

♦ प्रा. डा. सुरेन्द्र लाभ
आँखिमे ढ़बढ़बाएल नोर टघैर गेलैक ………….. ।
दहिन आँखिक टघरैत नोर बाम आँखिक टघरैत नोर सँ पुछलकै – ‘गे बहिन अपना सभक नियति इएह छैक ?’
‘ हँ बहिन बिस्थापन हएब अपना सभक नियति थिक । ’ बाम आँखिक टघरैत नोर जबाब देलकै ।
‘मुदा किया बेर बेर हमरा सभकेँ बिस्थापित होबए पडैत अछि ?’ दहिन आँखिक टघरैत नोर भावावेशमे कहने जा ’ रहल छल – ‘मुनक्ख मिर्चाई खाइत अछि – विस्थापन हमरा सबकेँ होबए पडैत अछि । मुनक्खकेँ आँखिमे धुँवा लगैत छैक – विस्थापन हमसव होइत छी । मनुक्ख प्रसन्न होइत अछि – विस्थापनक दर्द हमरासबकेँ सहए पडैत अछि । मनुक्ख दुखी होइत अछि –खुशी खुशी विस्थापन हमसब होइत छी ।’
‘ वाह ! ताली …. ।’ बाम आँखिक टघरैत नोर चिचिया उठलै, “ बहिन तोँतऽ नेता जकाँ भाषण झाड़ ’ लगलेँ ?
‘ नेताक आँखिमे रहैत रहैत कनेक मनेक भाषण तऽ सिखीए गेल छी’ – दहिन कातबाली जवाव देलकै ।
– ‘ ई नेताक आँखिमे हमरा सभक जन्म कियाक भेल बहिन ?’ बाम कातबाली पुनः पुछलकै ।
‘ ठिक कहैत छे बहिन । ई नौटंकीबाज नेता अपनेसबकेँ मात्र नहि, अपना सभक पुस्तदर पुस्तकेँ विस्थापन करैत आएल अछि । ’
– ‘ गे इ नेतासब एतेक माहिर छैक जे बस्तीमे आगि लगबा दै छै आ बस्ती सुडाह भेलाक बाद दमकल ल’क’ पहुँचैत छैक, छाती पिटैत आ’ हमरा सभक परिवार अनाहक मे विस्थापित भ’ जाइए ।’
– ‘आ’ ओहिबेर देखलही नै बहिन जे ई नेता तेरह हजार मनुक्खके मरबाकऽ कुर्सी पर कोना दाँत निपोडि़क’ बैसि रहलै आ ‘ जखन तेरह हजार परिवारक लोक बेराबेरी भेट कएलैक तऽ कोना तेरह हजार बेर नकली कननाई कानिकऽ अपना सभक सम्पूर्ण परिवारकेँ आँखिसँ बाहर कऽ देने छल । ’ दहिन कातवाली व्यथित होइत व्यथा सुनौलकै ।
– ‘गे बहिन तहिए सँ हमसब टुगर भऽ गेलहुँ । ’ बाम कातवाली टघरैत नोर सुबकए लागल । दोसरो बहिन साथ देबए लगलै ।
किछु क्षण पश्चात् दुनू एक्कहिबेर चिचिया उठल – ‘पापी नहितन ।’ आ’ विलमि गेल क्षणांश हेतु । .. किछु निर्णय लेलक । दहिन कातवाली टघरैत नोर कहलकै, ‘बहिन तोरा बुझल छौक, नेताक आँखिक अन्तिम बुन्द छलहुँ हमसब – चल आब कहियो ने घुरब ।’
– ‘हँ चल‘ बाम कातवाली स्वीकृतिमे मुड़ी डोलएलकै । दुनु हाथमे हाथ जोड़लक आ छलाङ्ग लगा देलक बालूक ढ़ेरीपर आ‘ विलीन भऽ गेल सदासर्वदा हेतु ।
… आ’ तहिएसँ नेताक आँखिमे पानि नहि छैक ।
