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मैथिली कविता – फेकुआ उरल कतार





 पुनम झा ‘मैथिली’

एहि देशबाके इहे बेहबार
फेकुआ सेहाे उरल कतार ।

नइ अछि खेती पाती अेाकरा
नई छै काेनाे बिरता
बुढ माय एकटा कनियां संग
तीन गाेट धिया पूता ।

घर घरारी बन्हकी ध’ क’
लेलक कर्जा विशेष
किछु ढउआके घरे रखलक
चलि देलक विदेश ।

धूरखुर धएने माय कनै छै
बाैआ अएब’ कहिया फिरता
पुतहु कहादैन बड्ड नंगटिनी
बना लेलकै नगरिकता ।

ढउआ एतै अपने रखबै
डांर खाेसबै पेटीचाभी के
बुढिया नाम प ढउआ अतै
द’ देतै सब बेटी के ।

एक मास बितल दाेसर मास आ
बितलै तेसर मास
ठगी काजमे फेकुआ परलै
भेलै खुब निराश ।

बिना सीपके उराैने छलै
एजेन्ट अेाकर बिशेसर
लाख टका बेसीए क’ ठगिक’
बैसल छै कपलेश्वर ।

बाबू भैया माइनजन के बुढिया
बैसाैलक ,बघाराके बैसारीमे
बिना श्रम स्वीकृतिके फेकना
गेल छलै राेजगारीमे ।

भरि सालके बाद फिनीस भ’
घुरल अपन देश
माय मरल टकध्यान लगाैने
कर्जा बढल विशेष ।

घर घरारी बेचि क’ फेकना
सधाैलक कर्जा पैसा
सुरक्षित अप्रवासन सुचनामे जायक’
व्यथाके कयलक चर्चा ।

तालिम ल’ क’ बिमा कय क’
स्वास्थ्य परिक्षण आअेार करार
एहि बेरिया निश्चिन्त भ’ क’
फेकुआ उरल कतार ।