

♦ कर्ण संजय
सॉझ झलफला रहल छैक । डीहवारस्थान मे संझादीप जराब’ गेल स्त्रीगणसब सेहो लौट रहल छथि । मन्दिरपर जोर जोर सँ घडी–घण्टके तेज ध्वनि ठाकुरजी के भोग लगेबाक संकेत द’ रहल छैक । अहि घटनासभ सँ निसफिक्र भए कुरहरियावाली आरि–धुरि फानैत दुलकी देने गिरहतक घर दिश विदा भेल अछि । माथ पर मूजक अढाइ सेरी छिट्टा ताहुँमे दुटा भूर छैक जेकरा पुरान नुऑ के पाढि ल’क’ गथने अछि । वएह भूरहा मूजक छिट्टा मे अपन बोनिक धान लाबि कुटैए आ गुजरि चलै छैक । ई क्रम ओकर सासु करियौतवाली सँ भेटल रहै । आब ओ बुढिया जन–मजूरी करबा मे असमर्थ भ’ गेल छै । दमा बेमारी सँ देह गलि गेल छैक ।
ई छिट्टा के ओकरा जीवनमे बड महत्व छैक । एहि छिट्टामे ओकर बाप गेन्हरिया सदा ललका वाएल मे बान्हि वियाहक खीर–पूडी शनेश सठने रहै । नव मे ओकर दैया छिट्टाके लाल, पीयर, हरियर रङ्ग मे बड जतनस‘ रङ्गने रहै । आइ गिरहतक घरक रस्ता मे कुरहरियावाली के वियाह स‘ एहि बयसके घटना छिट्टा के मादे खुजि गेल छै । एहिनामे, एक बेर नुआँ लटपटेलास‘ आरि पर स‘ जोतलाहा खेत मे ओघरा गेल रहै आ बबूरक कॉटमे फ‘सि कुरहरियावाली के नवे नुआँ जे पहिलुक वियानक दु–टा सुगरक पाउर बेचि कए किनने रहै से भरि बीत फाटि गेलै । नवके नुऑ के फाटल देखि ओकरा कना गेल रहै ।
“हे गै कुरहरियावाली, बहि एना धरफराएल कतए गेल रहए” रौदिया टोकारी मारलक ।
“कतए जाएब तोरे बालबच्चाके खातिर चान–टिकीवाला गिरहत ओतय गेल रही ।
मर घरक फटकी नहि लगोने रहै जे सभटा मरसटका आ घोंघी कुत्ता चाटि गेलै । उपरस सींकपर राखल आधा सेर दूध सेहो बिलाई पीब गेलै । फेकनी, लटकनमा,गेनमा आ बुढिया सब भुखे डाउ‘ डाउ‘ करै छैक आ ई चीलम पर चीलम धुकैत रहौ” ।
आइ आबौ घर… त ! कुरहरियावाली रौदिया दिश गुम्हैर कए ताकलक ।
“मर.. ओ बेदरा–बेदरी, हम बिसरि गेलिए त’ घरक फटको तक नै लगेलकै । आइ हम सा…सभके मारि फराठी स‘ गतर गतर तोडि देबै” । सुगर खिहारैते रौदिया धिया–पुताके गरियाबैत घामे–पसेनासँ भीजल पाछा पाछा दौड रहल छल । आइ सुगर स‘ बेसी ओकरा पाउरसब बेसी हरान केने छैक ।
“गिरहत हम कुरहरियावाली छीऐ, मालिक” ।
“आइ जो काल्हि आबिहे” । गिरहत गोहालीएस‘ हाक देलकै ।
“हे यौ पंडितजी, कोन मौगी भरल सॉझ मे गदह करैत अछि” ? गिरहतनी अन्सोहॉत जकाँ बजली ।
“बुझाइए डोमिन छै” ।
“भरल सॉझ–बातिक बेरमे कहु‘ ऑगनमे डोमिन आबए । जाओ बेलाओ । कहियौ दिन–देखार हेतै त’ अओतै” । गिरहतनी लाल पीयर होइत मूँह चूनसन बना गिरहत पर बजलीह ।
कहै छै स्त्रीके शत्रु स्त्री होइछै । से ठिके । रतियो भरि नै सोहाए पंडिताईन के ई कुरहरियावाली डोमिन । गोर चाकर–चौरठ मौगी, बाजै भुकैमे सेहो फरोस देखि बड ईष्र्या होइन पंडिताइन के ।
“कुरहरियावाली आइ जो काल्हि आबिहए” गिरहत नै चाहियो कए गिरहतनीक मोन राखैत डपटि क’ चिकरलथि ।
“गिरहत यौ गिरहत धिया–पुता भुखले छै । सब मरसटका आ घोंघी बजरखसुआ कुत्ता…” कुरहरियावाली अपन दुःखनामा सुनेलक ।
“कुत्ता चाटि गेलौ त’ हमरे सबके दोष । पोसने छै तों त’ ..” । गिरहतनी अगराइत बजलीह ।
“से त’ ठिके कहै छी गिरहतनी । पोषनाहरे के खएतै त’ कि छलै ? जाए दिऔ गिरहतनी , अडाइ सेर धान दिअ, मनखपक बोनि मे स‘ काटि लेब । बेर भेल जाए छै” । कुरहरियावाली गिरहतनी के म“ूह ताकलक ।
“सॉझ भरली किओ बखारी खोलैऐ ? के जोखत, के तौलत ? आ ह‘ भरल सॉझ मे बखारी खोलला स‘ लक्ष्मी भागि जाए छै से बडका पंडिताईन हमर सासु कहि गेल छथि । से अखन किनहुँ नै देबौ धान । यौ पंडितजी अ“ही स“ हएत, जाओ कुरहरियावाली के अरियाति आओ आधा रस्ता”। गिरहतनी गिरहत के आ“खि मारि सभटा समझा देलनि ।
गिरहतनीके जाहि दिन गिरहत पर बेसी प्रेम छलकनि त’ ओ पंडितजी कहथिन । अजुका सम्बोधन के विशेष अर्थ छलनि । पंडितजी किछु अगरजानी सेहो जानैथ । ओ कुरहरियावाली के संगे विदा भेलाह ।
“कुरहरियावाली धान–चाउर के मोह छोड । तोरा हम फेकु साहुके दोकानस“ दु सेर चाउर आ किछु मर–मसला बेसाहि देबौ । बाज बोनिमे कटबही कि ! जो एहि बेर हमरा तरफस“..” । गिरहत अगराति बाजलाह ।
“धान नहिऐ–टा देबै नै । चलु जाएह देबै सएह” । निरास होइत कुरहरियालाली बाजल ।
फेकु साहु के दोकान स‘ दु–सेर चाउर दु–आना के नून, चारि आनाके हरैद आ एक शीशी करुतेल लऽ कुरहरियावाली विदा भेल त’ गिरहत सेहो पछोडि धए लेलकै । दुलकी मारैत पराइत कुरहरियावाली के मोकना पाकरि गाछतर गिरहत अनचोके पाछास‘ गट्टा पकडलैथ त’ कुरहरियावाली धरफराए गेलीह । सौसे देह सिहरि गेलै । अवश्ये ओे फौतीया डोमरा हएत जे अनेरे काल्हि सुगर किन लेखे भोरे आबि, रौदिया जरे दारु पीबैत काल घुरि घुरि क’ ताकैत छल । ओकरा मु‘हस‘ गारिक धारा छुटि गेलै ।
“बजरखसुआ, टिकजरुआ, बेटी….” ।
“कुरहरियावाली हम छी” गिरहत फुसफुसा क’ बजला ।
“जाओ अहु ने गिरहत ! हम कहै छिऐ जे के बलु गट्टा फौतिया…। मुडी मचोरुआके आइ हम….” । कुरहरियावाली डपटलक ।
“खेलौर छोडु , हम ने जानै छलियै जे बलु आहा अतेक खेलकड छी । जाओ घर गिरहतनी भुखले हएत । बलधकेल जुनि करु” । भरि ठोंठ क’ कुरहरियावाली उठल ।
एतबेमे कुरहरियावालीके गट्टा छुटि गेलै । नुऑ जाइतकाल जतएसँ भरि बित फाटल रहै झिका–तानी मे गिरहतस‘ ओतही पकरा क’ एक हाथ आऔर फाटि गेलै । नुआँके सँगहि लाज सेहो फाटि गेलै । ओ मौगी ओतही बपराहरि काटए लागल मुदा फॉट चौरी–बाध आ झलफल अन्हरियामे लोक–वेद किओ कतए नहि रहै । रहबौ करै त’ आरिपर राहरिक मmाेंमिm सभ छाँह आ एकटा बुढबा पाकरिक गाछ । अहि भागा–दौडी मे कुरहरियावाली के ठेस लागि गेलै । ओ म‘हेभरे खसल आ गिरहत भरि पॉजमे समेट लेलनि । सबटा सीमा–रेखा टुटि गेलै । कुरहरियावाली के छॉह परला स‘ गिरहतनी गंगाजल छिटि, घर–ऑगन निपि लैत छलैथ से गिरहत आइ ओकर अस्थि–माउस तक चाटि गेलाह । ओ मौगी सॉपक मु‘हमे परल बेंग जकॉ छटपटाइत रहल मुदा सब ब्यर्थ छलै । कहबी छै मौगिक छल आ पुरुषक बल ।
“छोडबा कि नै छोडबा कि हम गदह करिऔ लोकसबके” ? कि तखने घाम–पसेनास‘ तर–तर भेल गिरहत धोती सम्हारति भागल । मारि दडबड कुरहरियावाली सेहो घर जाइते रौदियाके गरियाबए लागल ।
“फौतिबा, बजरखसुआ अपना नै जा होइए बोनि मॉगए । आबस‘ आगिए ढारि देबौ ज‘ फेरस‘ कहलाए जाए खातिर” । कुरहरियावाली चिकरि चिकरि गारिसँ बिछ लेलकै रौदियाके ।
“बहि, कथिलाए एना चिकरै छैक ? कत’ आ केकरा ओतए गेल रहय बोनि मॉगए ? तों त’ हमरे जरे सुतल छैक” । एक थापड रौदिया मारलक आ कहलकए सुत ! सपना दोसर दिन देखिहए ।
– विराटनगर
