलि पड़ल, पानि भेटत आ अपन प्यास मेटाओत । कौवा उड़ैत रहल….।’
‘आगाँ कि भेल बाबा ?’ बजरंग पूछलक ।
‘कौवा उड़ैत रहल, अखन पानि ओकरा नहि भेटल अछि….।’
‘मुदा कखनधरि उड़ैत रहत ?’
‘जाधरि पानि नहि भेटत….।’
‘मुदा कखन पानि भेटत बाबा ?’
‘देखू कखन पानि भेटैत अछि, एहि बर्ष कमे पानि भेल अछि, धरतीपर पानि कमे अछि, तएँ कौवाकेँ नहि भेटि रहल अछि….।’
कनी निराश होइत बजरंग कहैत अछि, ‘बाबा तखन हम सुतैत छी, जखन पानि भेटि जाए तऽ हमरा कहि देब….।’
‘ठीक छैक ।’
दोसर दिन बजरंग उठिते पूछैत अछि, ‘बाबा कौवाके पानि भेटल ?’
‘नहि मिललै पोता, अखनधरि पानिएके खोजीमे अछि ।’
‘हे भगवान ..’
‘रातिमे जे खिस्सा कहैत छलहुँ ओहिमेका कौवाके कि भेल ?’ बजरंग दोसर दिन फेर पुछैत अछि ।
‘अखनधरि उडि़ रहल अछि ।’
आब बजरंग खिस्सा नहि सुनैत अछि मुदा ई अवश्य पुछैत अछि, ‘कौवाकेँ कि भेल बाबा ।’
‘अखन उडि़ रहल अछि,’ बाबाकेँ इएह जवाब रहैत छल ।
आइ काल्हि बजरंग अपन माएबाबूसंग दोसर शहरमे रहैत अछि । कहिओ काल बाबाकेँ फोन करैत रहैत अछि कुशल छेम पुछलाक बाद कौवा उड़एबला प्रसंग चलिए अबैत अछि ।
आब बजरंग बड़का भऽ गेल अछि । कौवाबला प्रसंग अबिते बाबा पोताके फोनमे जोड़सँ ठहक्का उठैत अछि ।