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भाइबहिनक प्रेमक सूचक – भरदुतिया





⇔ सुजीतकुमार झा

भाइबहिनक पबित्र पावनिसभमे भरदुतियाक अग्रस्थान रहल अछि । भरदुतिया कातिक मासक शुक्ल पक्षक द्वितीया तिथि कऽ मनाओल जाइत अछि । भरदुतिया पावनि भाइबहिन बिचक प्रेमके आओर प्रगाढ बनबैत आएल जानकारसभ कहैत छथि । भाइ बहिनक प्रेमक सूचक अछि ई पावनि कहल जाए तऽ अतिशयोक्ति नहि हएत संस्कृतिविद डा. राजेन्द्र विमल कहैत छथि । भ्रातृ द्वितीया (भाइया दूज) हिन्दू धर्मक पावनि अछि जकरा यम द्वितीया सेहो कहल जाइत अछि । ई दीपावलीक दू दिनक बाद आबएवला ऐहन पावनि अछि, जे भाइक प्रति बहिनकेँ स्नेहकेँ अभिव्यक्त करैत अछि एवं बहिन अपन भाइक प्रशन्नताक लेल कामना करैत अछि ।
एहि पावनिमे बहिन भाइकेँ ललाटपर पिठार आ सिन्दुरक ठोप कऽ उज्वल भविष्यक कामना कएल करैत छथि । भरदुतियाक दिन बहिनसभ अपन भाइकेँ पैघ हुए वा छोट हुए पूजा कऽ नौत देल करैत छथि । बहिनसभ सिन्दुर, पिठार लगा कऽ कुम्हरक फूल, पानक पात, सुपारी आ जल भाइकेँ आँजुरमे धऽ गंगा नौतैत छथि – यमुना के, हम नौतैत छी (भाई के नाम ) भाइके, जहिना–जहिना गंगा–यमुनाक धार बहए, हमर भाइ सभक औरदा बढ़ए ई कहवी उच्चारण कऽ नौत देल करैत छथि । मैथिल परम्परामे ई विधि सम्पन्न करितए दीदीबहिन गंगा, यमुनाक जेहन वेग आ कीर्ति भैयाभाइकेँ हुए से गीतसँ भाव व्यक्त करैत अछि । इएहक्रममे सुखल केराउक दाना भाइकेँ चबावए लेल दैत अछि ।

‘बजरी’ खुआवएवला ई विधिसँ कतहुँ नहि कतहुँ केराउकेँ बज्रसंग तुलना कऽ ‘बजरी’ कहल गेल डा विमलक कथन अछि । बजरी खुआवएवला विधिक भाव माने भैयाभाइकेँ शरीर बज्रसमान कठोर हुए से कामना रहल ओ कहैत छथि । ‘बजरी खैया भैया बजर होइहा, दान नदिहा दरिद्र होइहा’ अर्थात बजरी खा कऽ अमर बनिहअ, दान नहि देलापर दरिद्र बनिहअ से कथन संग भैयाभाइकेँ आँगनमे पिढ़हीपर बैसा माला, फूल, चन्दन लगाकऽ बजरी खुवा भातृद्वितीया पावनि मनावएकेँ परम्परा एतए चैलिरहल संस्कृतिविद् एवं मैथिली साहित्यकार चनद्रमोहन झा ‘पड़वा’ कहैत छथि ।
एहि अवसरपर भाइ अपन बहिनकेँ यथाशक्ति उपहार दैत छथि आ हुनक अन्न खा कऽ बहिनके सन्तुष्टि प्रदान करैत छथि ।
मिथिला संस्कृतिमे भाइ बहिनसँ जुड़ल तीनटा महत्वपूर्ण पावनि अछि जाहिमे रक्षाबन्धन, भातृद्वितीया आ सामाचकेबा अछि । ‘हम ई तीनू पावनिमे भाइकेँ सहभागिता चाहैत रहैत छी,’ शिक्षण पेशासँ जुड़ल प्रियम झा कहैत छथि । विवाह भेलाक बादो कतेको भाइ बहिनकेँ सासुरो पहुँच ई पावनिसभमे सहभागि होइत छथि ।
अरिपनकेँ विशेष महत्व
भरदुतिया पावनिक क्रममे पारल जाएबला अरिपन एहि पावनिकेँ आन–आन पावनिसँ विशेष आ अलग बनबैत अछि । ई अरिपन षटदल कमल रहैत अछि । पीढीक आगाँमे कमलक फूलबला अरिपनपर अढिया वा बाटी राखल रहैत अछि । तहिना लोटामे अच्छिञ्जल रहैत अछि । ओहिमे पान, सुपारी, कुम्हरकेँ फूल आदि राखल रहैत अछि । उएह अरिपनपर पारल पीढ़ीपर बैसा कऽ भाइकेँ नौतल जाइत अछि । दीयाबाती आ छठिक बिचमे परएबला ई पावनि हर्षकेँ आओर बढ़ा दैत अछि । दियावातीकेँ लऽ कऽ घर आँगनसभ निपले रहैत अछि । तथापि बहिनसभ अपन भाइकँे स्वागतक लेल घर आँगनके नीकजँका गोबरसँ निपल करैत छथि । पीढी पर पिठार आ सिन्दुरसँ अरिपन पारैत छथि ।
भरदुतियाक कथा
एहि पावनिकेँ लऽ कऽ एकटा कथा सेहो प्रचलित अछि । भगवान सूर्य नारायणक पत्नीक नाम छाया अछि । हुनक कोखिसँ यमराज तथा यमुनाक जन्म भेल छल । यमुना यमराजसँ बहुत बेसी स्नेह करैत छलीह । कहल जाइत छैक यमुना बेर–बेर अपन भाइ यमसँ निवेदन करैत छलीह जे अपन इष्ट मित्रक संग हुनक घर जा कऽ भोजन करथि । मुदा अपन कार्यमे व्यस्त यमराज एहि बातके टालैत रहैत छलाह । एहिक्रममे कातिक शुक्ल पक्षक द्वितियाक दिन आएल । यमुना ओहि दिन फेर अपन भाइ यमराजके भोजनके लेल निमन्त्रण दऽ कऽ हुनका अपन घर आबएकेँ लेल वचनबद्ध कऽ लेलथि ।
यमराज सोचलथि हम तऽ प्राणकेँ हरएबला छी । हमरा किओ अपना घर नहि बजाबए चाहैत अछि । बहिन जतेक स्नेहसँ बजा रहल अछि हमरा, ओकर स्नेहकेँ मान रखनाई हमर धर्म अछि । बहिनके घर जा रहल समयमे यमराज नर्कमे निवास करएबला जीवसभके मुक्त कऽ देलन्हि । यमराजके अपन घर आएल देखि यमुनाक प्रसन्नताक ठेकान नहि रहल । यमुना स्नान आ पूजा कऽ विभिन्न प्रकार व्यंजन परसि कऽ अपन भाइ यमके भोजन करौलथि । यमुनाद्वारा कएल गेल आतिथ्यसँ यमराज प्रसन्न भऽ अपन बहिनकँे वरदान माँगए लेल कहलन्हि ।
यमुना कहलीह जे भैया अहाँ प्रत्येक बर्ष इएह दिन आएल करु । हमरा जँका जे बहिन एहि दिन अपन भाइके आदर सत्कार कऽ टीका करत, ओकरा अहाँक भय नहि रहए । यमराज तथास्तु कहि यमुनाकेँ अमूल्य वस्त्राभूषण दऽ यमलोक चलि गेलाह । इएह दिनसँ ई पावनि मनेबाक परम्परा शुरु भऽ गेल । एहन मान्यता अछि जे अपन बहिनक आतिथ्य जे भाइ स्वीकार करैत अछि हुनका यमके भय नहि रहि जाइत अछि । तएँ भरदुतियाकँे दिन यमराज तथा यमुनाक पूजा सेहो कएल जाइत अछि ।
भरदुतियासँ सम्बन्धित दोसर कथा सेहो मिथिलाञ्चलमे चर्चित अछि । एहि कथामे कहल गेल अछि एकटा बृद्ध महिला छलीह । हुनका सातटा बेटा आ एकटा बेटी छल । हुनक बेटासभपर सर्पक कुदृष्टि पड़ल छल । जहिना ओकर बेटाक विवाहमे सातम फेरा होइत छल तऽ साँप डसि लैत छल । एहि प्रकार ओ बृद्ध महिलाक ६टा बेटाक मृत्यु भऽ गेल । ओ महिला अपन सातम बेटाक डरसँ विवाह नहि कएलथि । हुनक बेटाके असगर देखि बहिनके बहुत बेसी दुःख होइत छल । ओ अपन भाइके एहि दुःखसँ निवारणक लेल ज्योतिषी लगमे गेलीह । ज्योतीष कहलथि अहाँक भाइपर सर्पक कुदृष्टि अछि पड़ल । यदि अहाँ ओकर पूरे कष्ट अपना माथपर लैत छी तऽ अहाँक भाइके एहि सन्तापसँ मुक्ति भेट जाएत । बहिन अपन भाइके रक्षा करएके ठानि लेलथि । अपन भाइके कोनो काज करएसँ रोकैत छलीह । जाहिसँ सभकिओ हुनका निन्दा सेहो करए लागल ।
आब हुनक भाइके विवाहक दिन नजदिक आएल । भाइ जे वस्त्र लगौने छल ओ वस्त्र पहिरएके जिद्द करए लगलथि । सभकिओ हुनक जिद्दके सामने झुकि गेल । ओ कपडा पहिरए लेल हुनका देल गेल । ओहि कपडाक भीतर साँप छल । जाहिके ओ फेक देलीह । ओ साँपके टोकरीमे झापि देलीह । ई देखि नागिन आएल आ अपन पतिके छोडि़ देबाक लेल बहिनसँ अनुरोध कएलीह । तखन ओ कहलथि पहिने अपन पतिके कहु हमर भाइपरसँ कुदृष्टि हटाबए लेल तखन मात्रे अहाँक पतिके छोडब । नागिन एहिना कएलक । एहि प्रकार बहिन संसारक सामने खराब आचरणके साबित होइतो अपन भाइके प्राणक रक्षा कएलीह । एकरबादे भाइ बहिनक पूजा शुरु भेल ।