

प्रियंका झा ।
जिनगी सँ तंग आबि किछु मोन बहलाब हिसाबे हम पोखराक भ्रमणमे गेल रही।भ्रमणके क्रममे एकदिन फेवा तालमे नाउ पर घुमबाक लेल गेली । एक त हम अस्गरे । उपरसँ पहाडी महौल । मोन कोना–कोना दन करैत रहे।मुदा तैयो हम नाउपर बैसक यात्राके मज्जा उठबैत रही । नाउके दोसर कात एकगोट लडका बैसल रहे । हमरे जकाँ हाइट,पिरसियाम रंग चेहरा,उजरा शर्ट–पैन्ट आ मुह पर एकटा मोहनीसन मुस्की । ओ बेर–बेर हमरा दिस देखे । आ फेर आँखि झुका लिए । ओकर नजरि जेना हमरा पर अटकल रहे । हमहू बिच बिचमे फोनक साहार ल’क तरे आखि ओकरा दिस तकैत रही आ मुस्की दैत रही ।
किछुए क्षण वाद ओ अपन मुड़ी डोलबैत ओत आबि जाउ के इसारा व्यक्त केलनि । हम सरमाइत बस मुस्कीया देलियै । ओ त ठीके हमरे लग आबिगेल । हम कनि घुसकि गेलियै जे ओ हमरा संगे बैसत मुदा मोन होइतो ओ दोसर कात बैसगेल आ हिचकिचाइते हमरा हाथ सँ हाइ कहलक ।
ओना त हमर मोनमे अस्सीमनके पानि पडि गेल किएकी एते निक सुन्दर लडकी लगमे बैसके अनुमति देलक तैयो केहन पालग अइ जे नइ बैसल एहिठाम ? खेर तैयो हम ओकरा मुसकाइत हाइके जबाफ फर्कैलियै।आ ओकर नाम कि अछि से पुछलियै ।
बातचित सँ मालुम भेल जे इ आलोक निक परिवार आ खानदानी लोक छथि । पढल लिखल लोक सेहो छथि । हमरे जकाँ इहो अपन जीवन सँ तंग भऽ क किछु दिन लेल घुमघाम कर आएल छथि ।
एक अनजान ठाम मे अपन दिसक लोक भेटब, अपन भाषामे बात करब हमरा लेल मरुभुुमिमे पानि भेटब जका भेल । मोन बहुते खुशी भेल । बहुत रास गपसप भेल । बात चित करैत केना ३ घन्टा बित गेल पते नै चलल । एक दोसरके बात सँ इहो मालुम भेल जे अधिकांश लोक भीतरसँ पिडामे रहैय लेकिन बाहिरी रुप सँ मजबुरी आ जबर्जस्ति हँसैत रहैय ।
बातचित चलिते रहे । हमसब बतियाइते रही।नाउ घुमिक फेर अपन स्थान पर आबिक रोकलक आ कहलक आइसक्नुभो झर्नुहोस् अब तल । ओह ! कते जल्दी आबिगेलै ? हमरा त भेल जे नाउ बलाके हाथ मचोडि दितौ इ बोली सुनिक , कनिकाल आउर घुमबैत त कि होइतै एकरा ?
लेकिन करू कि उतरए पडल कियाकि आओर बहुतेगोटेसब सेहो चढल रहे नाउमे । करेज पर मुक्का मारि उतरली । लाइफ जेकेट खालैत आ उतरैत हमर पैर पिछरए लागल, ओ हाथ पकरैत सम्हारू अपनाके कहलक । आह! हमर मोन त आनन्दित भऽ गेल । मोन त हुए बस एतै ई समय रूकि जाइ । पुरे फिल्मी डिजाइन बला दृश्य चलैत होइ तेना लागल । फेर ओतसँ जाइत जाइत ओ कफी लेल आग्रह केलक । मोन त हमरा रहे ओकरा संग आओर किछु समय बितबितौ।तही दुवारे हम तुुरत हाँ कहलौ ।
हमसब एकटा कफी शोपमे एलौ।एकदोसरके आमने–सामने बैसलौ । कफीके अडर देलौ । दुटा मिल्क कफी । वेटर कहलक – केही समय लाग्छ । ओ पुछलक कति समय लाग्छ होला ?ओ १५ मिनेट जति लाग्छ होला कहलक । ओ हुन्छ कहलक । ओना त हमरा सेहो बहुत बात करबाक मोन रहे । बहुते किछु पुछके मोन रहे मुदा हम नइ पुछ सकलौ जे कि अहुँके हमरे जका डिभर्स भगेल अइ ?लेकिन केना पुछु ? ओ कि सोचत हमरा दिया कहि मोनके शान्त कऽ लेली।कफी आएल । कफी पिली ।
ओ फेर कहलक चलु कत अइ होटल ? अहाँके होटलमे हम छोडि दैत छी । गेलौ दुनूगोटे । होटलके गेट पर सँ ओ बाइ कह लागल । हमरा बड दुख भेल । हम आग्रह केली जे राति के खाना हमरा संग खाएब त हमरा निक लागत । ओ कहलक कनिक काम अछि । हम कनिक देरमे आएब । हम कहलियै–हम अहाँक इन्तजार करब । ओ हँसैत कहलक– हाँ किया नइ जरुर आ चलिगेल ।
हम ओतै ठाढ हुन्का तकैत रहिगेलौ । ओ हमरा लेल इहे ३ घन्टामे कते खास आ हमर हृदयके कते पासके लोक भऽ गेल ? से सोचि सोचि हम हैरान रहिगेलौ । फेर दिमाकमे ओहे फिल्म जका सिनसब आब लागल कि पहिरू ? कि लगाउ ?
मेकप कि करू ? आब भेटब त हम कहिदेब अहाँ हमरा निक लगैछी । एहने अनेक अनेक बातसब मोनमे घुरिआए लागल ।
साँझुक ६÷७ जखने बाजल । मोन आउर छटपटाई लागल । हर्टविट बढिगेल । छाती धकधक कर लागल । हम कल्पनामे आलोकसंग डिनरके दृष्य देख लगलौ । लेकिन अच्चानक फोनक घन्टी बाजल हमर ध्यान भंग भेल आ हम फोन देखलौ त फोनमे ओकरे मेसेज लिखल रहे –“अहाँ सँ नइ भेट सकली एहिबेर । सरी ! अचानक काठमाडौं आब पडल । बाबू जी भर्ना भेल छथिन अस्पतालमे । हुनकर तबेत सिरियस भऽ गेलै । अहाँके कहबाक मौका नै भेटल तें अखन जनतब दैत छी माफी देब ।आहाँ आउ काठमाडौ तहन भेटैछी आ आओर बातचित करैछी । एखन लेल बाइ……. मोनमे कचोट भेल मुदा तैयो मिलनक आस लागले रहल……
