

♦ ई. विनोद चन्द्र
नवयुवक दीपनारायण नोकरी करैत पढबाकलेल जनकपुरमे आयल छलाह मुदा ओ जकरा भरोसे आयल छलाह ओ एतऽ अखन नहि रहैत छलखिन ।संयोगे कही ओ नवयुवक दीप नारायण, जनकपुरक नामी वैद्य सुदर्शन झाक घरक आगु किंकर्तव्यविमुढ भेल ठाढ छलाहाछोटे गप्पमे दुनू एक दोसरके घनिष्ट भऽ गेलाह ।वैद्यजीके एकटा सहयोगीक आवश्यकता छलनि तऽ मध्यमा उतिर्ण दीप नारायणके कमाइत शिक्षा प्राप्त करबाक लालसा ।दीप नारायण वैद्यजीके बेमारीके जाँच करऽमे आ आयुर्वेदिक दवाइके निर्माणमे सहयोग करऽ लगलखिन संगहि अपनो संस्कृत महाविद्यालयमे आयुर्वेद बिषयमे नामाँकन करा लेलनि। वैद्यजीक छोट छोट दूटा पुत्र आ तीनटा पुत्रीसभ दीप नारायणके भैया कहऽ लगलनि,एहो सभपर जेठक प्रेम देबए लगलखिन । निश्वार्थ रुपे ओ ओहि घरमे वैद्यजी दुनू पति–पत्नीके माता–पिताक सम्मान आ बच्चासभके लेल जेठ भैयाक दुलार देबएमे कोनो कसर बाँकी नहि रखलनि ।वैद्यजीके बच्चासभके शिक्षा–दिक्षा देबऽमे ओ सहयोगीक भुमिका खेलए लगलाह।जेठ पुत्र ईन्जिनियरिंगके पढाइमे जे जतेक खर्च मँगैत छलखिन,कोनो किसिमसँ व्यवस्थाकऽ पठा दैत छलखिन ।वैद्यजी कैंसरसँ बेसी बेमारे रहैत छलखिन आ दीप नारायण, वैद्यजीके दबाइ बिरो करबैत, जेठपुत्रके ईन्जिनियरिंगक खर्च सेहो कहुनाक व्यवस्था करैत रहलखिन ।
जेठ आब ईन्जिनियर भऽ गेल छलाह,नीक तनखाह छलनि । वैद्यजी वैकुण्ठवास चलिगेल छल्खिन ।
एकदिन ईन्जिनियर भाई मालिकाना हकके साथ,दीपनारायणके आगुमे ठाढ छलनि ।कहैत,
‘आयुर्वेदिक दोकानसँ आम्दनी कतेक अछि ? आ खर्च कतेक अछि ? ’
‘कहुना गुजर चलैत अछि ।’
‘खेतक आम्दनी,आ घरक भाडा ?’
‘ओहिसँ आओर काजसभ कहुना झँपैत छी ।’
‘आयुर्वेदिक दोकान,जाहिसँ कोनो फैदा नहि अछि, ओकरा बन्द करु,हम कोठा भाडा लगायब । हँ, आब अहाँ अपन व्यवस्था करु,हम अपन कारोवार स्वयं सम्हारि सकैत छी ।’
वृद्धावस्थाक दीपनारायण जनकपुरधामक रोडपर जानकीजीसँ मोनेमोन कहलखिन,
‘हे जगतजननी, की उपकारक फल यएह होइत छै ।’ कहैत, मातातुल्य वैद्यजीक पत्नीके अन्तिम प्रणाम करऽ हुनक कोठरी दिस बढलाह ।मोन बहुत दुखी छलनि।
जखन माताजीके प्रणाम कऽ निकलऽ लगलखिन,‘ई दिन, एकदिन अओतै, से बुझि वैद्यजी अहाँकेलेल एकटा घर कीनि देने छथि,जाउ अपन घरमे, कहैत चाभी दीपनारायणक हाथमे धऽदेलखिन ।
दीपनारायण विष्मित आँखिसँ ठकमुर्गी लागल चाभी दिस तकिते रहि गेलखिन,आँखिसँ टप टप नोर चुबए लगलनि ।
